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रविवार, 3 जनवरी 2010

                                                                       ग़ज़ल
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पूछा किसी ने जा के कभी उस ग़रीब से
लड़ता है कैसे कैसे वो अपने नसीब से 
चोरी है ,रहज़नी है, धमाके हैं ,मौत है 
हालात कैसे होने लगे हैं मुहीब से 

मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए 
बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से 

बिखरी हैं ख़ाक ओ खून में लाशें यहाँ वहाँ 
लटके हुए हैं हम भी कहीं इक सलीब से 

दहशतगरों ने फूँक दिए कितने शाख़ ओ गुल
नगमा सराई छीन गए   अंदलीब से 

ऐ दुश्मनाने कौम यतीमों की लो न आह
ख़ुशियाँ न रूठ जाएँ तुम्हारे नसीब से

ये एक पुरानी ग़ज़ल है न जाने क्यों आज दिल चाहा कि इसे पोस्ट करूँ शायद आप लोगों को पसंद आये
मुहीब=डरावने , मख्दूश =संदेहास्पद , तबीब = चिकित्सक , सलीब =सूली , नगमा सराई = गाना , अंदलीब = बुलबुल , दुश्मनाने कौम =कौम के दुश्मन    

12 टिप्‍पणियां:

  1. इतने नए, तेज़-तर्रार लहजे में इतनी भरपूर गजलें आप कहेंगी तो नाचीज़ क्या करेगा? दिल से तारीफ कर रहा हूँ. वाकई मेहनत झलक रही है. इस गजल के के लिए मुबारकबाद नहीं 'शाबाश' कहूँगा.
    लेकिन, अंदलीब वाले शेर में छीन लिया का टुकड़ा, जबान के एतबार से कानों को गरां गुजरता है. आप छिन ही गयी जैसे किसी टुकड़े का इस्तेमाल कर सकती थीं.
    खता मुआफ मगर आदत से मजबूर हूँ.

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  2. इस्मत साहिबा आदाब,
    नये साल की पहली इतनी उम्दा ग़ज़ल पेश करने के लिये मुबारकबाद
    हर इक शेर अच्छा है
    (हमारी 'नुक्ताचीनी' को गुंज़ाइश न छोड़ने के लिये शुक्रिया)

    मोहतरम सर्वत साहब
    आपने बिल्कुल ठीक 'खबर' ली है इस्मत साहिबा की,
    वैसे हमें कहीं किसी के कलाम में डाउट होता है, तो मेल कर देते हैं
    (किसी को कानो-कान खबर नहीं होती हा हा हा )

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  3. shahroz sahab shukriya
    *mohtaram sarwat sahab ,kahan ap balandiyon par aur kahan main ,mujhe sharminda na karen
    agar aap ki ye aadat hai to main dua karoongi ki kam az kam mere kalam ke mamle men ye aadat na chhoote
    main us sher ko theek karne ki koshish karoongi
    *shahid sahab,shukriya tareef ka
    apni nuktacheeni jari rakhen ye mere fayede ki bat hai

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  4. क्या कहूं , हर शे’र लाजवाब. बार बार पढने को मजबूर करती गज़ल.इस शे’र ने तो गज़ल को यथार्थ की जड से जोड दिया..

    मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए
    बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से

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  5. मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए
    बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से
    bahut khoob achchhi cheez kyo pasand nahi aayegi ,happy new year

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  6. Ismat Ji,
    Naya Saal 2010 Mubarak Ho.
    Bahut hi satik likha hai aapne, yatharth per chot ki hai, aur to the poin likha hai ...Dhanyavaad Surinder.....

    पूछा किसी ने जा के कभी उस ग़रीब से
    लड़ता है कैसे कैसे वो अपने नसीब से
    चोरी है ,रहज़नी है, धमाके हैं ,मौत है
    हालात कैसे होने लगे हैं मुहीब से
    ऐ दुश्मनाने कौम यतीमों की लो न आह
    ख़ुशियाँ न रूठ जाएँ तुम्हारे नसीब से

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  7. ऐ दुश्मनाने कौम यतीमों की लो न आह
    ख़ुशियाँ न रूठ जाएँ तुम्हारे नसीब से

    उफ्फ्फ...क्या शेर कहती हैं आप...आज का दिन बन गया अपना तो...
    नीरज

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  8. बहुत अच्छी लगी ये गजल! टिप्पणियां भी कम मजेदार नहीं। बाद में आने का यह फ़ायदा होता है।
    ये वाला शेर फ़ट से समझ में आया इसलिये अच्छा भी बहुत लगा:
    मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए
    बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया