मेरे ब्लॉग परिवार के सदस्य

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ghazal


ग़ज़ल
________________________

आजकल मुल्क में बिकते तो हैं अख़बार बहुत
कुछ ख़ुशी देते हैं कुछ देते हैं आज़ार बहुत

ये अलग बात है इक फूल न खिल पाया वहां
यूँ तो उगने लगे सहरा में भी अश्जार बहुत

उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत

चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार  बहुत

सब कहाँ कोई नतीजा हमें दे पाते हैं 
मुख्तलिफ़ ज़हनों में पलते तो हैं अफ़कार बहुत 

शुक्र मौला कि कटा वक़्त सलीक़े से मेरा 
वर्ना कुछ वक़्त तलक जीना था दुशवार बहुत

सब जहाँ मिल के रहें घर करो ऐसा तामीर
यूँ मकाँ के लिए मिल जाते हैं मेमार बहुत

मेरे मालिक मुझे तौफ़ीक़ दे सच  लिखने की
और 'शेफ़ा' लिखे तेरी हमद के अश'आर बहुत

__________________________________

आज़ार =दुःख ,अश्जार =पेड़ (बहुवचन) ,सहरा = रेगिस्तान ,ख़ुद्दार =स्वाभिमानी
पुरखार = काँटों भरे ,तामीर = निर्माण ,मेमार =निर्माण करने वाले ,
अफ़कार =फ़िक्र का बहुवचन ,दुशवार =कठिन ,हम्द =खुदा की तारीफ़




10 टिप्‍पणियां:

  1. उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
    इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत
    क्या गज़ल है इस्मत.शुक्रिया, तुमने मेरी सलाह पर अमल किया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस्मत साहिबा, आदाब
    हर शेर काबिले-दाद है
    उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
    इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत
    बहुत उम्दा
    चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
    और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार बहुत
    ये शेर हासिले-ग़ज़ल कहा जायेगा
    और हां
    मकते के इस मिसरे पर फिर से गौर फरमाइयेगा

    और 'शेफ़ा' लिखे तेरी हमद के अश'आर बहुत

    बहर की जो खामी लग रही है, वो यूं भी दूर हो सकती है---
    मेरे मालिक मुझे तौफ़ीक़ दे सच लिखने की
    हम्द के कहती रहे 'शेफ़ा' भी अश'आर बहुत
    (कहते हैं, शेर कहा जाता है, लिखा नहीं जाता)
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    shahidmirzashahid@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. dhanyavad vandana.

    shahid sahab shukriya,aadab main aapke mashware par zaroor ghaur karoongi aur ek do din men nateeja saamne hoga ,inshaallah.

    उत्तर देंहटाएं
  4. शुक्र मौला कि कटा वक़्त सलीक़े से मेरा
    वर्ना कुछ वक़्त तलक जीना था दुशवार बहुत



    बहुत उम्दा अशआर...

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर शेर पर दाद देता हूँ । सहज ढंग से नाजुक गजल कही है ।
    और नीचे शब्‍दों के मायने देकर हमारा काम आसान कर दिया है । बहुत शुक्रिया !

    ये अलग बात है इक फूल न खिल पाया वहां
    यूँ तो उगने लगे सहरा में भी अश्जार बहुत

    उत्तर देंहटाएं
  6. shukriya sameer sahab

    shukriya arkjesh ji,sir aap se is shabd arkjesh ka matlab poochhna chahti hoon ,ye kis bhasha ka shabd hai ?kripya batane ka kasht karen,dhanyavad.

    उत्तर देंहटाएं
  7. शुक्रिया इस्मत जी .
    उर्दू का भी एक ब्लॉग जल्द ही खोलूंगी क्योंकि उर्दू से मुझे रूहानी मुहब्बत है ;उसमें पहली नज़्म उर्दू ही होगी ; आपकी गज़लें अच्छी लगीं ;अल्लाह आपको हक़ बात कहने की तौफिक दे ;आमीन

    उत्तर देंहटाएं
  8. bahut bahut shukriya lata saheba ,sach poochhiye to mujhe bilkul ummeed nahin thi ki aap mere blog par aa paaengi kyonki mujhe maaloom hai aap bahut masroof rahti hain .lekin aap ne mujhe ek bahut bari khushi bakhsh di ek baar aur shukriya .

    उत्तर देंहटाएं
  9. चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
    और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार बहुत

    वाह...लाजवाब ग़ज़ल...आपके इस शेर की तरह मैंने भी अपनी सदा सी ज़बान में कहने की कोशिश की है:

    बहुत कांटे चुभेंगे याद रखना
    अलग गर रास्ते तुमने चुने हैं

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  10. सब बहुत अच्छे शेर हैं। ये वाला तो याद करके रखने लायक है:
    उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
    इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत

    बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं

ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया