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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

लीजिये ’चराग़’ रदीफ़ के साथ एक ग़ज़ल कहने और आप तक पहुंचाने की हिम्मत कर रही हूं
और
अब नतीजे का इंतेज़ार है
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ग़ज़ल
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आँधियाँ ज़ुल्म जो ढाएं तो बिफरता है चराग़
वरना उफ़रीत को ज़ुलमत के निगलता है चराग़
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ख़ैर मक़दम में अँधेरों के वो जल जाता है
आग में तप के सर ए शाम निखरता है चराग़

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रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़
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हसरतें , ख़्वाहिशें, अरमान बुझे जाते हैं
पर दम ए रुख़सत ए आख़िर को संभलता है चराग़
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यूँ तो आँधी के मुक़ाबिल भी डटा रहता है
और कभी हल्के से झोंके से बिखरता है चराग़
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चाहता है कि वो क़ुरबान हो इंसानों पर
कारनामों से प इन्साँ के दहलता है चराग़

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ऐ ’शेफ़ा’ सौंप के ख़ुर्शीद को अपनी दुनिया
सुबह  की पहली किरन देख के मरता है चराग़
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१-उफ़रीत= राक्षस; २-आग़ोश= गोद; ३- दम ए रुख़सत ए आख़िर= अंतिम समय;
४- ख़ैर मक़दम= स्वागत; ५-ख़ुर्शीद= सूरज

33 टिप्‍पणियां:

  1. मुबारक हो दी...
    आप अव्वल नंबरों से पास हुईं :-)
    सच्ची बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...
    रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
    कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़
    बेहतरीन शेर.

    सादर
    अनु

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  2. बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही दी ग़ज़ल के बारे में कुछ कहूं तो सूरज को चिराग दिखाना टाइप होगा

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  3. उल्फ़त की राह में ..कुर्बानी की मिसाल
    तन्हाई में जलता आपका यह चराग़.......
    स्वस्थ रहें !

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  4. रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
    कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़
    क्या बात...बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल, इस्मत ...जरा जल्दी जल्दी लिखा करो :)

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    1. शुक्रिया रश्मि
      तुम्हारे मश्वरे पर अमल करने की कोशिश करूंगी :)

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  5. यूँ तो आँधी के मुक़ाबिल भी डटा रहता है
    और कभी हल्के से झोंके से बिखरता है चराग़
    क्या बात...क्या बात...
    अब हम कुछ और नहीं लिखेंगे भाई. थोड़ा कम अच्छा लिखा करो, थक गये तारीफ़ कर-कर के :) :)

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    उत्तर
    1. तो अब तुम बुराई बताना शुरू करो वन्दना :)

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    2. तुम खराब लिखोगी, तब ना बुराई करेंगे हम?? :) :) :) और तुम अच्छा लिखने से बाज न आओगी :)

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  6. लाजवाब लिखी हैं आंटी!

    सादर

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  7. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ....माशाल्ला चिराग तो चिराग ही है ....बखूबी जल रहा है ....और दिल को ,दुनिया को रौशनी भी दे रहा है ...!!

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  8. रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
    कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़ ... किसी लोरी की तरह

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  9. वाह वाह ... बहुत खूब !


    आज की ब्लॉग बुलेटिन 'खलनायक' को छोड़ो, असली नायक से मिलो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. ग़ज़ल पर किये गए सभी तब्सिरों से
    इत्तेफ़ाक़ रखते हुए, बस इतना ही कहता हूँ ......

    लफ्ज़ सब खुद ही महकते हैं, निखर जाते हैं
    जब भी 'शेफा' की लियाक़त के चमकते हैं चराग़

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  11. वाह वाह वाह !!! शानदार रचना | बहुत सुन्दर | पढ़कर आनंद आया | उर्दू एक कुछ नए अलफ़ाज़ भी सीख लिए | बहुत बहुत आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  12. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ....बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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  13. खूबसूरत ग़ज़ल. सारे शेर बहुत अच्छे लगे.

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  14. रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
    कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़

    outstanding sher of outstanding ghazal..... Congrats !!!!!!

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  15. रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
    कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़
    शानदार ग़ज़ल का बेशकीमती शेर .....! जितनी तर्रिफ की जाए उतनी कम।।।।

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  16. ख़ैर मक़दम में अँधेरों के वो जल जाता है
    आग में तप के सर ए शाम निखरता है चराग़ ...

    हर शेर दिल मिएँ चराग जला रहा है ... पर ये शेर बहुत ही लाजवाब लगा ... खूबसूरत गज़ल .. जिंदाबाद ...

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया