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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

ग़ज़ल

एक ग़ज़ल जिसे आप शिकायत समझें या समाज में बढ़ते  जा रहे ख़ुदग़र्ज़ी के जज़्बे से एक लम्हे  भर को दुखी हुए मन की पीर , लेकिन  मेरे लिये ये एहसास लम्हाती था मैं आज भी बहुत पुर उम्मीद  हूँ क्योंकि आज भी समाज में उन लोगों का फ़ीसद ज़्यादा  है जो बे ग़रज़ और बेलौस जज़्बे के साथ  काम करते हैं 

फिर भी  उस एक लम्हे को आप तक पहुँचाने की जुर्रत  रही हूँ

ग़ज़ल
***********

दूसरों के ग़म में रोता कौन है
बोझ यूँ ग़ैरों के ढोता कौन है 
*****
मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है 
*****
है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है 
*****
एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है 
*****
उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
बोझ यूँ  इसयाँ के ढोता कौन है
*****
हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
तीसरा ये शख़्स होता कौन है 
*****
ऐ ’शेफ़ा’ हमदर्दी ए दुश्मन में  अब
कश्तियाँ अपनी डुबोता कौन है 
************************************
मुफ़लिसी = ग़रीबी,,;,,मदफ़न = क़ब्र ,,;,,इसयाँ = गुनाह ,पाप

33 टिप्‍पणियां:

  1. उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
    बोझ यूँ इसयाँ के ढोता कौन है... वाह... क्या लिखती हो !

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  2. हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है ...

    वाह..
    बेहतरीन गज़ल..
    जज्बातों से लबरेज..

    शुक्रिया.

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  3. एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
    फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है wah.....behad khoobsurti se likhi hain.....

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  4. हर अशआर लाजबाब मगर इस शेर में तो जान ही बसी हुई है .
    उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
    बोझ यूँ इसयाँ के ढोता कौन है

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  5. दूसरों के ग़म में रोता कौन है
    बोझ यूँ ग़ैरों के ढोता कौन है

    सच्चाई से लबरेज़ है मत्ला.वाह.
    सच,यही हक़ीक़त है.
    सभी शेर बिलकुल हालत का आइना हैं.

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  6. कल 10/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
    फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है ...

    ये एक शेर सिर्फ रस्म के लिए उतारा है यहाँ .. पर हर शेर गज़ब का लिखा है ... मतला तो इतना जानदार है की क्या कहूँ ... हकीकत के करीब हैं हर शेर ... अमाज को आइना दिखाते हुवे ...

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  8. ्बेहद शानदार गज़ल्…………हर शेर आईना दिखाता हुआ।

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  9. है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
    ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है

    सच्ची बात.
    हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है
    वाह!!!! मन तो कर रहा है कि इन तमाम तीसरों के पास भेज दूं ये शेर, साथ ही पड़ोसी के यहां भी. वो भी तो देखे, कितना भरोसा है यहां. शानदार ग़ज़ल.

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  10. मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
    वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है

    एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
    फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है

    उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
    बोझ यूँ इसयाँ के ढोता कौन है

    हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है
    बहुत खूब कही है.....लाजवाब गज़ल के लिए दिली दाद कबूल फरमाएं|

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  11. हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है

    बड़ी उम्दा बात कही है..पूरी की पूरी ग़ज़ल ही बेमिसाल है

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  12. अभी काफी लोग ऐसे मिलेंगे जिनमें इंसानियत बाकि है !
    शुभकामनायें आपको !

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  13. है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
    ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है
    उम्दा शायरी ....
    बहुत बढ़िया ...

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  14. मुफलिसी ने उसकी हिम्मत तोड़ दी
    वर्ना यूं खुशियों को खोता कौन है

    हम पडोसी मसअले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख्स, होता कौन है

    उस पुर-असर लम्हे का भी शुक्रिया जिसने इस्मत ज़ैदी के
    ज़हन में ये नायाब शेर भर दिए और एक
    बहुत अच्छी ग़ज़ल पढने वालों तक पहुँच पाई ....
    बहुत खूब !!

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  15. हलचल पे मिली आपकी यह पोस्ट! बहुत अच्छी ग़ज़ल, और सार्थक भी !

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  16. दूसरों के ग़म में रोता कौन हैबोझ यूँ ग़ैरों के ढोता कौन है .................बिलकुल सही कहा....,आपने.

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  17. ख़ूबसूरत ग़ज़ल , आपके लिये जो अहसास लम्हाती हो सकते हैं , वो किसी के लिये उम्र जितने लम्बे भी हो सकते हैं ...लम्हे तो कट जाते हैं मगर उम्र किस बिना पर कटे ...हाँ ये अहसास ही सुन्दर है कि बस गम लम्हे भर का है ...

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  18. उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
    बोझ यूँ इसयाँ के ढोता कौन है

    बहुत खूबसूरती के साथ आपने अपने जज्बे को बयान किया है.

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  19. मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
    वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है
    वाह ...बहुत खूब ।

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  20. हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है

    वाह! बहुत उम्दा ग़ज़ल...
    सादर.

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  21. एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
    फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है

    वाह!! बहुत ख़ूब !!

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  22. है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
    ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है
    **

    सच्ची baat....
    सभी अशआर ज़मीं से जुड़े हुए हैं ....
    बहुत खूब.....

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  23. बहुत ही खूबसूरत रचना है.. तुरंत जुड़ने वाली..

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  24. हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
    तीसरा ये शख़्स होता कौन है..
    बहुत ही खूबसूरत.. वाह

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  25. मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
    वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है...
    ग़ज़ल का सबसे बेहतरीन शेर लगा...
    हां मुफ़लिसी कह लीजिए या गर्दिश...
    बहरहाल बहुत अच्छी ग़ज़ल है...मुबारकबाद.

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया