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रविवार, 1 नवंबर 2009

'एक डर ' कविता के बारे में मैं कुछ कहना या भूमिका बांधना नहीं चाहती

आप सभी लोग ख़ुद ही समझदार हैं ,धन्यवाद

6 टिप्‍पणियां:

  1. कल तक थे जो भाई साथ
    करने लगे वे दो दो हाथ
    अम्न्पसंदी मानवता
    आज बन गई कायरता
    मारपीट है आगज़नी है
    राज्य राज्य के बीच ठनी है
    भाई भाई के रक्त का प्यासा
    छाने लगा कैसा ये कुहासा

    मानवता का सन्देश देती सार्थक रचना....!!

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  2. इस्मत साहिबा, आदाब
    इस ''कविता'' नुमा गज़ल में आपने जो पैगाम दिया है, उसमें भूमिका के लिये कोई स्थान है भी नहीं.
    आपका फिक्र-ओ-फन किसी ''तमहीद'' का मोहताज नहीं..
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  3. shaahid sahab ,adab arz hai .aap mustaqil mere kalam ko padh rahe hain ye baat mujhe protsaahit karti hai,kisi bade shayar ya addeb ke comments naye utsaah ka sanchar karte hain ,shukriya.

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  4. आदाब !
    नज़्म तवील होने के बावजूद
    बांधे रखती है ...
    और यही इसकी खासियत भी है ....

    शाहिद जी की राए से इत्तेफाक रखता हूँ
    कि ऐसी तख्लीक़ के लिए तम्हीद
    कोई मायने नहीं रखती

    दुआओं के साथ
    मुफलिस

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  5. muflis ji bahut bahut shukriya ,bas isi tarah duaen dete rahen ,ji haan meri nazmen kabhi kabhi taveel ho jaati hain ,shayad gagar men sagar bharne ka gun abhi mujhe nahin aata .

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया