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बुधवार, 9 दिसंबर 2009

एक ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है .....................
ग़ज़ल
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आज का तिफ़्ल ओ जवाँ ही और है
ख्वाहिशों   की कहकशां ही और है

उन लबों पर मुस्कराहट है तो क्या
दिल में इक दर्दे नेहाँ ही और है

बेच कर आया हूँ मैं अपना ज़मीर
आज एहसासे ज़ियाँ ही और है

मैं तो जाहिल था, मुझे समझा गया
उस का अंदाज़े बयां ही और है

दिल की आँखों से वो सब देखा किया
उस का नाबीना जहाँ ही और है

शह्र के पुख्ता मकाँ हैं और घुटन
गाँव का कच्चा मकाँ ही और है

बिक गयी वो हिर्स के बाज़ार में 
मुफलिसी की ये फ़ुगां ही और है

जिस की स्याही में हो रंगे दुश्मनी
चार जानिब वो धुवां  ही और है

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तिफ़्ल  =बच्चा , कहकशां =मिल्की वे , नेहाँ =छिपा हुआ , ज़ियाँ=हानि , नाबीना =अँधा (अँधेरी दुनिया )
पुख्ता=पक्के , हिर्स =लालच , फ़ुगां =क्रंदन ,स्याही =कालिख ,जानिब =तरफ़ ,ज़मीर =अंतरात्मा .





शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ghazal


ग़ज़ल
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आजकल मुल्क में बिकते तो हैं अख़बार बहुत
कुछ ख़ुशी देते हैं कुछ देते हैं आज़ार बहुत

ये अलग बात है इक फूल न खिल पाया वहां
यूँ तो उगने लगे सहरा में भी अश्जार बहुत

उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत

चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार  बहुत

सब कहाँ कोई नतीजा हमें दे पाते हैं 
मुख्तलिफ़ ज़हनों में पलते तो हैं अफ़कार बहुत 

शुक्र मौला कि कटा वक़्त सलीक़े से मेरा 
वर्ना कुछ वक़्त तलक जीना था दुशवार बहुत

सब जहाँ मिल के रहें घर करो ऐसा तामीर
यूँ मकाँ के लिए मिल जाते हैं मेमार बहुत

मेरे मालिक मुझे तौफ़ीक़ दे सच  लिखने की
और 'शेफ़ा' लिखे तेरी हमद के अश'आर बहुत

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आज़ार =दुःख ,अश्जार =पेड़ (बहुवचन) ,सहरा = रेगिस्तान ,ख़ुद्दार =स्वाभिमानी
पुरखार = काँटों भरे ,तामीर = निर्माण ,मेमार =निर्माण करने वाले ,
अफ़कार =फ़िक्र का बहुवचन ,दुशवार =कठिन ,हम्द =खुदा की तारीफ़




सोमवार, 30 नवंबर 2009

ek ghazal

एक ग़ज़ल हाज़िरे ख़िदमत है |

'ग़ज़ल'

मुनफ़रिद है वो ज़माने को बताया उसने
क्या है हुब्बुलवतनी कर के दिखाया उसने

वो ख़ुशी मिल गयी जिस का मुतमन्नी था दिल
चंद रोते हुए बच्चों को हंसाया उसने

दर्स ओ तदरीस ज़रूरी है तरक्क़ी के लिए
जा के मजदूर के बच्चों को पढ़ाया उसने

अब नहीं कोई भी मालिक न यहाँ कोई ग़ुलाम
अपनी काविश से ये तफरीक मिटाया उसने

थी वो इक नन्ही सी चिड़िया जिसे ख़ुद पर था यक़ीं
आग को चोंच के पानी से बुझाया उसने

जब भी माज़ी में गया ,जल्द न वापस लौटा
चंद लम्हों को जिया ,ख़्वाब चुराया उसने

जब 'शेफ़ा' भूल गयी अपने तमद्दुन का मेज़ाज
अपनी क़ुर्बानियों से याद दिलाया उसने

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

shraddhanjali

ये कविता उन वीरों को समर्पित जिन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे  दी

              श्रद्धांजलि

दहशतगर्दी ख़त्म करूंगा ,
ऐसा था उसका सपना ,
बेरहमों को धूल चटाकर ,
प्रण था दृढ़ किया अपना .

साहस की  दुनिया में उसका ,
बड़ा नाम जाना जाता ,
पुरस्कार थे ढेरों जीते,
वीर बहुत माना जाता.

उस दिन आतंकी थे सम्मुख ,
जम कर युद्ध किया उस ने,
उनमें से कुछ मार गिराए ,

बचे हुए किये वश में .

होनी को पर टाला किस ने ,
मृत्युतिथि उस की आई ,
वीरों की राहों पर चल कर ,
वीरगति उस ने पायी.

माता -पिता की आँख का तारा ,
कायरता ने छीन लिया ,
बहनों की राखी का धागा,
सदा सदा को टूट गया.

पत्नी का सिन्दूर मिट गया ,
रहा सहारा कोई नहीं ,
बच्चों को अब राह दिखाने ,
दिया जलाता कोई नहीं.

सहते हैं सब दुःख तकलीफें ,
माता -पिता पर गर्वित हैं,
घर की दीवारों पर उनके,
सारे मेडल शोभित हैं.

हर मेडल को देख के बच्चा  ,
पापा पर अभिमान करे  ,
उनके जैसा ही बनना है,
जग जिस का सम्मान करे .

उनके इस बलिदान को भारत,
कभी भुला ना पायेगा ,
आततायी को दूर भगा कर ,
श्रद्धा सुमन चढ़ाएगा .
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बुधवार, 18 नवंबर 2009

कविता

महिला आरक्षण
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वह नहीं चाहती आरक्षण
वह नहीं चाहती संरक्षण
इस दौर की नारी सबला है
ये मत सोचो वह अबला है
नारी में अक्षुण शक्ति है
बुद्धि है उसमें युक्ति है
वह राजनीति हो ,शिक्षा हो
या धर्म के क्षेत्र की दीक्षा हो
विज्ञानं हो या साहित्य विधा
हो क्षेत्र चिकित्सा का ,कि कला
हो मदर टेरेसा या इंदिरा
वह बचेंद्री हो या हो कल्पना
वह बनी कभी रानी झाँसी
वह हेलेन है ,वह है curie
हर क्षेत्र में उसने सिद्ध किया
अब नहीं चाहिए निर्भरता
आरक्षण की क्यों बात उठी ?
क्या कोई कमी नारी में दिखी?
तैयार है वह लड़ने के लिए
स्वदेश पे मर मिटने के लिए
क्यों उस की वीरता पर है शक ?
क्या उसकी बुद्धि से है डर?
छोड़ो नारी अधिकार ,हनन
मत बहलाओ ,दे आरक्षण
वह कहीं पुरूष से नहीं है कम
हैं उसमें भी सारे दम ख़म
वह पात्र तो है सम्मानों की
न बलि चढ़े अरमानों की
वह दूजे के सब दुःख हर ले
अन्याय परन्तु नहीं सहे
केवल सहयोग की है इच्छा
वह नहीं चाहती है भिक्षा
वह न्याय की ही अधिकारी है
अनुकम्पा उस पर भारी है
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बुधवार, 11 नवंबर 2009

parivartan

mere naam ka talaffuz shefa hai ,aur main kajgaon(jaunpur) ki rahne wali hoon ,pahle jo ghalti ho gayi use mainne sudhaar liya hai.shafa jaunpuri aur shefa kajgaonvi ek hi hain.
वंदे मातरम
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धरती माँ ,तू सब की माँ है
तूने ममता सब पे लुटाई
कृपा दृष्टि की सबपे बराबर
सब को इक आँचल में समेटा
तूने न कोई अन्तर जाना
इक तेरा भी जन्मदाता है
नीली छतरी वाला ऊपर
तेरे ये संस्कार भी शायद
उसी इश्वर के कारण हैं
वो भी करे न अन्तर कोई
सब को दे वह दुःख भी सुख भी
सब पायें जल शीतल निर्मल
वर्षा पायें और प्रकाश भी
सूर्य का उज्ज्वल
इस माँ से मानव ने सीखा
कैसे धैर्य dharaa करते हें
हम ने सीखा अहम् हटाकर
कैसे मिलजुल रह सकते हैं
रब ने हम को सब कुछ बख्शा
धरती जैसी माता देकर
नील गगन स साया देकर
सागर जैसा ह्रदय देकर
स्वाभिमान हिम जैसा देकर
फिर भी मानव भूल गया सब
वे सारे उपकार ईश के
भारत माँ की saariममता
धरती की अक्षय सुन्दरता
शब्दों का सुंदर गुलदस्ता
केवल गीतों की है क्षमता
वंदे मातरम कह कर वंदन
धरती माँ का ही करते हें
हम माँ की तारीफ़ करें या
माँ का कुछ गुणगान करें तो
धर्म कभी aare आएगा?
धर्म तो इक मज़बूत किला है
naitiktaa इसकी दीवारें
यकजहती इसका दरवाजा
माँ के पैर के नीचे जन्नत
सब धर्मों ने यही बताया
फिर क्यों और कैसा असमंजस?
वंदे मातरम माँ का है यश
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