मेरे ब्लॉग परिवार के सदस्य

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जहाँ आजकल हमारे देश में 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया 'द्वारा चलाई गयी मुहिम '' अमन की आशा '' के चर्चे हैं ,वहीँ आदरणीय ''सतीश सक्सेना जी '' ने भी  उम्मीदों की एक मशाल रौशन  की है ,ये रचना इसी मशाल में शामिल एक नन्ही सी लौ है .अगर किसी एक शख्स के दिल में भी टाइम्स की,सतीश जी की या मेरी ये कोशिश उम्मीदों की लौ को तेज़ कर सकी तो ये अमन की दिशा में एक और रचनात्मक क़दम होगा .
'मादरे वतन '
------------------------
इस मादरे वतन के ज़ख्मों को मत कुरेदो ,
जो दे सको तो इस को मरहम ज़रूर दे दो . 
बच्चे जो इस के बिछड़े, अब तक न मिल सके हैं ,
बेचैन है ये मादर तस्कीन इस को दे दो. 
बेवजह लड़ रहे हैं इक दूसरे से भाई ,
ये दुश्मनी मिटाकर , फ़ह्म ओ शऊर दे दो .
जब बात आश्ती की, अम्नो अमां की आये ,
बस मुस्कुराहटें ही इक दूसरे को दे दो .
अब बुग्ज़ और कीना, दिल से निकाल फेंको, 
ये चाल है सियासी, तुम इनको मात दे दो .
कुछ तुम भी भूल जाओ ,कुछ हम भी भूल जाएँ ,
बस इक यक़ीन ले लो और इक यक़ीन दे दो .

मादर=माँ  , फ़ह्म ओ शऊर =बुद्धि और विवेक  , आश्ती = शान्ति  , बुग्ज़ = ईर्ष्या 
कीना = नफ़रत 

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

                                          आप सभी को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें  

२६ जनवरी के अवसर पर एक कविता प्रस्तुत है ,यदि राष्ट्रीय ध्वज बोल पाता तो वो अपनी अभिलाषा कैसे प्रकट करता , कहीं  कोई  बात आपके मन को छू जाये ,तो आशीर्वाद की कामना करती हूँ ,
                                                                                                             धन्यवाद .
राष्ट्रीय ध्वज की अभिलाषा 
________________________________
ध्वज हूँ मैं भारत का मेरी छोटी सी है अभिलाषा ,
पूर्ण करेंगे भारतवासी ऐसी मुझ को है आशा ,
किन्तु इस से पहले कि मैं बात करूँ अभिलाषा की, 
कुछ ऐसे पन्ने मैं खोलूँ जो अतीत के हैं साक्ष


देश का जब अस्तित्व मिटाने शत्रु थे भारत आये 
धोखे से थे गाँव, नगर और राज्य हमारे हथियाए, 
जब पूरे भारत को बैरी दास  बना कर के ख़ुश था, 
    तब सच्चे भारतवासी को उसी दासता का दुःख था.


ऐसे में अगणित वीरों ने मुझ को जीवनदान दिया, 
और देश को आज़ादी का मूल्यवान वरदान दिया ,
जब मैं पहली बार पवन के झोंकों से लहराया था ,
मेरी आँखों में उस दिन ये पहला सपना आया था.


मैं ने देखा देश में चारों ओर थी फैली हरियाली ,
भारतवासी ख़ुश थे  बिखरी सभी ओर थी ख़ुशहाली,
पर जब मेरी आंख खुली मैं चकित हुआ घबराया था ,
देखा चारों ओर थी हिंसा अंधकार सा छाया था .


सहसा मेरे मन में कुछ अभिलाषा के अंकुर फूटे ,
इच्छा है कि जुड़ जाएँ जो सपने थे मेरे टूटे ,
सब भारतवासी हैं भाई ,सभी इसी  को  सच मानें,
भारत माता के लहराते आँचल को पावन जानें . 


नेता सोचें देश के हित में ,निज हित से ऊपर आयें
महाशक्ति के किसी प्रभाव में देश न हम अपना खोएं 
आदर हो ,सम्मान बड़ों का ,बलिदानों का अर्चन हो 
द्वेष भाव ,कुकर्म ,शत्रुता का दृढ़ता से तर्जन हो


खेतों में गेहूं ही बोयें ,रोपें नहीं वहां हथियार 
बच्चों को दें ज्ञान की ज्योति ,मजदूरी का ले लें भार
अपराधी को मिले सज़ा और  दुखियों को इंसाफ़ मिले 
नारी जाति का आदर हो ,कहीं न कोई नार जले 


ऐसा भारत देश बनाओ जिस पर सब अभिमान करें 
प्रेम ,एकता  और समानता के ही अब तो दीप जलें 
मानवता की औषधि से तुम रोगी का उद्धार करो 
विपदा में हो गर दुश्मन भी ,तुम उसको स्वीकार करो 


मैं भारत की गरिमा हूँ,तुम सब की ज़िम्मेदारी हूँ 
अभिलाषा परिपूर्ण हुई तो मैं सब का आभारी हूँ 


__________________________________________________________________- 








  




रविवार, 17 जनवरी 2010

............शोर ही मह्फ़िल में रह गया

ग़ज़ल
_____________________
नगमा जो प्यार का था,मेरे दिल में रह गया
दह्शत्गरी का शोर ही महफ़िल में रह गया

इक सिम्त खाई , दूसरी जानिब कुआँ अमीक़
हिन्दोस्ताँ तो आज भी मुश्किल में रह गया

है सच पे झूठ ,झूठ पे सच की कई परत
मैं तो उलझ के बस हक़ो बातिल में रह गया

जो भी परिन्द चहका ,क़फ़स बन गया नसीब
ख़ुशियों का राग , नालए बिस्मिल में रह गया

जो मेरे हमसफ़र थे वो आगे निकल गए
मैं अपनी ख्वाहिशों की सलासिल में रह गया

बेदार कर रहा था जो बातों से इल्म की
बे दस्तो पा,वो हलकै क़ातिल में रह गया

थी आरज़ू लबों पे तबस्सुम बिखेर दूं
अरमान घुट के ये भी मेरे दिल में रह गया

नग़मा = गाना ,अमीक़ =गहरा ,हक़ो बातिल =सच झूठ ,क़फ़स =जेल ,
नालाए बिस्मिल =sad song , सलासिल =ज़ंजीर , बेदार =जगाना , 
बे दस्तो पा =मजबूर ,हल्क़ा= घेरा , शिकंजा





रविवार, 10 जनवरी 2010

इस ग़ज़ल के साथ हाज़िर ए  ख़िदमत हूँ अगर आप लोगों को पसंद आई तो समझूँगी मेरी मेहनत कामयाब हो गयी 
ग़ज़ल
__________________
सुकूँ की ,प्यार की,दोनों जहाँ की बात करें 
क़वी इरादों की पीरो जवाँ की बात करें 
उलट दें आज बिसातें सभी सियासत की 
मफादे मुल्क की इल्मे नेहाँ की बात करें 
हम अपने मुल्क के बच्चों से चंद सा'अत ही 
वतन से प्यार की अम्नो अमाँ की बात करें 
सबक़ हम उन को दें तहज़ीब का ,शराफ़त का,
शिकायतों की न सूदो ज़ियाँ की बात करें 
जेहादे नफ्स से बढ़कर कोई जेहाद नहीं
न ख़ाको खूँ की न तीरो कमां की बात का
           
क़वी =मज़बूत ,                  सा'अत = क्षण 
पीर =वृद्ध                             
मफ़ाद = फ़ायेदा                सूदो ज़ियाँ =लाभ हानि
नेहाँ  =छिपा हुआ                  तहज़ीब = संस्कृति 





रविवार, 3 जनवरी 2010

                                                                       ग़ज़ल
___________________
पूछा किसी ने जा के कभी उस ग़रीब से
लड़ता है कैसे कैसे वो अपने नसीब से 
चोरी है ,रहज़नी है, धमाके हैं ,मौत है 
हालात कैसे होने लगे हैं मुहीब से 

मख्दूश रिश्ते सारे ज़माने के हो गए 
बीमार खौफ़ खाने लगे हैं तबीब से 

बिखरी हैं ख़ाक ओ खून में लाशें यहाँ वहाँ 
लटके हुए हैं हम भी कहीं इक सलीब से 

दहशतगरों ने फूँक दिए कितने शाख़ ओ गुल
नगमा सराई छीन गए   अंदलीब से 

ऐ दुश्मनाने कौम यतीमों की लो न आह
ख़ुशियाँ न रूठ जाएँ तुम्हारे नसीब से

ये एक पुरानी ग़ज़ल है न जाने क्यों आज दिल चाहा कि इसे पोस्ट करूँ शायद आप लोगों को पसंद आये
मुहीब=डरावने , मख्दूश =संदेहास्पद , तबीब = चिकित्सक , सलीब =सूली , नगमा सराई = गाना , अंदलीब = बुलबुल , दुश्मनाने कौम =कौम के दुश्मन    

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

ग़ज़ल
____________________
क्या कहूं कि क्या  बयां पहले हुआ
कुछ यहाँ और कुछ वहां पहले हुआ

मैं ने यकजहती की इक  कोशिश ही की
मेरा साथी बदगुमां पहले हुआ

थी सई जज़्बात पर क़ाबू रहे
पर वो आँखों से रवां पहले हुआ

दुश्मनों से क्या शिकायत हो अगर
दोस्त ही शोला बयां पहले हुआ

अब तो जन्नत दूर मुझ से हो गयी
"क्यों न एहसासे ज़ियाँ पहले हुआ "

जो छिपाना चाहता था उस से मैं
राज़ उस पर ही अयाँ पहले हुआ

मुल्क टुकड़ों में बँटा जाता है ये
ज़ख्म का दरमाँ कहाँ पहले हुआ ?

खौफ़ का माहौल हर सू है 'शेफ़ा'
हाथ में तीर ओ कमां पहले हुआ
_________________________________

यकजहती=एकता , सई =कोशिश ,शोलाबयाँ =नाराज़
ज़ियाँ =हानि, अयाँ =प्रकट ,दरमाँ =इलाज
खौफ़ =डर

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

     एक कविता वीरों के नाम
______________________________

आज संसद में बड़ी शान से जो बैठे हैं
लेके चेहरों पे हंसी और चमक बैठे हैं
आज वे भूल गए जबकि हुआ था हमला
आज वे भूल गए कैसे बची जाँ उनकी
आज वे भूल गए घुस गए होते उस दिन
लेके हथियारों का अंबार अगर आतंकी

न बचा होता कोई नामो निशाँ भी उनका
आज बाक़ी न बची होती ये चेहरों पे हंसी
पायी उन वीरों ने जब वीरगति सब थे दुखी
आज ये याद नहीं नाम थे क्या क्या उनके
उनके बच्चों का नहीं कोई सहारा बाक़ी
बूढ़े माँ बाप की आँखों में है दरिया बाक़ी
आज इतना भी नहीं वक़्त कि फूल उन पे चढ़ाएं
आज इतना भी नहीं वक़्त कि हम मौन रखें
गर ये बर्ताव रहा देश के नेताओं का
गर ये बर्ताव रहा देश के दिलवालों का
फिर कभी देश के बच्चों से न आशा रखना
क्योंकि नेता  तो दिखायेंगे तमाशा अपना
फिर हमें वीर नहीं कोई बचा पायेगा
हम को तो स्वार्थ का दानव ही निगल जायेगा
आत्मा अपनी जगाने की ज़रुरत है हमें
फूल आदर के चढ़ाने की ज़रुरत है हमें

___________________________________________

अभी कल ही एक ग़ज़ल ब्लॉग पर लिखी गयी है लेकिन आज अगर ये न लिखी जाती तो समसामयिक न रह जाती ,अभी १३ दिसम्बर को गुज़रे दो ही दिन हुए हैं ,यादें ताज़ा हो गयी हैं .