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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

बिल्कुल छोटी बह्र में एक हिन्दी ग़ज़ल की कोशिश
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ग़ज़ल
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उन की आहट 
सिमटा घूँघट
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ये कौन आया 
मन के चौखट
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भाव छिपाएं 
नैनों के पट
*
संबंधों में 
कैसी बनवट ?
*
अँधी नगरी
राजा चौपट
*
जीवन यापन 
भारी संकट
*
त्याग करे वो 
जिस में जीवट
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निर्जन पनघट
विजयी मरघट
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12 टिप्‍पणियां:

  1. निर्जन पनघट
    विजयी मरघट
    कमाल..... इतनी छोटी बह्र में लिखना बड़ी बह्र से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है. लेकिन ये मुश्किल काम भी तुमने बखूबी निभाया.

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 06 अगस्त 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, १०१ साल का हुआ ट्रैफिक सिग्नल - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. बहुत खूब, छोटी बह्र की खूबसूरत और बड़ी उम्दा ग़ज़ल ! दिली मुबारकबाद !

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया