मेरे ब्लॉग परिवार के सदस्य

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ग़ज़ल

हालात के ज़ेर ए असर इधर कुछ जल्दी जल्दी रचनाएं  आ गईं इस ब्लॉग पर 
लेकिन पिछली ग़ज़ल से इस ग़ज़ल के दरमियान 
तीन कविताओं ने अपना मक़ाम 
हासिल कर लिया 
आज 
फिर एक ग़ज़ल के साथ हाज़िर हूं 
______________________________

ग़ज़ल
____________

अह्द ओ पैमान जो देती है सियासत हम को 
ऐसे वादों की है मालूम हक़ीक़त हम को 

दौलत ओ ज़र से चकाचौंध हुई है दुनिया
आज सीरत की नहीं होती ज़ियारत हम को 

साथ थी बाद ए सबा जब तो ये सोचा भी न था
इक ख़लिश देगी ये सूरज की तमाज़त हम को 

हम नई नस्ल को दे पाएं तो हो फ़र्ज़ अदा
जो कि अजदाद ने सौंपी थी विरासत हम को 

उन की मशकूक निगाहों ने भरम तोड़ दिया
इक यक़ीं भी नहीं दे पाई रिफ़ाक़त हम को 

कितने तब्दील हों माहौल मगर करनी है 
क़द्र ओ तहज़ीब ओ तमद्दुन की हिफ़ाज़त हम को 

मुज़तरिब दिल है ’शेफ़ा’ रूह तड़प उठती है
कितने ज़ख़्मों की कसक देगी मुहब्बत हम को 
____________________________________________

सीरत =चरित्र ; ज़ियारत = दर्शन ; बाद ए सबा = सुबह की ठंडी हवा ; तमाज़त = गर्मी
ख़लिश = बेचैनी; अजदाद = पूर्वज ; रिफ़ाक़त =दोस्ती ; तब्दील = परिवर्तित 
क़द्र = मूल्य(values ) ; तहजीब ओ तमद्दुन = संस्कृति और सभ्यता ; मुज़्तरिब = बेचैन
____________________________________________________________________


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

राहे उम्मीद



"राहे उम्मीद "

______________________________

आज इक काया उठी है ले के गाँधी का मिशन 
आज के कंसों के समक्ष आ गया फिर इक किशन
इतने वर्षों से था भ्रष्टाचारियों से तंग समाज
चल रहा था यूं अनैतिक कार्यों का गुंडा राज 
जब उठी आवाज़ कोई शोषितों की मान से 
या तो रिश्वत ने दबाया या गई वो जान से 
पापी गर जेलों तक आए साफ़ सुथरे छुट गए 
पीड़ितों की थी वही हालत बेचारे लुट गए
कोई तरसा इल्म को ,कोई रहा नन्गे बदन 
कोई पानी की कमी से त्रस्त कोई बेकफ़न
आज इन हालात के मद्दे नज़र जर्जर शरीर
उठ गया गाँधी के आदर्शों को ले कर वो फ़क़ीर 
आन्दोलन वो जो चिंगारी से शोला बन गया
हाथ इक दूजे का थामे एक रेला बन गया
ये मिशन प्रतिरोध है बस सिर्फ़ भ्रष्टाचार का
ये मिशन प्रतिरोध है दुखियों के हाहाकार का
ये विरोधी झूठ ,भ्रष्टाचार के , दुष्कर्म के,
ये जिहादी उठ चुके हैं वास्ते सत्कर्म के
ये नहीं शत्रु किसी भी पार्टी या नाम के 
ये विरोधी हैं हमेशा हर अनैतिक काम के 
हैं ये भ्रष्टाचार के वाहक जो अफ़सर देश के
हो कोई भी दल कि बिक जाते हैं रहबर देश के
किस समय की कर रहे हो तुम प्रतीक्षा ये कहो
भंग करना शांति का, लक्ष्य हो तो फिर कहो 
जाग जाओ जल्द वर्ना फिर हैं ये राहें कठिन
क्षीणकाय जान का बल सत्य है ,दौलत न धन
हैं सभी इक साथ कोई अब यहां जाति न धर्म
दुख सभी के एक हैं,आहत सभी के आज मर्म
हाथ में बस हाथ दे कर है ये जनता उस के साथ
मान लो तुम माँग इन की चाहो गर भारत का हाथ 

_____________________________________________

इसे पोस्ट करते करते ये समाचार मिला कि सत्य की फिर जीत हुई 
जय हिन्द 

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

एक  कविता प्रस्तुत है
इसे शायद आप ने रश्मि प्रभा जी के blog पर भी पढ़ा होगा
ये विषय भी उन का ही दिया हुआ है
आभारी हूँ रश्मि जी की ,  जिनके कारण इस कविता का अस्तित्व है
उन के विषय पर मेरे भावों का जो प्रभाव है वो आप के समक्ष है


 उसके नाम
___________



लिख पाती ’उस के नाम’ अगर
मैं अपने सारे सुख लिखती
उस के मन की अंगनाई में
वासंती रुत छाई रहती
उस के जीवन की बगिया में
फूलों के रंग बिखर जाते
वो जिस की बातों में खो कर
सदियों से प्यासी रूहें भी
सपने बुनतीं ख़ुशहाली के
वो जिस के शब्दों की माया
वो जिस की मर्यादित काया
मानवता के पथ पर चलकर
करती उद्धार चरित्रों का
करती उपचार विचारों का

’उस’ जीवन की अफ़रा तफ़री
’उस’ मन के अंतर्द्वन्द्व सभी
’उस’ दिल में बसे दुख दर्दों को
मैं हर न सकी तो जीवन क्या ?

पर वो जो भाग्य विधाता है
बस वो ही क़िस्मत लिखता है
कुछ वश में अगर मेरे होता
मैं उस के सारे दुख हरती
लिख पाती उस के नाम अगर

                                                           तो अपने सारे सुख लिखती

रविवार, 20 मार्च 2011

........ होली नफ़रत से इंकार

होली के शुभ अवसर पर एक गीत प्रस्तुत है 
आप सभी को होली बहुत बहुत मुबारक हो 

होली नफ़रत से इंकार
-_____________________

है होली रंगों का त्योहार
ये रंग बाँटे हैं सब में प्यार

न इन में द्वेष घोलना

ये सुंदर भावों का संचार
है इक दूजे की ये मनुहार

न इन में द्वेष घोलना

है होली नफ़रत से इंकार
दिलों के बीच न हो व्यापार

न इन में द्वेष घोलना

है पिचकारी वो प्रेम की धार
गिरा दे नफ़रत की दीवार

न इन में द्वेष घोलना

हैं इन रंगों के अर्थ हज़ार
नहीं हैं केवल ये बौछार

न इन में द्वेष घोलना

_______________________________
___________________________________

शनिवार, 12 मार्च 2011

............ऐसा असर कहाँ

सब से पहले तो जापान में होने वाली तबाही के सिलसिले से उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ
जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और दुआ करती हूं कि ख़ुदा सभी को अपने हिफ़्ज़ ओ अमान में रखे (आमीन)

और अब
एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

........ऐसा असर कहाँ
___________________

माँ बाप की दुआ सा किसी में असर कहाँ
दौलत हो गर ये पास तो ला’ल ओ गुहर कहाँ
*****
क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ
*****
निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब 
वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
*****
ग़रक़ाब हो जो बह्र में ,मोती वो पाएगा
ख़ुद आए सतह ए आब पे ऐसा गुहर कहाँ
*****
जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे 
कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
*****
पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
*****
छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ

***************************************************************
ला’ल= gem ; गुहर = मोती ; यूरिश = हमला ; मुस्तजाब = क़ुबूल ; ग़रक़ाब =  डूबना
नुजूम = सितारे ; फ़लक = आसमान ; क़मर = चाँद ; शजर = पेड़ 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

............धनक निसार किया

एक हल्की फुल्की सी ग़ज़ल ले कर हाज़िर हुई हूं ,न तो ये ग़ज़ल इब्तेदाई दौर की ग़ज़लों जैसी नफ़ीस है और न मौजूदा ग़ज़लों जैसी हक़ीक़त पर मबनी ,फिर भी ग़ज़ल है लिहाज़ा आप लोगों तक पहुंचाने की जुर्रत कर रही हूं, इस की कामयाबी या नाकामयाबी का इन्हेसार  आप पर है -----------शुक्रिया

..............धनक निसार किया
_________________________

ज़िंदगी की धनक निसार किया
हर दफ़ा उस ने ऐतबार किया

मेरे बस एक ख़्वाब की ख़ातिर 
उस ने हर ख़्वाब तार तार किया

उस के जज़्बों का सच परखना था
मैं ने उस पर ही इन्हेसार किया

जानता था है इन्तेज़ार अबस
फिर भी हर लम्हा इन्तेज़ार किया

उस की मासूम सी निगाहों ने 
दिल में पैदा इक इंतेशार किया

मुझ से वाबस्ता ख़्वाब हैं उस के
चश्म ए रौशन ने इश्तेहार किया 
__________________________________________________
इन्हेसार = निर्भर ; अबस = बेकार ; इंतेशार = हलचल , तितर-बितर
वाबस्ता= जुड़े हुए ; चश्म =आंख

बुधवार, 26 जनवरी 2011

चीत्कार

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
और बधाई

एक कविता प्रस्तुत है जिसे लिखना मेरे लिये तकलीफ़ का कारण तो था 
लेकिन न लिखना बेचैनी का कारण बन जाता
और 
वही तकलीफ़ और विचार मैं आप से शेयर करना 
चाहती हूं

"चीत्कार"
______________

अंतर्मन का चीत्कार है 
कैसा भारत माँ से प्यार है
झंडा जो सम्मान का द्योतक 
झेल रहा सत्ता की मार है
******
आंखों में अंगारे भर के
इक दूजे पर *तोहमत धर के (*आरोप)
माँ को हम करते शर्मिंदा
गृह कलह विज्ञापित कर के
******
क्यों ध्वज पर ये राजनीति है ?
क्यों शत्रु की सफल नीति है ?
माँ का तन ,मन आहत हो तो
कैसा मोह और कैसी प्रीति है?
******
रैली का आयोजन कर के 
या प्रवेश पर रोक लगा के
आख़िर क्या साबित करते हैं
देश प्रेम का मूल्य लगा के ?
******
घोटालों में डूब रहा है 
घर वालों से जूझ रहा है
देश के सम्मुख प्रश्न भयावह
मां का भरोसा टूट रहा है
******
प्रश्न अनुत्तरित कई यहां हैं
मन के सुकूं और चैन कहां हैं
जनता भूखे पेट खड़ी पर
’उन के ’ तो आबाद जहां हैं
******
इन सब का हल कैसे निकले
तप कर लोहा भी तो पिघले
सत्ता की गलियों से निकलो
याद करो वचनों को पिछले
******
अपना वादा प्यार देश से
और तिरंगे माँ के वेश से
लहराएं गणतंत्र दिवस पर
कर के तिरंगा दूर,,द्वेष से
******
काश्मीर से कन्याकुमारी
गोवा से ले कर गोहाटी
सदा यूंही लहराए तिरंगा
देश का मान बढ़ाए तिरंगा