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सोमवार, 14 दिसंबर 2009

ghazal

ग़ज़ल
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दिल में बुग्ज़ छिपा रक्खा है 
मुंह पर नामे   खुदा रक्खा  है 

कोई ना समझा उस ने दिल में 

कितना दर्द छिपा रक्खा है 


मद्दे मुक़ाबिल इस आंधी के 
रौशन एक दिया रक्खा है 

भाईचारा ख़त्म ना होगा 
आस का दीप जला रक्खा है 

कल क्या होगा इन फिकरों ने 
सब का चैन उड़ा रक्खा  है 

तुम क्या दहशत ख़त्म करोगे 
तुम ने ही तो जिला रक्खा है 

बच्चों को बंदूक़ें दे कर 
कैसा खेल सिखा रक्खा है 

उस ने ख़ुद्दारी की  ख़ातिर 
ख़ुद से भी पर्दा रक्खा है 

दिल में माज़ी की यादों का 
हम ने गाँव बसा रक्खा है

इल्म तिजोरी ऐसी जिस ने  
हर इक राज़ छिपा रक्खा है 

शिकवे रंजिश भूल भी जाओ 
इन बातों में क्या रक्खा है 

किसी को राहत दे कर देखो 
तुम ने नाम 'शेफ़ा' रक्खा है 




15 टिप्‍पणियां:

  1. इल्म तिजोरी ऐसी जिस ने
    लाखों राज़ छिपा रक्खा है

    शिकवे रंजिश भूल भी जाओ
    इन बातों में क्या रक्खा है !

    बहुत ही बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  2. इस्मत जी,

    आज के दौर को बेनकाब करती बड़ी मौजूं बात कही आपने इस अशआर में :-
    कल क्या होगा इन फिकरों ने
    सब का चैन उड़ा रक्खा है

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  3. बच्चों को बंदूक़ें दे कर
    कैसा खेल सिखा रक्खा है

    दिल में माज़ी की यादों का
    गाँव एक बसा रक्खा है ....

    बहुत खूबसूरत शेर हैं ......... पूरी ग़ज़ल लाजवाब है ..........

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  4. आखिरश ! तुम आ ही गईं ब्लॉग पर ! अब होगा मज़ा हमारे साथ-साथ रोने-गाने का... बहना !!
    ग़ज़ल के बेहतरीन अशार :
    'मद्दे मुक़ाबिल इस आंधी के
    रौशन एक दिया रक्खा है
    भाईचारा ख़त्म ना होगा
    आस का दीप जला रक्खा है '

    'मेरे गुनहगार सफ़र' पर तुम्हारी टिपण्णी के लिए आभारी हूँ !
    सस्नेह--आनंद.

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  5. सहजता से बहुत गहरी बातें कही गई हैं । बहुत कही गई है ।

    दिल में बुग्ज़ छिपा रक्खा है
    मुंह पर नामे खुदा रक्खा है

    मद्दे मुक़ाबिल इस आंधी के
    रौशन एक दिया रक्खा है

    इल्म तिजोरी ऐसी जिस ने
    लाखों राज़ छिपा रक्खा है

    उत्तर देंहटाएं
  6. तुम क्या दहशत ख़त्म करोगे
    तुम ने ही तो जिला रक्खा है

    हर शे’र उम्दा सजा रक्खा है,
    हम क्या कहें अब
    ऐसा कलाम लगा रक्खा है.

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  7. aaj itne sahityik logon ki apne blog par upasthiti dekh kar main to dhanya ho gayi ,aap sab ka bahut bahut dhanyavad .

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  8. इस्मत साहिबा, ये शेर कितना अलग और खूबसूरत है-
    कल क्या होगा इन फिकरों ने
    सब का चैन उड़ा रक्खा है
    और ये-
    किसी को राहत दे कर देखो
    तुम ने नाम 'शेफ़ा' रक्खा है
    आपका कलाम पढ़ने वालों को राहत ही तो देता है
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  9. shahid sahab ,agar mere ash'ar kisi ko rahat de saken to is se zyada khushi ki kya baat ho sakti hai.shukriya.

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  10. आप के'सिरात-ए-मुस्तकीम' पर भी चलने की कोशिश की, लेकिन मौला की शान में कसीदे पर इस गुनाहगार के अल्फाज़, हिम्मत नहीं पड़ी. वहां से यही सोचकर चला कि यह किसी मुल्लानी बी का ब्लॉग है लेकिन इस ब्लाग पर आते ही आँखें खुल गईं. दौर-ए-हाज़िर पर निशाना साधते हुए, नए लबो-लहजे के अशआर ने शर्मिन्दगी में गर्क कर दिया. बकौल मिर्ज़ा ग़ालिब----
    "रेख्ती के तुम्हीं उस्त्ताद नहीं हो ग़ालिब", अपनी अकड कुछ ढीली हो गयी.
    आप ब्लाग तक आयीं, प्स्न्दीद्गी का इज़हार किया, कमेन्ट दिया, जर्रानवाजी का शुक्रिया.

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  11. shukriya sarwat sahab apke tabsere ka andaz bhi sab se juda hai ,apka khuloos hai warna main is layaq nahin hoon.

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  12. गज़ब का लिखती हो इस्मत , मज़ा आ जाता है तुम्हे पढ़कर ! शुभकामनायें !

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  13. भाईचारा ख़त्म ना होगा
    आस का दीप जला रक्खा है

    वाह...बहुत खूबसूरत शेर है...इसी तरह का एक शेर मैंने भी कहने की कोशिश की है...कामयाब हुआ या नहीं खुदा जाने...
    आयीए रौशन चरांगा फिर करें
    आंधियां गुज़रे ज़माने हो गए

    नीरज

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  14. सारे के सारे शेर बहुत अच्छे हैं। ये वाला खासकर अच्छा लगा:
    इल्म तिजोरी ऐसी जिस ने
    लाखों राज़ छिपा रक्खा है

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया