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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

यही सदियों तलक होगा

आज एक नज़्म के साथ हाज़िर हूँ शायद पसंद आए 

" यही सदियों तलक होगा "
__________________________

यही सदियों से होता है
यही सदियों तलक होगा
कि परवाना तड़पता है
शमा का दिल भी जलता है

ये इतना प्यार करती है

उसे दिल में बसाती है
मगर ये जानती भी है
अगर वो पास आएगा
तो उस कि जान जाएगी
इसी ग़म में वो घुलती है
इसी कोशिश में रहती है

मेरा परवाना बच जाए
भले वो पास न आए
मैं उस को देख तो पाऊं
तराने प्यार के गाऊं

मगर परवाने को देखो
अब उस को भी ज़रा समझो
शमा के गिर्द रहता है
और अपना सर पटकता है
नहीं मंज़ूर है उस को
जुदाई का कोई लम्हा
इसी उम्मीद में हर दम
शमा के गिर्द फिरता है
कभी तो वो बुलाएगी
कभी तो लबकुशा होगी
तो उस के पास जाएगा
और उस के अश्क पोछेगा
मगर जब ख़ामुशी से
शमा बस जलती पिघलती है

तो फिर बेचैन परवाना
शमा की सम्त बढ़ता है
और उस के प्यार की ख़ातिर
वो जाँ अपनी गंवाता है
शमा भी मुज़्तरिब हो कर 
तड़पती है ,मचलती है
जलाती है वो दिल को 
और फिर इस ग़म में घुलती है
जनाज़े पर वो परवाने के 
जाँ अपनी भी खोती है

यही सदियों से होता है
 यही सदियों तलक होगा
__________________________

लबकुशा= बोलना /कहना ; सम्त=ओर ; जनाज़ा= शव

28 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे आंसू का इक कतरा
    जो तेरी आंख से निकले
    फना हो जाऊं उस पर मैं
    दिल से इक आह ये निकले...

    सच्ची मुहब्बत ख़ुदा की इबादत सरीखी होती है...

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  2. वाह बहुत सुंदर ...

    मैंने कभी कुछ लिखा था --

    परवाने की मौत पर शमा रोती है
    उसकी हर अश्क की बूंद
    परवाने के लिए होती है
    परवाना शमा का दीवाना होता है
    और उसकी मौत
    शमा से ही होती है .....

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  3. वाह, यह तो एक खूबसूरत गीत है, मधुरता से भरा हुआ।

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  4. तो फिर बेचैन परवाना
    शमा की सम्त बढ़ता है
    और उस के प्यार की ख़ातिर
    वो जाँ अपनी गंवाता है
    शमा भी मुज़्तरिब हो कर
    तड़पती है ,मचलती है
    जलाती है वो दिल को
    और फिर इस ग़म में घुलती है
    जनाज़े पर वो परवाने के
    जाँ अपनी भी खोती है
    इस्मत, कितनी खूबसूरती के साथ तुमने शमा और परवाने के दर्द को उकेरा है!! इस नज़्म को पढ के मन इसलिये भी प्रसन्न हुआ कि बरसों से बनी हुई शमा की अकड़ू सी छवि और परवाने की आवारा से दीवाने की छवि टूट गयी. वरना अब तक जहां भी इन दोनों का इस्तेमाल हुआ, बहुत स्तरीय अर्थों में नही हुआ. लेकिन तुम्हारी क़लम का कमाल देखो... कैसे शमा के दर्द को उभार के सामने ले आयी!! बहुत ही सुन्दर नज़्म. जन्मदिन की एक बार फिर बधाई. जन्मदिन तुम्हारा, और तोहफ़ा भी तुमने ही दिया!! क्या दरियादिली है :) :)

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  5. बहुत खूब, पढ़ने में आनन्द आ गया।

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. शमाँ और परवाना का एक दुसरे के प्रति दीवानापन कभी तो कबीर की बाते याद दिलाता है "माया दीपक नर पतंग , भ्रमि भ्रमि इवे पडंत, कह कबीर गुरु ज्ञान ते एक आध उबरंत " तो कभी आत्मा परमात्मा का एकाकार होना याद दिलाता है . शायद इतना प्यार और रूमानियत और त्याग , ईश्वरीय गुण ही है . मंत्रमुग्ध हुआ .

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  8. बढ़िया नज़्म है. जन्मदिन मुबारक हो.

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  9. शायद नहीं बिल्कुल
    पसंद आयी है
    नज्म बहुत ही
    उम्दा बनाई है !

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  10. वाह.....
    बहुत बहुत खूबसूरत नज़्म इस्मत जी.

    सादर
    अनु

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  11. तो फिर बेचैन परवाना
    शमा की सम्त बढ़ता है
    और उस के प्यार की ख़ातिर
    वो जाँ अपनी गंवाता है
    शमा भी मुज़्तरिब हो कर
    तड़पती है ,मचलती है
    जलाती है वो दिल को
    और फिर इस ग़म में घुलती है
    जनाज़े पर वो परवाने के
    जाँ अपनी भी खोती है
    बेमिसाल

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  12. खुबसूरत नज्म ...
    शमा भी परवाने को इतना चाहती है ..
    बहुत सुंदर !

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  13. शमा और परवाने की दास्तान एक नए रंग में...बहुत खूब. दोनों की संवेदना बड़ी खूबसूरती के साथ उभर कर सामने आई है. अच्छी नज़्म है. मुबारक हो...

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  14. यही सदियों से होता है
    यही सदियों तलक होगा

    चलती आ रही है ..
    बढिया प्रसतुति !!

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  15. नहीं मंज़ूर है उस को
    जुदाई का कोई लम्हा
    इसी उम्मीद में हर दम
    शमा के गिर्द फिरता है ...

    प्रेम के सबसे प्राचीन प्रतीक ... शमा परवाने की दास्तां क्या कभी पुरानी होगी ... शायद जब तक ये दुनिया है प्रेमियों को इन्ही के मान से याद लिया जायगा ... शमा परवाने की दास्तां आपकी कलम से बहुत ही लाजवाब लगी ... शुभकामनायें ...

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  16. आप वाकई बहुत खूबसूरत लिखती हैं।

    बधाई।

    ............
    International Bloggers Conference!

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  17. शमा परवाना की दास्ताँ को
    बहुत ही खूबसूरत अलफ़ाज़ देकर
    आपने उन दोनों पर ही अहसान किया है
    क़ुर्बान हो जाने का सादिक़ जज़्बा , यक़ीनन,
    इस इबारत से और फले-फूलेगा !!
    मुबारकबाद .

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  18. बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी पधारें, प्रतीक्षा है आपकी .

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  19. .

    आदरणीया दीदी,
    क्या नज़्म लिखी है आपने … … … !

    पाक मुहब्बत का यह जज़्बा ही तो मुहब्बत को ऊंचाइयां देता है …

    इतने ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ ! और ऐसी रवानी !!
    गुनगुनाते हुए पढ़ा तो डूबता चला गया …
    इसी तरह दिल छू लेने वाली नज़्में और ग़ज़लियात पढ़ने का मौका देती रहें आप ।

    ●●●●●●●▬●▬●▬ஜ۩۞۩ஜ▬●▬●▬●●●●●●●
    रक्षाबंधन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं
    और
    सादर प्रणाम दीदी !
    ●●●●●●●▬●▬●▬ஜ۩۞۩ஜ▬●▬●▬●●●●●●●

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  20. यही सदियों से होता है
    यही सदियों तलक होगा...
    बहुत सुंदर लिखा है

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  21. ghazab ki lekhani hai apki,aaj pehli baar apke blog par aya,,afsos hai ab tak na aa pane ka.,.,

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  22. पूज्य बाबूजी की एक डायरी में माखनलाल चतुर्वेदीजी ने लिखा था : "प्रेम को जब जाना तो समझा, वह प्रभु है !"
    तुम्हारी नज़्म जब पढ़ी तो मन की कुछ ऐसी ही कैफियत हुई ! शमा और परवाने पर जाने कितना कुछ लिखा गया है, लेकिन इन दोनों की प्रीति को तुम्हारी इस नज़्म ने पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया है... साधु-साधु !!
    सस्नेह--आ.

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया