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रविवार, 3 जनवरी 2010

                                                                       ग़ज़ल
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पूछा किसी ने जा के कभी उस ग़रीब से
लड़ता है कैसे कैसे वो अपने नसीब से 
चोरी है ,रहज़नी है, धमाके हैं ,मौत है 
हालात कैसे होने लगे हैं मुहीब से 

मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए 
बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से 

बिखरी हैं ख़ाक ओ खून में लाशें यहाँ वहाँ 
लटके हुए हैं हम भी कहीं इक सलीब से 

दहशतगरों ने फूँक दिए कितने शाख़ ओ गुल
नगमा सराई छीन गए   अंदलीब से 

ऐ दुश्मनाने कौम यतीमों की लो न आह
ख़ुशियाँ न रूठ जाएँ तुम्हारे नसीब से

ये एक पुरानी ग़ज़ल है न जाने क्यों आज दिल चाहा कि इसे पोस्ट करूँ शायद आप लोगों को पसंद आये
मुहीब=डरावने , मख्दूश =संदेहास्पद , तबीब = चिकित्सक , सलीब =सूली , नगमा सराई = गाना , अंदलीब = बुलबुल , दुश्मनाने कौम =कौम के दुश्मन    

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

ग़ज़ल
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क्या कहूं कि क्या  बयां पहले हुआ
कुछ यहाँ और कुछ वहां पहले हुआ

मैं ने यकजहती की इक  कोशिश ही की
मेरा साथी बदगुमां पहले हुआ

थी सई जज़्बात पर क़ाबू रहे
पर वो आँखों से रवां पहले हुआ

दुश्मनों से क्या शिकायत हो अगर
दोस्त ही शोला बयां पहले हुआ

अब तो जन्नत दूर मुझ से हो गयी
"क्यों न एहसासे ज़ियाँ पहले हुआ "

जो छिपाना चाहता था उस से मैं
राज़ उस पर ही अयाँ पहले हुआ

मुल्क टुकड़ों में बँटा जाता है ये
ज़ख्म का दरमाँ कहाँ पहले हुआ ?

खौफ़ का माहौल हर सू है 'शेफ़ा'
हाथ में तीर ओ कमां पहले हुआ
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यकजहती=एकता , सई =कोशिश ,शोलाबयाँ =नाराज़
ज़ियाँ =हानि, अयाँ =प्रकट ,दरमाँ =इलाज
खौफ़ =डर

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

     एक कविता वीरों के नाम
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आज संसद में बड़ी शान से जो बैठे हैं
लेके चेहरों पे हंसी और चमक बैठे हैं
आज वे भूल गए जबकि हुआ था हमला
आज वे भूल गए कैसे बची जाँ उनकी
आज वे भूल गए घुस गए होते उस दिन
लेके हथियारों का अंबार अगर आतंकी

न बचा होता कोई नामो निशाँ भी उनका
आज बाक़ी न बची होती ये चेहरों पे हंसी
पायी उन वीरों ने जब वीरगति सब थे दुखी
आज ये याद नहीं नाम थे क्या क्या उनके
उनके बच्चों का नहीं कोई सहारा बाक़ी
बूढ़े माँ बाप की आँखों में है दरिया बाक़ी
आज इतना भी नहीं वक़्त कि फूल उन पे चढ़ाएं
आज इतना भी नहीं वक़्त कि हम मौन रखें
गर ये बर्ताव रहा देश के नेताओं का
गर ये बर्ताव रहा देश के दिलवालों का
फिर कभी देश के बच्चों से न आशा रखना
क्योंकि नेता  तो दिखायेंगे तमाशा अपना
फिर हमें वीर नहीं कोई बचा पायेगा
हम को तो स्वार्थ का दानव ही निगल जायेगा
आत्मा अपनी जगाने की ज़रुरत है हमें
फूल आदर के चढ़ाने की ज़रुरत है हमें

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अभी कल ही एक ग़ज़ल ब्लॉग पर लिखी गयी है लेकिन आज अगर ये न लिखी जाती तो समसामयिक न रह जाती ,अभी १३ दिसम्बर को गुज़रे दो ही दिन हुए हैं ,यादें ताज़ा हो गयी हैं .





सोमवार, 14 दिसंबर 2009

ghazal

ग़ज़ल
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दिल में बुग्ज़ छिपा रक्खा है 
मुंह पर नामे   खुदा रक्खा  है 

कोई ना समझा उस ने दिल में 

कितना दर्द छिपा रक्खा है 


मद्दे मुक़ाबिल इस आंधी के 
रौशन एक दिया रक्खा है 

भाईचारा ख़त्म ना होगा 
आस का दीप जला रक्खा है 

कल क्या होगा इन फिकरों ने 
सब का चैन उड़ा रक्खा  है 

तुम क्या दहशत ख़त्म करोगे 
तुम ने ही तो जिला रक्खा है 

बच्चों को बंदूक़ें दे कर 
कैसा खेल सिखा रक्खा है 

उस ने ख़ुद्दारी की  ख़ातिर 
ख़ुद से भी पर्दा रक्खा है 

दिल में माज़ी की यादों का 
हम ने गाँव बसा रक्खा है

इल्म तिजोरी ऐसी जिस ने  
हर इक राज़ छिपा रक्खा है 

शिकवे रंजिश भूल भी जाओ 
इन बातों में क्या रक्खा है 

किसी को राहत दे कर देखो 
तुम ने नाम 'शेफ़ा' रक्खा है 




बुधवार, 9 दिसंबर 2009

एक ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है .....................
ग़ज़ल
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आज का तिफ़्ल ओ जवाँ ही और है
ख्वाहिशों   की कहकशां ही और है

उन लबों पर मुस्कराहट है तो क्या
दिल में इक दर्दे नेहाँ ही और है

बेच कर आया हूँ मैं अपना ज़मीर
आज एहसासे ज़ियाँ ही और है

मैं तो जाहिल था, मुझे समझा गया
उस का अंदाज़े बयां ही और है

दिल की आँखों से वो सब देखा किया
उस का नाबीना जहाँ ही और है

शह्र के पुख्ता मकाँ हैं और घुटन
गाँव का कच्चा मकाँ ही और है

बिक गयी वो हिर्स के बाज़ार में 
मुफलिसी की ये फ़ुगां ही और है

जिस की स्याही में हो रंगे दुश्मनी
चार जानिब वो धुवां  ही और है

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तिफ़्ल  =बच्चा , कहकशां =मिल्की वे , नेहाँ =छिपा हुआ , ज़ियाँ=हानि , नाबीना =अँधा (अँधेरी दुनिया )
पुख्ता=पक्के , हिर्स =लालच , फ़ुगां =क्रंदन ,स्याही =कालिख ,जानिब =तरफ़ ,ज़मीर =अंतरात्मा .





शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ghazal


ग़ज़ल
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आजकल मुल्क में बिकते तो हैं अख़बार बहुत
कुछ ख़ुशी देते हैं कुछ देते हैं आज़ार बहुत

ये अलग बात है इक फूल न खिल पाया वहां
यूँ तो उगने लगे सहरा में भी अश्जार बहुत

उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत

चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार  बहुत

सब कहाँ कोई नतीजा हमें दे पाते हैं 
मुख्तलिफ़ ज़हनों में पलते तो हैं अफ़कार बहुत 

शुक्र मौला कि कटा वक़्त सलीक़े से मेरा 
वर्ना कुछ वक़्त तलक जीना था दुशवार बहुत

सब जहाँ मिल के रहें घर करो ऐसा तामीर
यूँ मकाँ के लिए मिल जाते हैं मेमार बहुत

मेरे मालिक मुझे तौफ़ीक़ दे सच  लिखने की
और 'शेफ़ा' लिखे तेरी हमद के अश'आर बहुत

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आज़ार =दुःख ,अश्जार =पेड़ (बहुवचन) ,सहरा = रेगिस्तान ,ख़ुद्दार =स्वाभिमानी
पुरखार = काँटों भरे ,तामीर = निर्माण ,मेमार =निर्माण करने वाले ,
अफ़कार =फ़िक्र का बहुवचन ,दुशवार =कठिन ,हम्द =खुदा की तारीफ़




सोमवार, 30 नवंबर 2009

ek ghazal

एक ग़ज़ल हाज़िरे ख़िदमत है |

'ग़ज़ल'

मुनफ़रिद है वो ज़माने को बताया उसने
क्या है हुब्बुलवतनी कर के दिखाया उसने

वो ख़ुशी मिल गयी जिस का मुतमन्नी था दिल
चंद रोते हुए बच्चों को हंसाया उसने

दर्स ओ तदरीस ज़रूरी है तरक्क़ी के लिए
जा के मजदूर के बच्चों को पढ़ाया उसने

अब नहीं कोई भी मालिक न यहाँ कोई ग़ुलाम
अपनी काविश से ये तफरीक मिटाया उसने

थी वो इक नन्ही सी चिड़िया जिसे ख़ुद पर था यक़ीं
आग को चोंच के पानी से बुझाया उसने

जब भी माज़ी में गया ,जल्द न वापस लौटा
चंद लम्हों को जिया ,ख़्वाब चुराया उसने

जब 'शेफ़ा' भूल गयी अपने तमद्दुन का मेज़ाज
अपनी क़ुर्बानियों से याद दिलाया उसने

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