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मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आज फिर एक हिंदी ग़ज़ल के साथ आप के समक्ष हूँ

ग़ज़ल
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छोटी सी ही आस बहुत है
थोड़ा सा उल्लास बहुत है
*
तेरे साथ जो पल-छिन बीते
उन का बस आभास बहुत है
*
उस ने नाता तोड़ लिया पर
अब भी, मन के पास बहुत है
*
मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
साथी पर विश्वास बहुत है
*
वाणी में कोमलता है पर
आँखों में उपहास बहुत है
*
वर्षों पहले जो बीता था
सीखें , तो इतिहास बहुत है
*
सुविधाओं की गोद में बैठे
कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’
*
दुख में भी मुस्काते रहना
हम को ये अभ्यास बहुत है
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15 टिप्‍पणियां:

  1. दुख में भी मुस्काते रहना
    हम को ये अभ्यास बहुत है

    संवेदनशील अभिव्यक्ति इस्मत जी ....बहुत सुंदर ....!!

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  2. मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
    साथी पर विश्वास बहुत है
    ...वाह! बहुत उम्दा भावपूर्ण ग़ज़ल...

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  3. वाणी में कोमलता है पर
    आँखों में उपहास बहुत है

    वा वाह , वा वाह . . .

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  4. जबर्दस्त है दी , हर एक शेर माशाल्लाह .आई मीन चौचक

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  5. वाह …सुविधाओं की गोद में बैठे
    कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’… यथार्थ।

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  6. छोटी सी ही आस बहुत है
    थोड़ा सा उल्लास बहुत है
    इस्मत, आज जब पूरी दुनिया में नकारात्मकता बढ रही है, ऐसे में तुम्हारी ये ग़ज़ल उत्साह और विश्वास की फुहार सी हैं....बहुत प्यारी ग़ज़ल है इस्मत. कई बार पढने के बाद भी मन नहीं भरा...
    मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
    साथी पर विश्वास बहुत है
    क्या बात.............

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  7. वाणी में कोमलता है पर
    आँखों में उपहास बहुत है

    JIYO BEHNA JIYO....IS KHOOBSURAT GHAZAL KI JITNI TARIIF KII JAY KAM HAI...LAJAWAB...WAAH.

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  8. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-11-2013 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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  9. मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
    साथी पर विश्वास बहुत है
    बहुत खूब !
    नई पोस्ट तुम

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  10. कल 29/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  11. आप सभी सम्मानित मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद !!

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  12. उस ने नाता तोड़ लिया पर
    अब भी, मन के पास बहुत है ..

    बस यही एक बात है जो जीवन को प्रेरित करती है ... खोने के बाद भी बहुत कुछ रह जाता है ... लाजवाब शेरों से सजी गज़ल ...

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  13. बेहद खूबसूरत गजल
    उत्कृष्ट प्रस्तुति.सुन्दर रचना .

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  14. सुविधाओं की गोद में बैठे
    कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’
    *
    दुख में भी मुस्काते रहना
    हम को ये अभ्यास बहुत है

    आपकी कलम को प्रणाम !!

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया