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रविवार, 1 नवंबर 2009

अक्सर यहाँ वहां होने वाले दंगों के बाद लगी आग ने ये लिखने पर मजबूर किया मजबूरी इसलिए क्योंकि ऐसी ग़ज़लें खुशी में नहीं लिखी जातीं ।

आग ही आग है हर सिम्त बुझाओ लोगो

जल रहे बस्ती में इन्सान बचाओ लोगो

दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे

हो सके गर तो ये एहसास जगाओ लोगो

दुश्मनी किस से है क्यों है ये अलग मसला है

नन्हे बच्चों पे तो मत दाओं लगाओ लोगो

टूटी ऐनक है जले बसते हरी चूड़ी है

जाओ बस्ती में ज़रा देख के आओ लोगो

बेखाताओं को न मारो यही कहते हैं धरम

जो नहीं जानते ये उन को बताओ लोगो

जब के रावण था mara राम ने ये हुक्म दिया

साथ इज्ज़त के रसूमात निभाओ लोगो

दिल है बेचैन 'शेफा' मुल्क की इस हालत पर

अब भी खामोश हैं हम ख़ुद को जगाओ लोगो

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4 टिप्‍पणियां:

  1. दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे

    हो सके गर तो ये एहसास जगाओ लोगो
    क्या बात है!! इस्मत तुम्हारी रचनायें जोश पैदा करती हैं, कुछ कर गुज़रने का जज़्बा पैदा करती है..लिखती रहो, इसी तरह. ये शब्द-पुष्टिकरण तो हटाओ.

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  2. मोहतरमा, आदाब,
    माशा अल्लाह गज़ल मुकम्मल है...
    बस.....
    ''दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे''
    मिसरे को यूं कर लीजिये
    ''दुश्मनी खत्म हो और हाथ दोस्ती का बढे''
    इसमे जो बहर के एतबार से हल्की सी खामी है, दूर हो जायेगी
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  3. बड़ी अच्छी बात आपने बहुत खूबसूरती से कही है. मैंने भी इसी विषय पर कभी दो पंक्तियाँ लिखी थी, नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करके मुलाहिजा फरमाएं. शीर्षक है :
    "प्यार देते तो प्यार मिल जाता"

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ख़ैरख़्वाहों के मुख़्लिस मशवरों का हमेशा इस्तक़्बाल है
शुक्रिया