मेरे ब्लॉग परिवार के सदस्य

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

सैलाब मेरी आँखों में..........

 सैलाब मेरी आँखों में........
_____________________________
आ गया कैसा ये सैलाब मेरी आँखों में
सारे मंज़र हुए ग़रक़ाब मेरी आँखों में

क्यों नहीं अब मेरी उम्मीद की शम’एं रौशन
क्यों मचलते नहीं अब ख़्वाब मेरी आँखों में

मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

कोई आया ना  बचाने मुझे मैं बेबस था
थी फ़क़त अश्कों की अहज़ाब मेरी आँखों में

मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में

सैलाब=बाढ़;  मंज़र=दृश्य;  ग़रक़ाब =डूबना; अहबाब=दोस्त ; फ़क़त=केवल; अहज़ाब=सेना
मुज़्तरिब=बेचैन ; असबाब=कारण

30 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

    अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में

    पढ़ कर दिल खुश हो गया
    बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं
  3. आ गया कैसा ये सैलाब मेरी आँखों में
    सारे मंज़र हुए ग़रक़ाब मेरी आँखों में...
    बहुत खूबसूरत मतला..
    क्यों नहीं अब कोई उम्मीद की शमा रौशन
    क्यों मचलते नही अब ख़्वाब मेरी आँखों में
    हासिल-ग़ज़ल शेर....
    मोहतरमा इस्मत साहिबा,
    इसे मुकम्मल ग़ज़ल कहा जायेगा..
    हर शेर बेहतरीन है. मुबारकबाद.

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में


    बहुत उम्दा गज़ल!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अरसे बाद आया हूँ. शहीद के ब्लॉग पर भी कल शाम गया और आज की सुबह आप के यहाँ. सवाल वही है की इतने कुहना मश्क, कादिरुल्कलाम कलमकार के फन पर नाचीज़ कहे भी तो क्या? ब्लॉग की दुनिया में गिने-चुने चंद ही नाम हैं जिन्हें पढ़कर बहुत कुछ सीखा-समझा जा सकता है.
    मेरी लम्बी गैरहाजिरी को आपने बख्श दिया होगा, इसका मुझे यकीन है.
    **** 'शमा' वाले मिसरे की बाबत आपका ख़याल जानना चाहूँगा----माज़रत के साथ.

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस्मत,
    एक और उम्दा ग़ज़ल कही है तुमने ! आँखों में आसुओं के सैलाब का सबब मालूम हुआ ! हाँ, कोई नहीं आता इन आंसुओं को पोछने, अपने गम ही रहबर बनते हैं ! तमाम अशार मुतासिर करते है, खासकर ये दोनों :
    मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में


    अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में !
    जीने के असबाबों पे पकड़ बनी रहे ! यही कामना !
    सस्नेह--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  7. अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में
    तुम्हारी गज़ल पर जब बड़े-बड़े फ़नकार नि:शब्द हैं तो हमारी क्या औकात है? :) सचमुच बहुत-बहुत उम्दा गज़ल. सभी शेर बहुत सुन्दर लेकिन मुझे सबसे अच्छा लगा-
    अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में
    बधाई. यूं ही लिखती रहो और हम पढते रहें.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आ गया कैसा ये सैलाब मेरी आँखों में
    सारे मंज़र हुए ग़रक़ाब मेरी आँखों में


    क्यों नहीं अब मेरी उम्मीद की शम’एं रौशन
    क्यों मचलते नहीं अब ख़्वाब मेरी आँखों में


    मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में


    कोई आया ना बचाने मुझे मैं बेबस था
    थी फ़क़त अश्कों की अहज़ाब मेरी आँखों में


    मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में


    अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में
    laazwaab ,hum to kuchh kahne ke kabil hi nahi hai ,magar dil ko chhoo gayi ,mujhe bhi ye mukammal gazal lagi ,beautiful

    उत्तर देंहटाएं
  9. मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में


    kya baat hai......madam...ek ek alfaaz laajawab!!!!!

    padhkar maza aa gaya

    उत्तर देंहटाएं
  10. तो........
    मुहतिरमा इस्मत ज़ैदी की क़लम से निकला
    एक और जादू,,, एक और कमाल .....

    "मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में"

    बेबसी , मजबूरी , और बेकली के आलम और
    इंसान के मन की कशमकश को लफ़्ज़ों में
    ऐसी आसानी से बयान कर पाना....
    कमाल ही तो है

    और
    ये शेर.....
    "मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में..."

    किसी भी तरह के तजस्सुस और अंदेशे में इक
    अजीब-सा रिश्ता क़ाइम करता हुआ
    लाजवाब , कामयाब और शानदार शेर ...
    इंसानी फ़ित्रत को तफ़्सील से समझाता हुआ ये शेर खुद अपने आप को पढ़वा रहा है...

    और खुलासा ये कि आस का दामन थामे रहना ही सुकून बख्शता है यानी ये शेर ....

    "अपनी उम्मीदों के ये दीप जलाए रखना
    है 'शेफा' जीने के असबाब मेरी आँखों में.."

    ज़बान-औ-बयान और मआनि-औ-मतालिब के एतबार से ये ग़ज़ल
    आपकी कुव्वत-ए-फ़िक्र
    व् कुहना मशकी की दलील है

    मुबारकबाद .

    उत्तर देंहटाएं
  11. bahut acchee gazal..........

    badhai...mubarakvad kabool kare.

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस्मत जी !
    मैं ग़ज़ल के बारे कुछ भी नहीं जानता ! मगर आम आदमी के रूप में यह एक बेहतरीन ग़ज़ल है !
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  13. मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में
    ..behatariin sher. badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  14. मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

    इंसान के मन की जद्दो-जेहद को बाखूबी उतरा है आपने ... सच में कुछ ख्वाब ऐसे ही टूट जाते हैं ...
    बहुत ही लाजवाब शेर हैं इस पूरी ग़ज़ल में ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपकी ग़ज़लें पढ़ता हूँ तो अपनी तुच्छता का बोध होता है। खामखा इतराता रहता हूं अपने लिखे शेरों पर...और "मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं/ और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में" जैसे शेर मुझे लाजवाब कर जाते हैं, मेरे इतराने को धता बताते हुये।

    god bless u...keep it up!

    उत्तर देंहटाएं
  16. पढकर जो महसूस होता है उसे कहना आसान नहीं इसीलिए "बहुत खूब" से काम चला लेते हैं ।

    मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

    उत्तर देंहटाएं
  17. मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में
    वाह जी वाह क्या मुकम्मल फ़रमाया है आपने ..........रदीफ़-काफिया सब कुछ बेमिसाल -बेनजीर ! शुक्रिया !

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत बढ़िया और शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ!

    उत्तर देंहटाएं
  19. मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में


    soch rahe hain...
    is she'r mein aisi kyaa baat hai...??

    ye itnaa khoobsoorat kyun hai...?

    उत्तर देंहटाएं
  20. बढिया गजल...शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  21. Aapke is blog par pahlee baar aayaa
    hoon.Aapkee gazal padhkar bahut
    achchha lagaa hai.Sabhee ashaar ek
    se badh kar ek hain.Mubaarak
    wwww.gavaksh.blogspot.com par
    meree kripya gazalen padhiyega.

    उत्तर देंहटाएं
  22. वाह , दिले नादाँ की तड़प हम समझ सकते हैं ....और वो ब्लॉग पर लिखा ...जमीर बचाए रखना .....तो फिर चोटों से भी बचाए रखना ........

    उत्तर देंहटाएं
  23. AAP BAHUT SHANDAR LIKHTY HAI..AAP KI PRASHANSA TO BAHUT PAHALE SE SUNATI CHALY AA RAHI HOO..

    उत्तर देंहटाएं
  24. अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
    हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में

    bahut shaandaar gazal ..

    ye sher khas pasand aaya

    उत्तर देंहटाएं
  25. some really heart touching lines. it feels great to get an opportunity to read something so meaningful and artistic at the same time but to find it unanimously appreciated is even better. congratulations!!

    उत्तर देंहटाएं
  26. मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
    फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

    सुभान अल्लाह...जोरे कलम और जियादा
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  27. कुछ शब्दों के मायने नहीं पता थे। अर्थ से मिलाकर पढ़ा तो बहुत बहुत अच्छे लगे शेर। गौतम राजरिशी की टिप्पणी बहुत अच्छी लगी। ये वाला शेर बहुत उम्दा लगा:

    मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

    इसके इस तरह से अपने लिये याद कर लेते हैं-

    बेचैन होता हूं पर होंठ ही नहीं खुलते हैं
    और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

    उत्तर देंहटाएं
  28. बहुत ही अच्छा लिखा है। इसी बहाने कई शब्दों के अर्थ समझ में आ गये।

    उत्तर देंहटाएं

ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया