मेरे ब्लॉग परिवार के सदस्य

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

चंद दिन पहले की बात है कि एक दिन पंकज सुबीर जी ने फ़ेसबुक पर एक शेर पोस्ट किया और सभी लोगों को आमंत्रित किया ग़ज़ल पूरी करने के लिये ,बस फिर क्या था जितने लोग ऑनलाइन थे उन की एक एक ग़ज़ल तैयार हो गई ,मैंने  भी कोशिश की
अब आप भी लुत्फ़ लीजिये लेकिन ये ध्यान रखियेगा कि ये  फ़िलबदीह (आशु) ग़ज़ल है .....
ग़लतियाँ हो सकती हैं ,, उस के लिये पहले से ही मुआफ़ी चाहती हूं 

ग़ज़ल
______________

हम भी कितना प्यारा सौदा करते हैं 
चेहरों पे मुस्कान सजाया करते हैं
****
जाने कितने दीप जला कर आँखों में
हम उन के सपनों की रक्षा करते हैं 
****
अपनी वफ़ाएं साबित करने की ख़ातिर 
हर बाज़ी हम उन से हारा करते हैं 
****
उन के जज़्बों को हम कैसे सच मानें 
वो तो रिश्तों का भी सौदा करते हैं 
****
जो बच्चे महरूम हों माँ के साए से 
हर आँचल में ममता ढूंढा करते हैं 
****
माँ -बाबा बच्चों की ख़ुशियो की ख़ातिर
अपने अरमानों को थपका करते हैं 
****
सूरज की गर्मी में , ख़ुनकी आए  जब     
गाँव के बूढ़े बरगद साया करते हैं
****
बात ’शेफ़ा’ जो करते हैं परवाज़ों की 
पँख परिंदों के वो कतरा करते हैं 
******************************************************************
महरूम = वंचित   ,,,,,,,ख़ुनकी = ठंडक