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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है 

ग़ज़ल 
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अब कहाँ आन -बान बाक़ी है 
घर नहीं बस मकान बाक़ी है 
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जिस हवेली में बसते थे रिश्ते 
उस हवेली की शान बाक़ी है 
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नीम मुर्दा से हो गए फिर भी 
इन उसूलों में जान बाक़ी है 
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जिस के हाथों में हाथ हैं अब तक 
बस वही ख़ानदान बाक़ी है 
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होंगी सारी बलंदियाँ उस की 
बस ज़रा सी उड़ान बाक़ी है 
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बे असर हो गईं दवाएं सब 
ज़ख्म ए दिल का निशान बाक़ी है 
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ताएरों से खंडर ये कहता था 
जाओ मत ,सएबान बाक़ी है 
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उस के हाथों में है 'शेफ़ा 'क्योंके 
उस की शीरीं ज़बान बाक़ी है 
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नीम मुर्दा =अर्ध मृत ; ताएरों =पक्षियों ; शेफ़ा =रोग का निदान ; शीरीं =मीठी 

रविवार, 2 सितंबर 2012

......... मैं कैसे ग़ज़ल लिखूं

२७ अगस्त को लखनऊ में होने वाले सम्मान समारोह में ये गीत पढ़ा गया 
लेकिन ये लिखा गया  उस समय जब गुवाहाटी काँड ने हमें अत्याधिक व्यथित किया था
आप के विचारों का हृदय से स्वागत है 

" मैं कैसे ग़ज़ल कहूँ "
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कहीं जातिवाद का ज़ह्र है
कहीं जल रहा कोई शह्र है
कहीं टूटता कोई क़ह्र है 
कोई भाईचारा भुला गया

तो बता मैं कैसे ग़ज़ल कहूँ
तो बता मैं कैसे ग़ज़ल कहूँ

कहीं फूल कोई मसल गया 
कोई भावनाएं कुचल गया
कोई प्यार के नाम पे छल गया
औ’ कली को ज़ह्र पिला गया 

तो बता मैं कैसे ग़ज़ल कहूँ
तो बता मैं कैसे ग़ज़ल कहूँ

अभी शबनमों से धुली न थी
कभी भँवरे से भी मिली न थी
वो कली अभी जो खिली न थी
कोई उस का पेड़ जला गया 

तो बता..............
तो बता..............

जो अकड़ के आज सबल गया
वही जुर्म कर के निकल गया
कोई व्यंग्य से ही पिघल गया
औ’ दमित सदा ही छला गया 

तो बता..........
तो बता..........

मेरी भावनाएं ही मर गईं
यहाँ वेदनाएं ठहर गईं 
वो प्रसन्नताएं बिखर गईं 
कोई वार कर के चला गया

तो बता..........
तो बता..........

यही आस अब मेरे साथ है 
तेरे हाथ में मेरा हाथ है
नए दौर का नया साथ है
ये यक़ीन कोई दिला गया 

तो अब आ मैं कोई ग़ज़ल कहूँ 
तो फिर आ मैं कोई ग़ज़ल कहूँ 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

ग़ज़ल

पंकज जी के ब्लॉग पर पोस्ट की गई एक पुरानी ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

..........अभी तक गाँव में 
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गोरियाँ पनघट पे जाती हैं, अभी तक गाँव में 
प्रीत की राहों के राही हैं, अभी तक गाँव में
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पायलों से सुर मिलाती वो खनकती चूड़ियाँ
लोक धुन पर गुनगुनाती हैं, अभी तक गाँव में
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पक्षियों की चहचहाहट ,सुब्ह की ठंडी हवा
चुनरियाँ खेतों की धानी हैं, अभी तक गाँव में 
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झोपड़ी, खलिहान, पनघट, बाग़ में बिखरे हुए
याद के कुछ फूल बासी हैं, अभी तक गाँव में 
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छोड़ आए थे जिन्हें तुम गाँव के बरगद तले
झील सी आँखें वो प्यासी हैं, अभी तक गाँव में 
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क्या बुज़ुर्गों का है दर्जा? मान क्या सम्मान क्या?
माँएं बच्चों को सिखाती हैं, अभी तक गाँव में 
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भूल कर भी अपनी मिट्टी को न भूलेगी ’शेफ़ा’
कुछ जड़ें गहरी समाई हैं, अभी तक गाँव में 
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

यही सदियों तलक होगा

आज एक नज़्म के साथ हाज़िर हूँ शायद पसंद आए 

" यही सदियों तलक होगा "
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यही सदियों से होता है
यही सदियों तलक होगा
कि परवाना तड़पता है
शमा का दिल भी जलता है

ये इतना प्यार करती है

उसे दिल में बसाती है
मगर ये जानती भी है
अगर वो पास आएगा
तो उस कि जान जाएगी
इसी ग़म में वो घुलती है
इसी कोशिश में रहती है

मेरा परवाना बच जाए
भले वो पास न आए
मैं उस को देख तो पाऊं
तराने प्यार के गाऊं

मगर परवाने को देखो
अब उस को भी ज़रा समझो
शमा के गिर्द रहता है
और अपना सर पटकता है
नहीं मंज़ूर है उस को
जुदाई का कोई लम्हा
इसी उम्मीद में हर दम
शमा के गिर्द फिरता है
कभी तो वो बुलाएगी
कभी तो लबकुशा होगी
तो उस के पास जाएगा
और उस के अश्क पोछेगा
मगर जब ख़ामुशी से
शमा बस जलती पिघलती है

तो फिर बेचैन परवाना
शमा की सम्त बढ़ता है
और उस के प्यार की ख़ातिर
वो जाँ अपनी गंवाता है
शमा भी मुज़्तरिब हो कर 
तड़पती है ,मचलती है
जलाती है वो दिल को 
और फिर इस ग़म में घुलती है
जनाज़े पर वो परवाने के 
जाँ अपनी भी खोती है

यही सदियों से होता है
 यही सदियों तलक होगा
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लबकुशा= बोलना /कहना ; सम्त=ओर ; जनाज़ा= शव

गुरुवार, 21 जून 2012

आज फिर एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हूँ इस उम्मीद के साथ कि आप सब हज़रात ओ ख़वातीन 
      मेरी बार बार की ग़ैर हाज़िरी को नज़र अंदाज़ कर के अपने ख़यालात से ज़रूर नवाज़ेंगे / नवाज़ेंगी , शुक्रिया


ग़ज़ल
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अपनी चालों से ख़ुद मात खाने लगे
तब यक़ीं के क़दम डगमगाने लगे
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लम्स ममता का बख़्शे वो आसूदगी
तिफ़्ल ख़्वाबों में भी मुस्कुराने लगे
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अब्र ए बाराँ से सोंधी जो ख़ुश्बू उठी
ख़ुद ब ख़ुद मेरे लब गुनगुनाने लगे
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साथ दीवार के रंजिशें ढह गईं
दोनों जानिब क़दम आने -जाने लगे
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एक मुद्दत रही हल्की-हल्की तपिश
आग ठंडी हुई ,पर ज़माने लगे 
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एक क़तरा ’शेफ़ा’ एहतेजाजन उठा
और नदी के क़दम लड़खड़ाने लगे
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आसूदगी= आराम,राहत ; तिफ़्ल= बच्चा ;एहतेजाजन=विरोध में

बुधवार, 23 मई 2012

२ माह के वक़फ़े के बाद एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है  
आप सब के क़ीमती मश्वरों का इंतेज़ार रहेगा 
शुक्रिया

......हमनवा नहीं होता 
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वो जो मुझ से ख़फ़ा नहीं होता
दर्द हद से सिवा नहीं होता
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हमज़बाँ तो बहुत मिले लेकिन
क्यों कोई हमनवा नहीं होता
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आग बस्ती की वो बुझाता तो
उस का घर भी जला नहीं होता
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कोई कोशिश कभी तो की होती
तुम से कुछ भी छिपा नहीं होता
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जाग जाते अगर ज़रा पहले
सानेहा ये हुआ नहीं होता
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फ़िक्र रोटी की जो नहीं होती
कोई अपना जुदा नहीं होता
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तुम मसीहाई को जो आ जाते
ख़ौफ़ मुझ को ’शेफ़ा’ नहीं होता
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सिवा= ज़्यादा ; सानेहा= दुर्घटना

गुरुवार, 22 मार्च 2012

ग़ज़ल

एक तरही ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है जिस का तरही मिसरा था 
"इब्ने मरियम हुआ करे कोई "
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ख़्वाब बन कर मिला करे कोई
दर्द की यूँ  दवा करे कोई 

ज़िदगी की तरफ़ जो ले आए
"इब्ने मरियम हुआ करे कोई "

अपनी जाँ पर सहे सितम सारे
ऐसे भी तो वफ़ा करे कोई

ज़ुलमतें दूर कर दे ज़हनों से 
शम ’अ बन कर जला करे कोई

क़स्र ए सुल्ताँ में कौन सुनता है 
कुछ कहे तो कहा करे कोई

ज़िंदगी में मिले सुकूँ लेकिन 
ख़्वाहिशों से वग़ा करे कोई

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ज़ुल्मतें = अँधेरे ; क़स्र = महल ; वग़ा = युद्ध