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गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल
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सदा अवाम की उट्ठी तो फिर दबा न सके
वो आज परचम ए इन्सानियत झुका न सके
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अब इम्तेहान की सा’अत में क्यों ये बेचैनी
जो सारी उम्र ही नेकी कोई कमा न सके 
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ख़ुतूत फाड़ के कोशिश तो हम ने की लेकिन
हम एक पल को भी तुम को कभी भुला न सके
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ज़रूरतें हमें आवाज़ दे रही थीं मगर
हम इस ज़मीन से कुछ दूर भी तो जा न सके
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ये कोशिशों में कमी थी कि कोई मजबूरी
जो हम ने अह्द किये थे उन्हें निभा न सके
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मिली है तरबियत ऐसी हमें बुज़ुर्गों से
क़दम कभी भी सदाक़त के डगमगा न सके
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अवाम= जनता; परचम= झंडा; सा’अत= समय
सदाक़त= सच्चाई

5 टिप्‍पणियां:

  1. मिली है तरबियत ऐसी हमें बुज़ुर्गों से
    क़दम कभी भी सदाक़त के डगमगा न सके
    ...लाज़वाब...बहुत उम्दा ग़ज़ल...

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  2. ख़ुतूत फाड़ के कोशिश तो हम ने की लेकिन
    हम एक पल को भी तुम को कभी भुला न सके

    वाह ! बहुत खूब ….

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  3. बहुत खूब !!!
    बेहतरीन ग़ज़ल....दिल से दाद हाज़िर है !!

    अनु

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  4. "अब इम्तेहान की सा’अत में क्यों ये बेचैनी
    जो सारी उम्र ही नेकी कोई कमा न सके "
    क्या बात.... बहुत उम्दा शेर. शेर तो और दूसरे भी बहुत बढिया हैं, लेकिन इस शेर के तो क्या कहने...जियो

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया