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सोमवार, 28 मई 2018


कुछ दोहे 
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पायल को छनकाय के ,गोरी यूँ शरमाय
छुईमुई की पाति ज्यों, सिमटी सिमटी जाय
****
अहंकार में आग है, देगी सकल जलाय
औषधि है निरमल वचन,, शीतलता भर जाय
****
टिक टिक कर के हर घड़ी, देती यही बताय
जीवन गति का नाम है, जड़ मानुष पछताय
****
मावस की हर रात जब, अँधियारा घिर आय
नन्हा मिट्टी का दिया, उजियारा दे जाय
****
कहाँ गई संवेदना, जो मन को हर्षाय
जग बौराया स्वार्थ में, अपना राग सुनाय
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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

ग़ज़ल
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कहा हो हम ने कुछ , ऐसा नहीं है
कभी तुम ने भी तो पूछा नहीं है
***
मिला इन’आम सच कहने का उस को
कड़ी है धूप और साया नहीं है
***
सिखाया तज्रिबों ने ज़िंदगी के
जो आता है नज़र , वैसा नहीं है
***
सितम आराइये अहबाब देखो
मुझे चोटें तो दीं तोड़ा नहीं है
***
करेगा क़द्र इक दिन वो भी मेरी
अभी उस ने मुझे समझा नहीं है
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सितम आराइये अहबाब = दोस्तों का अत्याचार

बुधवार, 23 नवंबर 2016

ग़ज़ल
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जिन के फ़ुटपाथ पे घर ’पाओं में छाले होंगे
उन के ज़ह्नों में न मस्जिद , न शिवाले होंगे
*****
भूके बच्चों की उमीदें न शिकस्ता हो जाएं
माँ ने कुछ अश्क भी पानी में उबाले होंगे
*****
मैं बताना भी अगर चाहूं ज़माने के सितम
सामने तेरे ज़ुबां पर मेरी ताले होंगे
*****
तेरे लश्कर में कोई हो तो बुला ले उसको 
मेरा दावा है कि  इस सम्त जियाले होंगे 
*****
जंग पर जाते हुए बेटे की माँ से पूछो 
कैसे जज़्बात के तूफ़ान सँभाले होंगे 
*****
कुछ न साहिल पे मिलेगा कि ’शिफ़ा ’ उस ने तो
दुर ए यकता के लिये बह्र खंगाले होंगी

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रविवार, 14 अगस्त 2016

एक अलग मूड की ग़ज़ल जो मेरे लहजे से अलग है
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 चलो कि बज़्म ए सुख़न सजा लें
कुछ उन की सुन लें तो कुछ सुना लें

हसीन जज़्बों को जम’अ कर के
हम अपनी दुनिया अलग बसा लें

वो ख़्वाब जिन में कि तुम हो शामिल
उन्हें इन आँखों में अब छिपा लें

हैं साहिलों पर ये सर पटकतीं
उठो कि लहरों का दिल संभालें

हो जिस में बारिश की सोंधी ख़ुश्बू
बस ऐसी मिट्टी से घर बना लें

जो पाल रक्खे हैं जाने कब से
’शिफ़ा’ दिलों से भरम निकालें

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

सरहद पर तैनात जाँबाज़ सिपाहियों की नज़्र एक नज़्म इंतेज़ार _________ मुझे यक़ीन है आऊँगा लौट कर इक दिन तुम इंतेज़ार की घड़ियों का मान रख लेना ये कह के आ गया सरहद प फ़र्ज़ की ख़ातिर और आरज़ू के लिये अपनी बन गया जाबिर वो छोड़ आया है आँसू भरी निगाहों को वो छोड़ आया दुआ में उठे कुछ हाथों को वो अपनी बच्ची को सोता ही छोड़ आया है उसे भी छोड़ के आया कि जिस का जाया है बस अपने साथ में लाया है कुछ हसीं लम्हात वफ़ा की, प्यार की,शफ़क़त की ख़ूबतर सौग़ात सहारे इन के गुज़ारेगा कुछ सुकून के पल वो मुश्किलों के निकालेगा सारे ही कस-बल वो अपने मुल्क की हुरमत का मान रक्खेगा और उस की आन के बदले में जान रक्खेगा ये चन्द लम्हे जो फ़ुरसत के उस को मिलते हैं तो उस के अपनों की यादों के फूल खिलते हैं उभरने लगता है ख़ाका कि मुन्तज़िर है कोई उभरने लगती है परछाईं एक बच्ची की जो अपनी नन्ही सी बाँहें खड़ी है फैलाए कि कोई गोद में उस को उठा के बहलाए कि जिस की प्यार भरी गोद में वो इठलाए जो उस के नख़रे उठाए और उस को फुसलाए उभरने लगते हैं कुछ लब दुआएं करते हुए उभरने लगते हैं सीने वो फ़ख़्र से फूले उभरने लगती है मुस्कान एक भीगी सी उभरने लगती हैं आँखें कि जिन में फैली नमी चमकने लगते हैं सिंदूर और बिंदिया भी हो उठती गिरती सी पलकों में जैसे निंदिया भी प एक झटके में मंज़र ये सारे छूट गए ख़लत मलत हुए चेहरे तो धागे टूट गए हज़ारों मील की दूरी प सारे रिश्ते हैं चराग़ यादों के बस यूँ ही जलते बुझते हैं नई उमीद के वो तार जोड़ लेता है यक़ीं के साथ ही अक्सर ये गुनगुनाता है मुझे यक़ीन है आऊँगा लौट कर इक दिन तुम इंतेज़ार की घड़ियों का मान रख लेना _______________________________

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

बिल्कुल छोटी बह्र में एक हिन्दी ग़ज़ल की कोशिश
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ग़ज़ल
_________

उन की आहट 
सिमटा घूँघट
*
ये कौन आया 
मन के चौखट
*
भाव छिपाएं 
नैनों के पट
*
संबंधों में 
कैसी बनवट ?
*
अँधी नगरी
राजा चौपट
*
जीवन यापन 
भारी संकट
*
त्याग करे वो 
जिस में जीवट
*
निर्जन पनघट
विजयी मरघट
************************

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

आज एक हिंदी ग़ज़ल
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देह पर इक सर्प की लिपटा हुआ चंदन मिला
राजनैतिक वीथिका को इक नया आनन मिला
*
अश्रु थे आँखों में और चेहरा अटा था धूल से
घूमता गलियों में इक असहाय सा बचपन मिला
*
उसकी आहत भावनाएं सिस्कियाँ भरती रहीं
बंद अधरों में छिपे घावों का इक क्रंदन मिला
*
खुल गई हैं मन की सारी खिड़कियाँ यक्बारगी
जब विचारों का हुआ मंथन तो इक दर्शन मिला
*
मुद्दतें उस ने बिताईं शूल चुनने में ’शिफ़ा’
कितने संघर्षों से गुज़रा तब कहीं मधुबन मिला
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शनिवार, 14 मार्च 2015

 इस बार पक्का वादा है कि अब ब्लॉग पर आने में इतनी देर नहीं लगेगी

ग़ज़ल
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 ज़ुल्म की ये इंतहा और मुन्सिफ़ी सोई हुई
गर्म है बाज़ार ए ग़म लेकिन ख़ुशी सोई हुई

रेशमी बिस्तर प जागी बादशाहत रात भर
पत्थरों के फ़र्श पर है मुफ़लिसी सोई हुई

ख़ुश्बुओं की ओढ़ कर चादर , बिछा कर रौशनी
बाग़ के हर फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

इक सुकूँ चेहरे प, नन्हे हाथ माँ के गिर्द हैं
मामता की गोद में है ज़िन्दगी सोई हुई

उम्र गुज़री है मसर्रत ढूँढ्ते ही ढूँढते
ऐ ’शिफ़ा’ वो अपने अँदर ही मिली सोई हुई
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मुन्सिफ़ी=अदालत;  मुफ़लिसी= ग़रीबी;  मसर्रत= ख़ुशी;  

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

एक अरसे के बाद ग़ज़ल की शक्ल में कुछ टूटे फूटे अल्फ़ाज़ और ख़यालात के साथ हाज़िर हूँ

............. लौट भी आओ सफ़र से
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ख़बर भेजो कभी तो नामाबर से
यही हैं राब्ते अब मुख़्तसर से 
*
बहुत दुश्वार है सहरा नविरदी
बस अब तुम लौट भी आओ सफ़र से 
*
निशने पर हूँ मैं हर सम्त से ही
इधर से तीर और ख़ंजर उधर से
*
पराया कर दिया लहजे ने तेरे
मैं फिर गुज़रा नहीं उस रहगुज़र से
*
हमारे हौसले पतवार बन कर
बचा लाए सफ़ीने को भँवर से
*
तुम्हारी बेक़रारी कह रही है
कभी बिछड़े नहीं थे अपने घर से
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नामाबर= संदेश वाहक;  मुख़्तसर= छोटा ; दुश्वार= कठिन;
 सहरा नविरदी = यायावरी ; सम्त= ओर ; रहगुज़र= रास्ता ;
 सफ़ीना= नैया ; बेक़रारी = बेचैनी 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

 आज एक नज़्म ले कर हाज़िर हुई हूँ
उम्मीद है आप को पसंद आएगी

हय्या अला ख़ैरिल अमल ( नेक काम के लिये खड़े हो जाओ )
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ये ख़ौफ़ ओ दहशत के हैं मुनादी
कि ख़ुद को कहते हैं जो जेहादी
वो जिस को चाहें हलाक कर दें
वो जिस को चाहें अमान दे दें
है उन का दावा वही हैं हक़ पर
यक़ीन उन को है लफ़्ज़ ए हक़ पर
जो उन का हामी नहीं ,,वो काफ़िर
जो उन का साथी नहीं,, वो जाबिर
वो मस्जिदों में भी ख़ूँ बहा दें
वो नन्हे बच्चों को भी न बख़्शें
न जाने कितने हैं घर उजाड़े
न जाने कितने नगर उजाड़े
न जाने कैसा मुहीब सा वो
जहाँ को नक़्शा दिखा रहे हैं
वो बर्बरीयत के खेल ही को
है दीन ओ ईमाँ बता रहे 
मगर ये पूछे तो कोई उन से
यही है ईमाँ तो फिर वो क्या है?
यही है मज़हब तो फिर वो क्या है ?
कि जिस में दुश्मन से भी मुहब्बत
कि जिस में हमसाए से रेफ़ाक़त
कि जिस में है औरतों की इज़्ज़त
कि जिस में है हर नफ़स से शफ़क़त
हर एक नुक़्ता सिखा रहा है
जेहाद क्या है बता रहा है

जेहाद, फ़ितनों को रोकना है
जेहाद, हमलों को रोकना है
ये दम ब दम बढ़ती ख़्वाहिशों पर
लगाम कसना, जेहाद ही है
बुझाना प्यासे की प्यास या फिर
किसी के आँसू को पोछना हो
जेहाद के ही हैं काम सारे
जेहाद के ही हैं नाम सारे

अगरचे मैदान में है जाना
अगरचे शमशीर हो उठाना
तो तीरगी के ख़िलाफ़ उट्ठो
जहालतों के ख़िलाफ़ उट्ठो
मिटाओ बातिल के वलवलों को
कुचल दो बातिल के हौसलों को
यही है मज़हब, यही धरम है
जो तुम बताते हो वो भरम है
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मुनादी = एलान करने वाला; हलाक = मारना; मुहीब = डरावना; बर्बरीयत= बर्बरता
रेफ़ाक़त = दोस्ती; नफ़स = व्यक्ति; शफ़क़त = स्नेह ;  अगरचे = यदि; 
तीरगी = अँधेरा; बातिल = असत्य .

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल
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सदा अवाम की उट्ठी तो फिर दबा न सके
वो आज परचम ए इन्सानियत झुका न सके
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अब इम्तेहान की सा’अत में क्यों ये बेचैनी
जो सारी उम्र ही नेकी कोई कमा न सके 
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ख़ुतूत फाड़ के कोशिश तो हम ने की लेकिन
हम एक पल को भी तुम को कभी भुला न सके
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ज़रूरतें हमें आवाज़ दे रही थीं मगर
हम इस ज़मीन से कुछ दूर भी तो जा न सके
**********
ये कोशिशों में कमी थी कि कोई मजबूरी
जो हम ने अह्द किये थे उन्हें निभा न सके
**********
मिली है तरबियत ऐसी हमें बुज़ुर्गों से
क़दम कभी भी सदाक़त के डगमगा न सके
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अवाम= जनता; परचम= झंडा; सा’अत= समय
सदाक़त= सच्चाई

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

 एक फ़िलबदीह (आशु) ग़ज़ल 
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दिल की बस्ती उजड़ गई है अभी
ज़ख़्मी ज़ख़ी सी ज़िंदगी है अभी
*
उस की ज़िंदादिली से लगता है
कोई मुश्किल नहीं पड़ी है अभी
*
मेरी हालत प मुस्कुराता है
उम्र तेरी कहाँ कटी है अभी ?
*
शाम के साए हो गए गहरे
दर प इक शम’अ सी जली है अभी
*
उस के चेहरे प दास्ताँ पढ़ लूँ
इतनी आँखों में रौशनी है अभी
*
ऐ ’शेफ़ा’ किस ने जंग छेड़ी है?
तेरी तो सब से दोस्ती है अभी

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

इस बार कुछ क़िता’त पेश ए ख़िदमत हैं

क़िता’त
_________

झूट पर झूट है, अय्यारी है, मक्कारी है
और हक़ीक़त ये बताती है सितम जारी है
कितने मासूम हैं गोदी में अजल की सोए
हाकिम ए शह्र का कहना है अदाकारी है

***
ख़ुदा की है अताकरदा वो क़ूवत बेज़बानों में
कि जो हलचल मचा सकती है ज़ालिम हुक्मरानों में
उठो अब मुत्तहिद हो कर इन्हें समझो वगरना फिर
कहीं गुम हो के रह जाओगे तुम इन दास्तानों में
***
क़दरें बदल गई हैं ,ज़माना बदल गया
इंसानियत का आज तराना बदल गया
तिफ़्लान ए दौर के भी रुख़ों पर है बेबसी
मासूमियत का ठौर-ठिकाना बदल गया
***
क्या रोक पातीं उस को सुनहरी ये तीलियाँ
पर्वत प हौसलों के जो आबाद हो गया
करता रहा मैं क़ैद ओ क़फ़स पर ही तब्सेरे
वो तीलियों को तोड़ के आज़ाद हो गया
**************************

अय्यारी= मक्कारी का पर्याय ; अजल= मौत ; अताकरदा= दी हुई; 
मुत्तहिद= एक हो कर (unite) ; क़दरें= मूल्य (values) ; 
तिफ़्लान ए दौर = आज के बच्चे ; क़फ़स= पिंजरा , जेल ;
तब्सेरे= टिप्पणी

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आज फिर एक हिंदी ग़ज़ल के साथ आप के समक्ष हूँ

ग़ज़ल
*********

छोटी सी ही आस बहुत है
थोड़ा सा उल्लास बहुत है
*
तेरे साथ जो पल-छिन बीते
उन का बस आभास बहुत है
*
उस ने नाता तोड़ लिया पर
अब भी, मन के पास बहुत है
*
मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
साथी पर विश्वास बहुत है
*
वाणी में कोमलता है पर
आँखों में उपहास बहुत है
*
वर्षों पहले जो बीता था
सीखें , तो इतिहास बहुत है
*
सुविधाओं की गोद में बैठे
कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’
*
दुख में भी मुस्काते रहना
हम को ये अभ्यास बहुत है
****************************

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लंबा अरसा गुज़र जाता है और शायद आप लोग
 भूलने लगते होंगे तो मैं फिर कुछ न कुछ
 ले कर हाज़िर हो जाती हूँ और 
आज तो
ब्लॉग की सालगिरह भी है
________________

ग़ज़ल
_______

 सपनों में तू आया कर
स्वर्ग की सैर कराया कर

नफ़रत की चिंगारी पर 
प्रेम सुधा बरसाया कर

चाँद को पाना नामुमकिन
चातक को समझाया कर

नाउम्मीदी कुफ़्र भी है
आस के दीप जलाया कर

दिल तो ज़िद्दी बच्चा है
प्यार की बीन बजाया कर

वक़्त का पहिया घूमेगा
इतना मत इतराया कर

कमज़र्फ़ी के मारों को
आईना दिखलाया कर
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

एक नज़्म हाज़िर ए ख़िदमत है 

ख़्वाहिश
________

वो रोकता मुझे इक बार 
मैं पलट आता
मैं उस के जौर ओ सितम
ख़ुशदिली से सह लेता
मुझे वो मूरिद ए इल्ज़ाम
भी जो ठहराता
ख़ुशी से सारे वो इल्ज़ाम
ख़ुद पे ले लेता
मैं उस की छोटी सी ख़्वाहिश
पे जाँ लुटा देता
मुहब्बतों का जनाज़ा
 मैं दफ़्न कर देता

मगर न जाने कि क्या 
जुर्म हो गया मुझ से
न उस ने मुझ को बुलाया
न इक दफ़’आ रोका
मैं अपनी लाश को
कांधों पे अपने ढोता रहा
और एक वक़्त ये आया
सुपुर्द ए ख़ाक हुआ

बस एक चीज़ ही
ज़िंदा रही मेरे अंदर
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे पुकारेगा
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे बुला लेगा
वो इक यक़ीन भी देगा
कि कुछ हुआ ही न था
वो मेरा दोस्त कभी मुझ से 
यूँ ख़फ़ा ही न था 
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जौर ओ सितम = अत्याचार, ज़ुल्म ,,,,,मूरिद ए इल्ज़ाम= आरोपी,,,,
जनाज़ा= शव,,,,सुपुर्द ए ख़ाक=धरती को सौंपना ,दफ़्न कर देना,,,,


मंगलवार, 6 अगस्त 2013

आज उर्दू ग़ज़ल पर वापस आते हैं,,यूँ तो ग़ज़ल, ग़ज़ल है चाहे वह किसी भी भाषा में हो 
क्योंकि उस का आधार तो भावनाएं हैं , जज़्बात हैं 
और इन्हें ज़ुबान के बदल जाने से 
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

ग़ज़ल
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शफ़क़त* निसार* की है ,निगाहों ने उम्र भर
महफ़ूज़* रक्खा माँ की दुआओं ने उम्र भर
__________
थीं मेरे पास अपनों की सारी मुहब्बतें 
फिर भी दिया है साथ परायों ने उम्र भर
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शायद मिले सुकून अजल* की पनाह में
लेने दिया न चैन ख़ताओं * ने उम्र भर
___________
मज़हब के नाम पर जहाँ तलवार खिंच गई
नादिम* किया है ऐसी सभाओं ने उम्र भर
___________
चाहा मगर न दिल से वो एह्सास मिट सका
ज़ख़्मी किया शिकस्त* के लम्हों ने उम्र भर
___________
ठोकर जो खाई फिर न क़दम रख सके ’शेफ़ा’
यूँ तो सदाएं दीं  तेरी राहों ने उम्र भर
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शफ़क़त= वात्सल्य,स्नेह ,,,,,, निसार= न्योछावर,,,,,
महफ़ूज़= सुरक्षित,,,,,,अजल= मौत,,,,,,
ख़ताओं= ग़ल्तियों,,,,,,नादिम= शर्मिंदा, लज्जित,,,,,,
शिकस्त= हार, पराजय

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ग़ज़ल


एक और हिंदी ग़ज़ल आप के समक्ष प्रस्तुत है

ग़ज़ल
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कैसे बिसराऊं भला बीता हुआ पल कोई
कल्पनाओं में जो बजती रहे पायल कोई
****
कोई संवाद नहीं और कोई संबंध नहीं
भाव जीवन में नहीं रह गया कोमल कोई
****
कितनी चिंताओं का वो बोझ लिये फिरता है
अब न बचपन है, न बच्चा रहा चंचल कोई
****
कैसी संवेदना, कैसी करुणा और दया
हम ने जब छोड़ दिया रस्ते पे घायल कोई
****
कामना है कि बनूँ ऐसी बयारें इक दिन
कर सकूँ तपता हुआ मन कभी शीतल कोई
****
अब न करना कभी साहस उसे तुम छलने का
हिरनियाँ भी हैं सबल, समझे न निर्बल कोई
****
ऐ ’ शेफ़ा’ छोड़ गई माँ तेरी जब से तुझ को
वैसा स्पर्श मिला तुझ को न आँचल कोई
**************************************

गुरुवार, 30 मई 2013

एक हिंदी ग़ज़ल प्रस्तुत करने का साहस कर रही हूँ
जो कमियाँ हों उन से अवगत कराने की कृपा अवश्य करें
धन्यवाद !
ग़ज़ल

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हम कर्तव्यों को पूर्ण करें, माँगें केवल अधिकार नहीं
मानव से मानव प्रेम करे,संबंधों का व्यापार नहीं

जिस धरती माँ में सहने की शक्ति का पारावार न हो
उस का मत इतना दमन करो ,वह कह दे तुम स्वीकार नहीं

जैसे सागर में सरिता हो,जैसे पुष्पों से भ्रमर मिले
निस्सीम प्रेम आधार बने, उपकार रहे अपकार नहीं

नि:स्वार्थ प्रेम के भाव लिये ये कौन है मन के द्वार खड़ा
आगंतुक तुम ही बतला दो, क्यों पहले आए द्वार नहीं

कंगन,चूड़ी,पायल,बिछिया,मेंहदी,रोली,झूमर,टीका
सब भावों के संवाहक हैं ,केवल सज्जा-श्रंगार नहीं

सर्वस्व निछावर करने को,तय्यार है सैनिक सीमा पर
है देश प्रेम ही बल उसका, बंदूक़ नहीं , तलवार नहीं

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मंगलवार, 7 मई 2013

एक महीने के वक़फ़े के बाद एक ग़ज़ल के साथ फिर हाज़िर हूँ
शायद पसंद आए

ग़ज़ल
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धड़कनें हों जिस में, वो ऐसी कहानी दे गया
चंद   किरदारों की कुछ यादें पुरानी दे गया
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टूटे    फूटे   लफ़्ज़   मेरे   शेर   में   ढलने   लगे
मेरा मोह्सिन मुझ को ये अपनी निशानी दे गया
*****
रोज़ ओ शब की रौनक़ें, वो क़हक़हे, वो महफ़िलें
साथ  अपने  ले  गया  और  बेज़बानी   दे   गया
*****
क्यों ख़ताएं उस की गिनवाते हो तुम शाम ओ सहर
बीज  ख़ुद  बोए  थे  तुम  ने , बस  वो  पानी  दे गया
*****
ज़िंदगी   ख़ुद्दारियों   के   साए   में   ही   कट   गई
बस  विरासत   में वो  अपनी  जाँफ़ेशानी   दे गया
***** 
माँ का आँचल ,बाप की शफ़क़त के साए का सुकूँ
दूर   सरहद  पर  जवाँ  हर   शादमानी   दे  गया 
*****
इक मता’ ए फ़िक्र ओ फ़न ,हाथों में तेरे सौंप कर
ऐ  ’शेफ़ा’  वो   तेरे   ज़िम्मे   पासबानी  दे  गया
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किरदार= चरित्र; मोहसिन= जिस ने उपकार किया हो
ख़ताएं= दोष; जाँफ़ेशानी= कड़ी मेहनत; शफ़क़त= स्नेह
शादमानी= ख़ुशी; मता’ ए फ़िक्र ओ फ़न= चिन्तन और कला की दौलत;
पासबानी= रक्षा