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बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

ग़ज़ल
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कहा हो हम ने कुछ , ऐसा नहीं है
कभी तुम ने भी तो पूछा नहीं है
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मिला इन’आम सच कहने का उस को
कड़ी है धूप और साया नहीं है
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सिखाया तज्रिबों ने ज़िंदगी के
जो आता है नज़र , वैसा नहीं है
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सितम आराइये अहबाब देखो
मुझे चोटें तो दीं तोड़ा नहीं है
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करेगा क़द्र इक दिन वो भी मेरी
अभी उस ने मुझे समझा नहीं है
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सितम आराइये अहबाब = दोस्तों का अत्याचार

1 टिप्पणी:


  1. सिखाया तज्रिबों ने ज़िंदगी के
    जो आता है नज़र , वैसा नहीं है
    कमाल का शेर!! लगातार पोस्ट करो इस्मत. बहुत दिनों बाद दिखाई दीं तुम यहां.

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया