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शनिवार, 12 मार्च 2011

............ऐसा असर कहाँ

सब से पहले तो जापान में होने वाली तबाही के सिलसिले से उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ
जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और दुआ करती हूं कि ख़ुदा सभी को अपने हिफ़्ज़ ओ अमान में रखे (आमीन)

और अब
एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

........ऐसा असर कहाँ
___________________

माँ बाप की दुआ सा किसी में असर कहाँ
दौलत हो गर ये पास तो ला’ल ओ गुहर कहाँ
*****
क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ
*****
निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब 
वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
*****
ग़रक़ाब हो जो बह्र में ,मोती वो पाएगा
ख़ुद आए सतह ए आब पे ऐसा गुहर कहाँ
*****
जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे 
कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
*****
पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
*****
छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ

***************************************************************
ला’ल= gem ; गुहर = मोती ; यूरिश = हमला ; मुस्तजाब = क़ुबूल ; ग़रक़ाब =  डूबना
नुजूम = सितारे ; फ़लक = आसमान ; क़मर = चाँद ; शजर = पेड़ 

32 टिप्‍पणियां:

  1. इस्मत जी ,

    बेहतरीन गज़ल पेश की है ...
    जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे
    कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ

    बहुत पसंद आया यह शेर ..

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  2. निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
    क्या बात है!
    पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    बहुत सुन्दर शेर. सही है. एक ही परिवार अब कितने टुकड़ों में यहां-वहां बिखर जाता है, पहले सा भरा-पूरा संयुक्त परिवार तो अब कहानियों में ही दिखता है.
    छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
    लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ
    मन में हौसला हो, और इरादे पक्के हों, तो वो उन मजबूत परों को बी आना ही होगा.
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल है इस्मत.
    जापान का दर्द हम सब का दर्द है. श्रद्धांजलि.

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  3. पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    *****
    छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
    लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ
    bahut hi laazwaab ,kal se itni buri khabre sunne ko mil rahi hai ki man bahut dukhi hai ,hamare shahar ke 1st year me padhne wale do bachcho ki sadak durghatana me maut ho gayi aur sonami haadsa ,aesa lagta hai
    jindagi jindagi hi nahi rahi mujhe to na kuchh likhne ko man ho raha na padhne ko ,in haadso se dhyan hi nahi hatta .do din baad net kholi aur is rachna ko padhne chali aai .

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. "शेफ़ा कजगाँवी " उर्दू में लिखा देख अच्छा लगा ....
    इस प्यारी भाषा को लोग भूलते जा रहे हैं हमें इसे बचाना होगा ! आपको शुभकामनायें इस्मत !

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  6. बह्र का मतलब ही नहीं जनता मैम, क्या टिप्पणी दूं ...??फिर भी शुभकामनायें दे रहा हूँ !

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  7. पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    ..... बहुत खूब!

    जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे
    कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ

    समाज के एक बड़े हिस्से का दर्द सिमट आया है .. अछे शेर ....उम्दा ग़ज़ल !

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  8. बहुत ही अच्छी गजल , सभी शेर बहुत पसंद आये, धन्यवाद

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  9. क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
    हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ

    वाह वा

    जानदार ग़ज़ल, शानदार शेर

    हार्दिक बधाई

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  10. जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे
    कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
    her sher me dam hai
    per chaand me roti dikhe jab to baat alag hai, bahut hi badhiyaa

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  11. सब से पहले तो इतने उर्दू के शब्दों के अर्थ देने के लिये धन्यवाद। आप गज़ल इतनी खूब सूरत कहती हैं कि मुझे से तो उतनी खूब सूरत दाद देये भी नही बनती --
    क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
    हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ
    *****
    निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
    मगर मेरे दिल से आपके लिये दिल से दुआयें निकल रही हैं।
    *****
    ग़रक़ाब हो जो बह्र में ,मोती वो पाएगा
    ख़ुद आए सतह ए आब पे ऐसा गुहर कहाँ
    वाह इस्मत जी कमाल का शेर है।
    *****

    छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
    लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ
    मतले को तो बार बर पढ रही हूँ ये मेरे लिये लिखा न? पूरी गज़ल दिल को छू गयी। बहुत बहुत बधाई।

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  12. निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ !

    क्या खूब कही आपने .... पूरी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आगया ! सुब्ह की शुरुयात आपकी खुबसूरत ग़ज़ल से हुई !

    सादर
    अर्श

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  13. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
    बिलकुल सही बात कही आपने ,,,
    दिल की गहराई से निकली दुआएं सुन ली जाती हैं
    जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे
    कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
    ज़िंदगी की ठोस हकीक़तों से रु ब रु करवाता हुआ
    लाजवाब शेर ... वाह !
    "पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ..."
    मिसरे में , "हमारा शजर"
    अपनी कहानी खुद बयान कर रहा है
    खूबसूरत ग़ज़ल !
    खूबसूरत इज़हार !!

    उत्तर देंहटाएं
  15. क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
    हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ

    हर एक शेर बहुत ख़ूबसूरत है, आपकी ग़ज़ल पढ़ लेना एक लज्जत को जी लेना है.
    बहुत बधाइयाँ

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  16. जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे
    कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
    बहुत देर तक सोचने पर मजबूर कर देने वाला शेर है

    पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    एकता का शजर मज़बूत करना होगा...
    अच्छा और ज़रूरी पैग़ाम दिया है...मुबारकबाद.

    उत्तर देंहटाएं
  17. आपकी ग़ज़ल का हर शेर प्यारा और लाजवाब.

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  18. पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    wah.kya gazab ka likhi hain.....

    उत्तर देंहटाएं
  19. बहुत ही अच्छी गजल| धन्यवाद|

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  20. पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस प्रस्‍तुति में ।

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  21. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 15 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  22. जब चाँद महबूब की बजाय रोटी जैसा दिखाई दे तो सितारे आसमान और चाँद पर ग़ज़ल में रूमानियत क्या बयान करे कोई !
    बेहतरीन ग़ज़ल !

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  23. आदरणीया इस्मत जी आपकी इस ग़ज़ल को जितनी मर्तबा भी पढ़ा जाए ताज़ातरीन ही लगती है,, और शायद यही सब से मजबूत पक्ष भी है इस रचना का| आपकी लेखनी को नमन इस्मत जी| इस मर्तबा इन पंक्तियों ने हिला दिया:-

    पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ

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  24. पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
    पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ..

    बहुत लाज़वाब गज़ल..हरेक शेर आज की जीवन की सच्चाई को बहुत ही सशक्त रूप में पेश करता है...बेहतरीन गज़ल..

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  25. behatreen gazal..


    badhayi sweekar kare..

    ---------

    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
    """" इस कविता का लिंक है ::::
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

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  26. अब यहाँ बारबार आना होगा... मेरी पसंद...
    निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ

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  27. अब यहाँ बारबार आना होगा... मेरी पसंद...
    निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब
    वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया