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शुक्रवार, 28 मई 2010

दुआ

आज पहली बार एक नज़्म ले कर हाज़िर हुई हूं , तजुर्बा कितना कामयाब है ये आप के तब्सेरों पर मुन्हसिर(निर्भर) होगा ,शुक्रिया


दुआ
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मेरे मालिक ख़यालों को मेरे
पाकीज़गी दे दे ,
मेरे जज़्बों को शिद्दत दे ,
मेरी फ़िकरों को वुस’अत दे,
मेरे एह्सास उस के हों ,
मेरे जज़बात उस के हों ,
जियूं मैं जिस की ख़ातिर ,
बस वफ़ाएं भी उसी की हों,

मेरे मा’बूद मुझ को ,
ऐसी नज़रें तू अता कर दे
कि जब भी आंख ये उठे ,
ख़ुलूस ओ प्यार ही छलके ,
जिसे अपना कहा मैंने
उसे अपना बना भी लूं ,
मैं उस के सारे ग़म ले कर ,
उसे ख़ुशियां ही ख़ुशियां दूं ,

मेरे अल्लाह मुझ को ,
दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
नहीं अरमान मुझ को
रुत्ब ए आली के पाने का
अता कर ऐसी दौलत
जिस के ज़रिये, मैं
तेरे बंदों के काम आऊं
मुझे ज़रिया बना कर
उन के अरमानों को पूरा कर
करम ये मुझ पे तू कर दे
मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
कि तेरी राह पर चल कर
मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं
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वुस’अत=फैलाव ; मा’बूद =भगवान ; ज़र= धन ; रुत्ब ए आली = बड़ा रुत्बा ; तौफ़ीक़ = ख़ुदा की मेहरबानी 

39 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे मा’बूद मुझ को ,
    ऐसी नज़रें तू अता कर दे
    कि जब भी आंख ये उठे ,
    ख़ुलूस ओ प्यार ही छलके ,
    जिसे अपना कहा मैंने
    उसे अपना बना भी लूं ,
    मैं उस के सारे ग़म ले कर ,
    उसे ख़ुशियां ही ख़ुशियां दूं ,
    इस्मत, जितना मैं तुम्हें जानती हूं, और निश्चित रूप से पूरी तरह जानती हूं, तो जैसी तुम हो, ठीक वैसी ही नज़्म भी तुमने लिखी है. कहना नहीं होगा, कि तुम्हारा पद्य की हर विधा पर कमाल का अधिकार है.

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  2. सच कहूँ ?

    मैंने आज तक कोई नज़्म नहीं लिखी
    और जानता भी नहीं ठीक से
    कि इसको लिखने के क्या नियम कायदे हैं
    क्या तरीका है

    हाँ मुझे इंतज़ार था
    इस पोस्ट को पढ़ना चाहता था
    कि जान सकूँ नज़्म किसे कहते हैं

    आपकी नज़्म पढ़ने के बाद
    शायद कभी मैं भी आपको एक नज़्म पढवा सकूँ

    शायद इस लिए
    क्योकि
    मैंने आज तक कोई नज़्म नहीं लिखी

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  3. मैं उस के सारे ग़म ले कर ,
    उसे ख़ुशियां ही ख़ुशियां दूं ,

    bahut sunder bhav...........

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  4. मेरे अल्लाह मुझ को ,
    दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
    नहीं अरमान मुझ को
    रुत्ब ए आली के पाने का
    अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं
    तेरे बंदों के काम आऊं
    मुझे ज़रिया बना कर
    उन के अरमानों को पूरा कर
    करम ये मुझ पे तू कर दे
    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं
    ......................बहुत पाकीज़ा नज़्म लिखी है मोहतरमा....! ये इल्तिजा तो दुनिया के हर आमो-खास की उस माबूद से होनी चाहिए.....मगर क्या करियेगा, दुनिया तो दुनिया है.....इस नज़्म पर हम दिलो-जान से कुर्बान हुए......! न दौलत-ज़र का अरमान न रुतबा-ए आली की दरकार......क्या बेहतरीन नज़्म है.......!

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  5. नज्म की नस नस से पाकीजगी बरस रही है ।

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  6. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं



    मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
    क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html

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  7. बहुत उम्दा नज़्म है इस्मत ! इतनी पाकीज़ा, जितनी दिल से की गई इबादत ! मुतासिर हुआ ! बचपन में स्वतन्त्रता-प्राप्ति की एक वंदना पढ़ी थी, ठीक-ठीक तो याद नहीं, लेकिन वह कुछ ऐसे थी--
    'जिगर में जोश, दिल में दर्द, तन में जान पैदा कर,
    कदमबोसी को चल के सर के बल आएगी आज़ादी,
    जिगर में एक बेचैनी मेरे भगवान् पैदा कर !'
    तुम्हारी ये नज़्म भी जिगर में बेचैनी पैदा करती है--रूह को पाक रखने की, काश हम सभी ऐसा कर पाते, तो हमारी ये दुनिया जन्नत होती !
    शानदार प्रवाह और उदात्त मनोभावों की बाकमाल नज़्म ! बधाई !!
    भाई--आ.

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  8. इस्मत बहन आप की दुआ तोह मेरे दिल को छु गयी ,तारीफ के लिये अलफ़ाज़ ही नहीं मिल रहे. नज़्म मैं भी आप कामयाब हैं. नरजिस अबिदी

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  9. मेरे अल्लाह मुझ को........अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं.......तेरे बंदों के काम आऊं
    मुझे ज़रिया बना कर.....उन के अरमानों को पूरा कर
    करम ये मुझ पे तू कर दे......मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर.....मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं...

    सुबहान अल्लाह...
    नज़्म में जिन नेक और पाकीज़ा ख़्याल को पेश किया है,
    अल्लाह ऐसे जज़्बे से हर इन्सान के दिल को रोशन कर दे (आमीन)

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  10. बहुत ही खुबसूरत रचना है ,,,शब्द चयन भी अच्छा है ....पर जो कुछ अल्लाह से आपने दुआ की उस में से आपके पास बहुत कुछ है और उनमे सबसे ऊपर है ...नेक विचार

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  11. नज़्म की खूबसूरती..
    नज़्म की बुनावट से ...ख्यालों से इस क़दर बढ़ गयी है कि ...हाथ खुद ब खुद उठ रहे हैं..
    आपकी दुआ में शामिल होने के लिए...



    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं....


    सिर्फ एक लाइन याद आ रही है..फैज़ साहिब की...


    "आइये, हाथ उठाएं हम भी...."

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  12. मेरे अल्लाह मुझ को ,
    दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
    नहीं अरमान मुझ को
    रुत्ब ए आली के पाने का
    अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं
    तेरे बंदों के काम आऊं ...

    इस्मत जी ... बहुत ही दिलकश नज़्म है ... आपकी दुआ में असर हो .. खुदा ऐसी नेमत सबको बक्शे ....
    आप कामयाब है नज़्म लिखने में बहुत ही ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. मेरे मा’बूद मुझ को ,
    ऐसी नज़रें तू अता कर दे
    कि जब भी आंख ये उठे ,
    ख़ुलूस ओ प्यार ही छलके ,
    जिसे अपना कहा मैंने
    उसे अपना बना भी लूं ,
    मैं उस के सारे ग़म ले कर ,
    उसे ख़ुशियां ही ख़ुशियां दूं ,

    आमीन!!खुदाएबरतर आमीन!!!
    मुहब्बत और खुलूस की तमाम प्रार्थनाएं कुबूल हों।

    उत्तर देंहटाएं
  14. इसे पढकर तो यही कहना पड़ा कि कहना नहीं होगा, कि तुम्हारा पद्य की हर विधा पर कमाल का अधिकार है!!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. "करम ये मुझ पे तू कर दे
    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं"

    भारतीय काव्य में प्रार्थना की परम्परा , इंसानियत का जज़्बा
    और पारस्परिक सद्भाव का प्रवाह...
    अभी भी अपना विशेष प्रभाव बनाए हुए हैं.. ये कहावत
    आपकी इस नज़्म को पढ़ कर सच लग रही है

    "जिसे अपना कहा मैंने
    उसे अपना बना भी लूं ,
    मैं उस के सारे ग़म ले कर ,
    उसे ख़ुशियां ही ख़ुशियां दूं ,...."

    अन्दर के एक बिंदु-विशेष से होती हुई, रचना
    बाहर के चिंतन-विशेष को भी खुद में समोए हुए है
    आपने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को सादगी से लेकिन
    गहराई से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ,, जो सराहनीय है .
    चयनित विषय का पर्याप्त अध्ययन भी
    नज़्म में झलक रहा है .
    बधाई स्वीकारें .

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  16. ...आमीन.

    शानदार नज्म.. पढ़कर कुछ शांति मिली.
    ..आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  17. मुझे ज़रिया बना कर
    उन के अरमानों को पूरा कर
    करम ये मुझ पे तू कर दे
    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं

    aameen

    उत्तर देंहटाएं
  18. AAPKEE SADBHAVNA NE MUN KO SPARSH
    KAR LIYAA HAI.BADHAAEE.

    उत्तर देंहटाएं
  19. मैं न तंज़ कर रहा हूँ, न ही बहुत बढ़ा चढ़ा कर कुछ कहने की कोशिश में हूँ लेकिन इतना जरूर कहूँगा इस दुआइया नज़्म ने शायरे मशरिक अल्लामा इकबाल की याद दिला दी.
    यह सिर्फ आपकी कोशिशों और मेहनत का असर है. मुबारक.

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत बहुत शुक्रिया इस्मत साहिबा ,
    ग़ज़ल पर जिस तरीक़े से आप दाद देती हैं वो क़ाबिले -तारीफ़ है .
    और आपके 'सलाम' को तो ....................................सदहा सलाम

    आपकी ग़ज़ल --'-है भी नहीं भी '------------सुब्हानअल्लाह
    और नज़्म --------------------------------- -माशाअल्लाह
    आमीन ----[ ये नज़्म लिखने वाले और पढ़ने वालों के लिए भी ]

    उत्तर देंहटाएं
  21. अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं
    तेरे बंदों के काम आऊं
    मुझे ज़रिया बना कर
    उन के अरमानों को पूरा कर

    इस्मत जी आपकी इन पंक्तियों में ज़ाहिर आपकी सोच को पढ़ कर मेरा सर आपकी शान में झुक गया है...सुभान अल्लाह...बेहतरीन नज़्म कही है आपने...आपको तहे दिल से दाद देता हूँ...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  22. आपका नाम पढ़ा तो आपकी 'दुआ' याद आ गई..फिर आ गया पढ़ने के लिए..
    ..अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं
    तेरे बंदों के काम आऊं
    मुझे ज़रिया बना कर
    उन के अरमानों को पूरा कर
    करम ये मुझ पे तू कर दे
    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं.

    ...आमीन.

    उत्तर देंहटाएं
  23. Kya gazab likha hai..yaad aa gayi wo dua.." Lab pe aati hai dua ban ke tamanna meri..."
    Mai aapki follower hun,par mujhe ittela nahi mil rahi..na jane kyon?
    Vandana ka comment padhne ke baad aap se milne kaa bahut armaan ho raha hai!

    उत्तर देंहटाएं
  24. मेरे अल्लाह मुझ को ,
    दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
    नहीं अरमान मुझ को
    रुत्ब ए आली के पाने का
    अता कर ऐसी दौलत
    जिस के ज़रिये, मैं
    तेरे बंदों के काम आऊं
    मुझे ज़रिया बना कर
    उन के अरमानों को पूरा कर
    करम ये मुझ पे तू कर दे
    मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
    कि तेरी राह पर चल कर
    मैं मंज़िल तक पहुंच पाऊं

    आप ने तो सब के लिये मांग लिया बस हम "आमीन" कह्ते हैं.

    और नज़्म के लिये आप को मुबारक बाद पेश करते हैं ,क़ुबूल किजिये .

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  25. मोहतरमा इस्मत ज़ैदी साहिबा
    पहली मर्तबा आपके यहां आया हूं , और आइंदा बार-बार आना पड़ेगा , यह तय है ।
    इतनी ख़ूबसूरती से की गई दुआ कब की क़बूल हो चुकी , इसमें शक नहीं ।
    आपकी ग़ज़ल भी पढ़ी …
    आपके दूसए ब्लॉग पर सलाम और ना'त भी ,
    अभी इतना ही कहूंगा कि अब तक आपके यहां नहीं आ पाने के कारण कितना कुछ खोया है मैंने । भरपाई की कोशिश रहेगी …
    आपकी क़लम बिलाशुब्हा मुबारकबाद की मुस्तहक़ है

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  26. एक खूबसूरत दिल से निकली यह दुआ क़ुबूल न हो यह कैसे हो सकता है ? काश ऐसे भाव मैं लिख पाता ...लगा कि आपने मेरे दिल की बात छीन ली ! हार्दिक शुभकामनायें !!

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  27. खुदा इस दुआ को कबूल करे आमीन! हम सब की दुआ है..मुद्दत बाद आया हूँ..फिर महफ़िल में...

    फुर्सत मिले तो हमज़बान पर शाया रंजना जी की कविताओं पर नज़र सानी की जाए.

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  28. दुआ है आपको ऐसी ही तौफ़ीक मिले ....

    बहुत ही अच्छी नज़्म ....!!

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  29. कमाल कि रचना है! बेहतरीन!

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  30. عزیزی عصمت۔ دعائیں۔
    آپ کو خدا نے بے پناہ تخلیقی صلاحیتیں عطا کی ہیں۔اچھے اور معیاری ادب کا مطالعہ کرتی رہیں۔آپ کی فکر کے جوہر کھلیں گے۔کیا آپ کا تعلق جونپور کے کج گاؤں سے ہے؟۔وہاں بہت پہلے میں نے محفلوں میں شرکت کی ہے۔خدا آپ کو کامیابیاں عطا کرے۔ آمین۔

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  31. ye kalam padh kar shayra / shayar ki umr kafi buzurgi ki lagti hai aisi pukhta nazm kehne ke liye ek taweel umr ka tajirba hona darkar hai jitna aapko padh raha hun utni hairat aur khushi ho rahi hai
    aadil rasheed

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  32. उतना जानता तो नहीं आपको लेकिन पहली टिप्पणी से सहमत! बहुत सुन्दर!

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया