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रविवार, 17 जनवरी 2010

............शोर ही मह्फ़िल में रह गया

ग़ज़ल
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नगमा जो प्यार का था,मेरे दिल में रह गया
दह्शत्गरी का शोर ही महफ़िल में रह गया

इक सिम्त खाई , दूसरी जानिब कुआँ अमीक़
हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया

है सच पे झूठ ,झूठ पे सच की कई परत
मैं तो उलझ के बस हक़ो बातिल में रह गया

जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया

जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया

बेदार कर रहा था जो बातों से इल्म की
बे दस्तो पा,वो हलकै क़ातिल में रह गया

थी आरज़ू लबों पे तबस्सुम बिखेर दूं
अरमान घुट के ये भी मेरे दिल में रह गया

नग़मा = गाना ,अमीक़ =गहरा ,हक़ो बातिल =सच झूठ ,क़फ़स =जेल ,
नालाए बिस्मिल =sad song , सलासिल =ज़ंजीर , बेदार =जगाना , 
बे दस्तो पा =मजबूर ,हल्क़ा= घेरा , शिकंजा





17 टिप्‍पणियां:

  1. इस्मत,
    बहुत खूब ! लाजवाब !! बेहतरीन !!!
    हर अशार पे झूम-झूम जाता हूँ ! कौन-सा उद्धृत करूँ, किसे छोड़ दूँ ?
    'जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
    ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया.

    'जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
    मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया.'

    'थी आरज़ू लबों पे तबस्सुम बिखेर दूं
    अरमान घुट के ये भी मेरे दिल में रह गया.'

    और वो 'हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया...' वल्लाह ! मज़ा आ गया ! सुबह से शाम तक की खुराक मिल गई ! अब दिन इन्हीं अशारों की जुगाली करते बीतेगा...
    तुम्हारा--आनंद भइया.

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  2. मोहतरमा इस्मत साहिबा, आदाब
    .....दहशतगरी का शोर ही महफ़िल में रह गया
    बहुत खूबसूरत मतला है
    जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
    ख़ुशियों का राग नाला-ए-बिस्मिल में रह गया
    वाह वाह
    हर शेर बेहतरीन, मुबारकबाद
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  3. नगमा जो प्यार का था,मेरे दिल में रह गया

    दह्शत्गरी का शोर ही महफ़िल में रह गया


    ahaaaaa kya matla kaha hai


    इक सिम्त खाई , दूसरी जानिब कुआँ अमीक़

    हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया

    is sher ko to bas kya kahun ..........


    है सच पे झूठ ,झूठ पे सच की कई परत

    मैं तो उलझ के बस हक़ो बातिल में रह गया

    waah waah


    जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब

    ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया

    kamaal ka sher



    जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए

    मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया

    bahut sach



    बेदार कर रहा था जो बातों से इल्म की

    बे दस्तो पा,वो हलकै क़ातिल में रह गया



    थी आरज़ू लबों पे तबस्सुम बिखेर दूं

    अरमान घुट के ये भी मेरे दिल में रह गया

    bahut bahut shaandaar gazal kahti hai aap
    har sher pukhta
    har sher dil ko chhuta hua

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  4. इक सिम्त खाई , दूसरी जानिब कुआँ अमीक़
    हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया

    क्या कहूं, ऐसे मंजे हुए शायर की तरह शे’र कहती हो, कि मैं खुद औचक पढती ही रह जाती हूं...ईश्वर ने क्या हुनर बख्शा है, जो हाथ कभी केवल गद्य लिखते थे, आज इतनी गम्भीर गज़ल लिख रहे हैं..आमीन.

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  5. तो....
    एक और बेहतरीन ग़ज़ल....
    एक और उम्दा कलाम .....
    सब से पहले हासिल-ए-ग़ज़ल शेर
    (जो मुझे लगा)

    "बेदार कर रहा था जो बातों से इल्म की
    बे दस्तो पा,वो हल्क़:ए क़ातिल में रह गया"

    मालूम नहीं...
    यहाँ ....
    सरमद है,,,,मंसूर है,,,,
    सुकरात है,,,,ईसा है
    लेकिन बात
    कह दी गयी है ....वाह !

    और ......
    "जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
    ख़ुशियों का राग,नालए बिस्मिल में रह गया.."

    शेर बहुत मासूमियत से कहा गया है ..
    दाद का मुस्त`haq है....

    आप...
    संजीदा खयालात को
    पुख्ता इज़हार में
    तब्दील करने के हुनर से वाकिफ़ हैं...
    आपकी ग़ज़ल का लबो-लहजा
    क़ारी से बातें करता है..
    मैं....
    कुछ,,, क्या कहूं....
    बस.....
    मुबारकबाद कहता हूँ

    "खिंचता चला गया मैं
    सुख़न के तिलिस्म में
    tanqeebo tabsira तो
    mere dil में reh गया "

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  6. मत आना किसी की बातों में
    अपने ही दिल की खुराफातों में
    इस दूरी को तुम पाटो न
    रन्ज न रखना तुम दिल में , मेरे लिए
    aanand ji jaisa hi mera haal hai ,waah waah waah ,poori rachna bahut khoob .

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  7. *anand bhaiya
    *shahid sahab
    *shraddha ji
    *vandana ji
    *muflis sahab aur
    *jyoti ji
    aap sabhi ka bahut bahut shukriya agar koi aik sher bhi qari ke dil ko chhoo jaye to mahsoos hota hai ki mehnat kamyab ho gayi .
    ap sab isi tarah apni duaon se nawazte rahen shukrguzaar rahoongi.

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  8. जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
    मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया

    इतने सारे लोगों ने इतना कुछ लिख दिया की मेरे लिखने के लिए कुछ भी नहीं बचा.बस बहुत बेहतरीन हर शब्द बोलता हुआ और दिल को गहराई तक छूता हुआ

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपको पढने के बाद अब एक दिक्कत महसूस होती है कि क्या कहा जाए. एक ही बात रिपीट करना अच्छा नहीं लगता. जो लोग अच्छा कह रहे हैं, उन्हें बार-बार अच्छा, सिर्फ अच्छा कहते एक संकोच सा होता है. लेकिन रस्म अदायगी जरूरी है, लिहाज़ा कहता हूँ------- आपने गजल बहुत ही अच्छी कही है, इतनी उम्दा गजल पेश करने के लिए शुक्रिया.
    'कुवां-खाई' वाले शेर के दूसरे मिसरे में 'हिंदुस्तान' की जगह अगर 'बेचारा अम्न'होता तो शायद मुझे और भी अच्छा लगता. अगर मैं कहता तो यही कहता. अम्न से यह शेर ग्लोबल होता, जबकि हिंदुस्तान कहने से मुझे लगता है कि यह महदूद हो गया है.
    अगर इस तब्सिरे से कुछ दुःख हुआ हो तो माज़रत चाहता हूँ.

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  10. सुबीर जी के ब्लौग पर आपकी तरही पढ़कर चला आया इन जानिब....और आना व्यर्थ नहीं गया। ये तो खजाना है ग़ज़लों का।

    क्या लिखती हैं आप?

    "जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
    ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया"

    उफ़्फ़्फ़!

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  11. rachna ji
    sarwat sahab aur
    gautam ji bahut bahut shukriya

    aap logon ki tanqeedo tabsere ka hamesha istaqbal hoga .

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  12. ग़ज़ल के हर शे'र कहानी बयां कर रहे हैं...

    नगमा जो प्यार का था,मेरे दिल में रह गया
    दह्शत्गरी का शोर ही महफ़िल में रह गया
    ....बहुत खूब कही.

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  13. जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
    मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया.'

    कमाल के शेर कहे हैं ....... सब की लिखना मुमकिन नही ...... गुलदस्ते की तरह हर शेर महक रहा है पूरी ग़ज़ल में ........

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  14. है सच पे झूठ ,झूठ पे सच की कई परत

    मैं तो उलझ के बस हक़ो बातिल में रह गया

    Tareef kae liya alfaaz kam hain..
    ws

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  15. इक सिम्त खाई , दूसरी जानिब कुआँ अमीक़
    हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया

    इस सटीक बयानी पर क्या कहूँ...बेजुबान कर दिया है आपने...वाह..वा...करते ज़बान नहीं थक रही इस ग़ज़ल के लिए...
    नीरज

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  16. mai ne aapki tamam ghazlen aur nazmen padhi behad khoobsoorat hain aapko to ab tak kai award mil jaane chahiye kyunke aapka lehja classical bhi hai jadeed bhi khurdara bhi ahi aur narm bhi shabnabi bhi hai aur atish fishan bhi bahir kaif aap ek mukammal shaira hain
    http://www.aadil-rasheed-hindi.blogspot.com/

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  17. बहुत अच्छे शेर हैं। मन खुश हो गया पढ़कर।
    'जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
    ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया.

    'जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
    मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया.'

    ये बहुत उम्दा लगे।

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया