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शुक्रवार, 10 जून 2011

.................सहर हो गई

गर्मी की छुट्टियां मसरूफ़ियात में एज़ाफ़ा कर देती हैं और  कभी कभी नेट से रिश्ता रख पाना 
नामुम्किन हो जाता है लिहाज़ा कुछ अरसे के बाद एक तरही ग़ज़ल के साथ हाज़िर हुई हूं 
मुलाहेज़ा फ़रमाएं 

"ज़रा आँख झपकी सहर हो गई "
____________________________________

दुआ जो मेरी बेअसर हो गई 
फिर इक आरज़ू दर बदर हो गई

वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर 
निगह में तेरी बे समर हो गई 

तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे 
हयात अपनी यूंही बसर हो गई

कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर 
थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई 

न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल 
"ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी
तेरा साथ था ,मुख़्तसर हो गई

मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई

’शेफ़ा’ तेरा लहजा ही कमज़ोर था 
तेरी बात गर्द ए सफ़र हो गई 
_____________________________________

बेसमर = असफल ; शजर = पेड़ ; मसाफ़त = दूरी , फ़ासला ;
मुख़्तसर = छोटी ; परचम = झंडा ; रहगुज़र = रास्ता 
गर्द ए सफ़र = राह की धूल

36 टिप्‍पणियां:

  1. वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर
    निगह में तेरी बे समर हो गई

    तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई
    bahut hi badhiya .

    उत्तर देंहटाएं
  2. न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी
    तेरा साथ था ,मुख़्तसर हो गई

    आपकी रचना पढ़कर आनंद आ जाता है ऐसी सरलता बहुत कम लोगों कि किस्मत में आती है ! शुभकामनायें !!

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  3. मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
    तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई
    .... पर मंजिल वहीँ होती है, जहाँ पाँव लहुलुहान होते हैं ..... बहुत ही जानदार ग़ज़ल

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  4. आपका तरही वाला शेर सच में बेमिसार शेर है ... जीवन को बहुत दार्शनिक अंदाज से लिखा है इस एक शेर में ही ...
    वैसे पूरी ग़ज़ल बहुत कमाल है ... हर शेर अपने आप में मुकम्मल दास्तान है ...

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  5. तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई

    बहुत खूब! यही तलाश तो जिंदगी की हकीकत है. इंसान को सुकून तो मरने के बाद भी शायद ही मिलता हो.

    सुल्तान अख्तर साहब का एक शेर याद आ गया

    'तलाश देखिये क्या हम तलाश करते हैं.
    सुकूने दिल के लिए गम तलाश करते हैं.'

    कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर
    थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई

    सचमुच ममता की छाओं बहुत राहत-तलब होती है. लेकिन सबको नसीब कहां होती है.

    न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    तजमीन का शेर तो गज़ब का है. आपने तो इसे अपना लिया है. बहुत खूब!

    ------देवेन्द्र गौतम

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  6. तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई

    वाह वाह वाह...इस बेजोड़ ग़ज़ल के किस शेर की तारीफ़ में कसीदे पढूं सभी तो एक से बढ़ कर एक हैं. ये शेर आपके हमारे दुःख और दर्द खुशियों को बहुत ख़ूबसूरती से बयां कर रहे हैं.सुभान अल्लाह...मानता हूँ गर्मियों में मसरूफियत बढ़ जाती है लेकिन इतनी भी नहीं के आप एक से दूसरी पोस्ट के बीच इतना वक्फा रखें :-)
    दाद कबूल करें.

    नीरज

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  7. बहुत ही जानदार ग़ज़ल| धन्यवाद|

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  8. अर्थ समझ रहे हैं, भावों में उतर रहे हैं, बहुत ही सुन्दर।

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  9. दुआ जो मेरी बेअसर हो गई
    फिर इक आरज़ू दर बदर हो गई

    खूबसूरत मतले से शुरू होती हुई ये ग़ज़ल
    हर शेर के हवाले से अपना तुआर्रुफ़ करवा पाने में
    कामयाब बन पडी है ....
    इंसान की जिंदगी के तकरीबन हर पहलू को
    उजागर कर पाना आसान काम नहीं है
    की गयी मेहनत,,, ज़ाहिर हो रही है
    मुबारकबाद .

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  10. कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर
    थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई

    न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"
    निश्बद कर दिया इस दूसरे वाले शेर ने तो। आपकी गज़ल हमेशा ही खूबसूरत होती है कहना भी क्या
    शुभकामनायें।

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  11. मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
    तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई

    waah....raah me kaante to honge hi...

    jab parcham utha hi liya to kaanto ka dar kaisa, bas chalna zaruri hai foolon tak pahunchne ke liye....

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  12. बहुत प्यारी सी ग़ज़ल...
    गिरह का मिसरा आपके फ़न और हुनर की दलील है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई

    बहुत प्यारा शे'र है आपा...

    न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    इस शे'र की तारीफ़ शब्दों से की जानी नामुमकिन सी बात है हमारे लिए...ये तो भीतर से ही आप तक पहुंचे तो पहुंचे...

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  14. कमाल का लिखती हैं आप ..वाह वाह ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"
    ...यह शेर अनूठा है। नई ताजगी देता।...वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  16. तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई

    बहुत सुंदर लिखा है ...
    मन रम गया ..
    आभार एवं शुभकामनायें .

    उत्तर देंहटाएं
  17. न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  18. न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
    तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई
    शानदार ग़ज़ल के लिये बधाई. सभी शेर एक स बढकर एक. अफ़सोस केवल इस बात का है कि सबसे पहले टिप्पणी नहीं कर पाई :( :(

    उत्तर देंहटाएं
  19. कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर
    थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई

    न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

    बहुत खूब...बहुत खूब....बहुत खूब....

    उत्तर देंहटाएं
  20. मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
    तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई

    वाह,प्यारा शेर है.

    बेहतरीन ग़ज़ल.

    उत्तर देंहटाएं
  21. मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
    तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई

    ....बहुत खूब! बहुत ख़ूबसूरत गज़ल..

    उत्तर देंहटाएं
  22. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच{16-6-2011}

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  23. आदरणीया....
    फिर एक बार जादू चलाया है आपने.. उम्दा लफ्ज़ अदायगी.... मतला ता मक्ता हर शेर, लाजवाब बुना है.

    ये शेर अद्भुत है.... बार पढने का जी किया.....!!!!

    तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
    हयात अपनी यूंही बसर हो गई


    और ये शेर भी कुछ कम नहीं....
    वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी
    तेरा साथ था ,मुख़्तसर हो गई
    वाह वाह......!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  24. थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई .........
    न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल ..........
    वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी...........
    मैं जब भी उठा ले के परचम कोई..........
    ’शेफ़ा’ तेरा लहजा ही कमज़ोर था ...........

    इस मुकम्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ|

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  25. bahut khoob! tareef ke liye munasib alfaaz nahin mil rahe .

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  26. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा होगी शनिवार (25-06-11 ) को नई-पिरानी हलचल पर..रुक जाएँ कुछ पल पर ...! |कृपया पधारें और अपने विचारों से हमें अनुग्रहित करें...!!

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  27. बहुत खूबसूरत गज़ल ... हर शेर उम्दा

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  28. वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर
    निगह में तेरी बे समर हो गई

    -वाह!!!बहुत ही उम्दा गज़ल!!!

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  29. न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
    "ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"
    bahut achcha likhti hain aap.

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  30. इस्मत जी कमाल का लिखा है आपने ... बहुत सुन्दर.. उम्दा गज़ल..

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  31. वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर
    निगाह में तेरी बे समर हो गई .
    क्या बात है!
    .......
    लाजवाब ग़ज़ल.

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  32. दुआ जो मेरी बेअसर हो गई
    फिर इक आरज़ू दर बदर हो गई

    बहुत खूबसूरत ...हर शेर दूसरे से बेहतर !

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  33. वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी
    तेरा साथ था ,मुख़्तसर हो गई ...वाह!

    बेहतरीन ग़ज़ल.
    सादर..

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया