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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

ग़ज़ल

कल यानी ९ अक्तूबर को  इस ब्लॉग की दूसरी सालगिरह के मौक़े  पर एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है 


".........रोई ख़ाक ए मक़तल क्यों "
___________

हवा भी गर्म है छाए हैं सुर्ख़ बादल क्यों?
ये ज़ुल्म किस पे हुआ ?रोई ख़ाक ए मक़तल क्यों?

जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?

हैं आज कैसी ये बेचैनियां फ़ज़ाओं में
दिल ओ दिमाग़ हुए जा रहे हैं बोझल क्यों?

जो आरज़ू थी कि हों इर्द गिर्द गुल बूटे
तो तुम ने नागफनी के उगाए जंगल क्यों ?

हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों 

सुकूत से भी समंदर के ख़ौफ़ आता है 
हैं क्यों ख़मोश ये मौजें ? नहीं है हलचल क्यों?

मैं जब सुकून की मंज़िल से चंद गाम पे हूं
सदाएँ देता है माज़ी मेरा मुसलसल क्यों ?

वो कौन अपना ’शेफ़ा’ याद आ गया तुम को 
तुम्हारी आँख हुई जा रही है जलथल क्यों ?

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ख़ाक = मिट्टी ; मक़तल = रणभूमि ; मुकम्मल = पूरा ; आरज़ू = इच्छा 
सुकूत = ख़ामोशी ; गाम = क़दम ; माज़ी = अतीत ; मुसलसल = लगातार

27 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा गज़ल है इस्मत जी... हमेशा की तरह. सभी अशआर पसंद आये. मुबारकबाद.

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  2. हैं आज कैसी ये बेचैनियां फ़ज़ाओं में
    दिल ओ दिमाग़ हुए जा रहे हैं बोझल क्यों

    ग़ज़ल के तमाम अश`आर
    बार बार पढने लाएक़ हैं ...
    "क्यूँ" रदीफ़ को बहुत ख़ूबसूरती से निभाया गया है
    और वैसे भी
    मन के खयालात को
    ग़ज़ल की बंदिशों तक ला पाना हो
    तो ऐसी तसनीफ,
    पढ़ते रहना चाहिए ....
    मुबारकबाद .

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  3. बड़े तकलीफदेह प्रश्न हैं इस ग़ज़ल में ......

    काश हम सब इसके सन्देश को ध्यान से समझ सकें ...समझने की कोशिश करें !

    शायद यह बादल कभी छट जाएँ और हर चेहरे पर एक चमक हो !

    आभार इस खूबसूरत रचना के लिए !

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  4. जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?....
    ....
    हो जाए जो मुकम्मल ख्वाब अपने
    दर्द का लम्हा फिर जियेगा कौन ?

    ग़ज़ल में बात उसकी ही होती है , जो ज़िन्दगी की हर शाख से गुजरते हैं , - बहुत ही बढ़िया

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  5. जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?
    bahut khub gajal kahi hai jai hind jai bharat

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  6. मैं जब सुकून की मंज़िल से चंद गाम पे हूं
    सदाएँ देता है माज़ी मेरा मुसलसल क्यों ?
    gazab ka likha hai.......wah.

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  7. इल्म-ओ-फ़न की मिसाल पेश करते ब्लॉग के दो कामयाब साल पूरे होने पर मुबारकबाद कबूल फ़रमाएं इस्मत साहिबा...
    हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
    समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों
    दिल के बहुत ही क़रीब पहुंच जाता है ये शेर...

    मैं जब सुकून की मंज़िल से चंद गाम पे हूं
    सदाएं देता है माज़ी मेरा मुसलसल क्यों ?
    बेहतरीन...
    इसका कुछ जवाब शायद इस शेर में है-
    राहे-जुनूने-शौक में पीछे जो रह गई
    मुझको पुकारती है वो मंज़िल कभी कभी.

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  8. आदरणीया इस्मत जी
    बहुत उम्दा ग़ज़ल.... हरेक शेर नगीने की तरह चमक-दमक रहा है.

    यूँ तो हरेक शेर बेहतरीन मगर ये शेर दिल को छू गए.....

    जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?

    जो आरज़ू थी कि हों इर्द गिर्द गुल बूटे
    तो तुम ने नागफनी के उगाए जंगल क्यों ?

    वो कौन अपना ’शेफ़ा’ याद आ गया तुम को
    तुम्हारी आँख हुई जा रही है जलथल क्यों ?

    उत्तर देंहटाएं
  9. जो आरज़ू थी कि हों इर्द गिर्द गुल बूटेतो तुम ने नागफनी के उगाए जंगल क्यों ?

    ...सुंदर गज़ल

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  10. ब्लॉग के २ साल पूरा होने की मुबारकबाद
    जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?
    बहुत खूबसूरत अशआर ....लाजवाब मज़ामीन.....मतला ता मकता सभी शेर दिल को छू रहे हैं ......मुबारकबाद इस खूबसूरत तखलीक के लिए ......बहुत खूब

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  11. हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
    समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों
    बहुत सुन्दर शेर है इस्मत. पूरी ग़ज़ल ही बहुत सुन्दर है.
    तुम्हारा ये ब्लॉग इसी तरह सफ़लता के नित नये पायदान चढता रहे और हम साल दर साल इसी तरह तुम्हें मुबारक़बाद देते रहें. शुभकामनाओं सहित.

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  12. ब्लॉग के दो साल पूरे होने पर और सी शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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  13. ब्लॉग की दूसरी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई.
    ग़ज़ल तो हमेशा की तरह बेहतरीन है ही.
    देर से ब्लॉग के वर्षगाँठ की खबर पढ़ पाया,sorry.

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  14. पूरी ग़ज़ल लाज़वाब है ,मगर इस शेर ने तो दिल को चीर कर रख दिया !
    हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
    समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों
    आभार !

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  15. इंशा अल्लाह ..... बहुत खूब


    हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
    समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों

    हासिल - ए - ग़ज़ल शेर है यह ......

    बधाई

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  16. इस्मत देर लगी आने में मुझको...उस के लिए मुआफी...सब से पहले तो तुमको ब्लॉग के जनम दिन की ढेरों बधाइयाँ...तहे दिल से दुआ करता हूँ कि ये ब्लॉग साल दर साल यूँ ही बना रहे, और हम तुम्हारे अशआरों की फुहारों से यूँ ही भीगते रहें...गुलाबों सी खूबसूरत ग़ज़लों से महकते रहें...आमीन.

    अब बात इस ग़ज़ल की...क्या कहूँ? तुमने जिस तरह से ग़ज़ल के काफिये और रदीफ़ को निभाया है वो हैरत अंगेज़ और काबिले दाद है...दिल बाग़ बाग़ हो गया...

    जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?

    जो आरज़ू थी कि हों इर्द गिर्द गुल बूटे
    तो तुम ने नागफनी के उगाए जंगल क्यों ?

    हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
    समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों

    जैसे शेर बार बार पढ़ रहा हूँ...सुभान अल्लाह इस्मत तुमने कमाल कर दिया है...खुश रहो और यूँ ही ग़ज़लें कहती रहो...

    नीरज

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  17. जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?..

    कुछ ख्वाबो की किस्मत में पूरा होना नहीं लिखा होता ... क्या लाजवाब गज़ल और उम्दा अशआर हैं ...
    दो वार्स पूरा होने पे बधाई ... ये सफर यूँ ही चलता रहे ... आमीन ...

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  18. इस्मत ज़ैदी जी ,

    कुछ कारणों से मैं नेट पर नहीं आ पा रही थी ...

    आज आपकी यह खूबसूरत गज़ल पढ़ी ... ब्लॉग की सालगिरह पर आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें

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  19. २ साल पूरे होने पर इससे बेहतर और क्या पेशकश हो सकती है.. दिल खुश हो गया इसे पढ़कर..
    और आपको भी बहुत बहुत बधाई..

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  20. ismat kaisi hain aap? bahut din se yaad kar rahi thi. aapaki gazal ke liye to bas itanaa hi kaafee hai --laajavaab -- hameshaa ki tarah.bahut bahut shubhakaamanayen deepaavali ki badhaai.

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  21. बहुत सुंदर .. बधाई और शुभकामनाएं !!

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  22. जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
    अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?
    कोई बताये मुझे , कोई राह दिखाए मुझे ....

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  23. वाह ! बेहतरीन ग़ज़ल !
    बहुत अच्छे जज़्बात बख्शें हैं आपने अशार को ।

    अपने विचारों से अवगत कराएँ !
    अच्छा ठीक है -2

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  24. बेहतरीन गज़ल..पढ़ने से छूट रही थी।..वाह!

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया