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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

 एक फ़िलबदीह (आशु) ग़ज़ल 
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दिल की बस्ती उजड़ गई है अभी
ज़ख़्मी ज़ख़ी सी ज़िंदगी है अभी
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उस की ज़िंदादिली से लगता है
कोई मुश्किल नहीं पड़ी है अभी
*
मेरी हालत प मुस्कुराता है
उम्र तेरी कहाँ कटी है अभी ?
*
शाम के साए हो गए गहरे
दर प इक शम’अ सी जली है अभी
*
उस के चेहरे प दास्ताँ पढ़ लूँ
इतनी आँखों में रौशनी है अभी
*
ऐ ’शेफ़ा’ किस ने जंग छेड़ी है?
तेरी तो सब से दोस्ती है अभी

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

इस बार कुछ क़िता’त पेश ए ख़िदमत हैं

क़िता’त
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झूट पर झूट है, अय्यारी है, मक्कारी है
और हक़ीक़त ये बताती है सितम जारी है
कितने मासूम हैं गोदी में अजल की सोए
हाकिम ए शह्र का कहना है अदाकारी है

***
ख़ुदा की है अताकरदा वो क़ूवत बेज़बानों में
कि जो हलचल मचा सकती है ज़ालिम हुक्मरानों में
उठो अब मुत्तहिद हो कर इन्हें समझो वगरना फिर
कहीं गुम हो के रह जाओगे तुम इन दास्तानों में
***
क़दरें बदल गई हैं ,ज़माना बदल गया
इंसानियत का आज तराना बदल गया
तिफ़्लान ए दौर के भी रुख़ों पर है बेबसी
मासूमियत का ठौर-ठिकाना बदल गया
***
क्या रोक पातीं उस को सुनहरी ये तीलियाँ
पर्वत प हौसलों के जो आबाद हो गया
करता रहा मैं क़ैद ओ क़फ़स पर ही तब्सेरे
वो तीलियों को तोड़ के आज़ाद हो गया
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अय्यारी= मक्कारी का पर्याय ; अजल= मौत ; अताकरदा= दी हुई; 
मुत्तहिद= एक हो कर (unite) ; क़दरें= मूल्य (values) ; 
तिफ़्लान ए दौर = आज के बच्चे ; क़फ़स= पिंजरा , जेल ;
तब्सेरे= टिप्पणी

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आज फिर एक हिंदी ग़ज़ल के साथ आप के समक्ष हूँ

ग़ज़ल
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छोटी सी ही आस बहुत है
थोड़ा सा उल्लास बहुत है
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तेरे साथ जो पल-छिन बीते
उन का बस आभास बहुत है
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उस ने नाता तोड़ लिया पर
अब भी, मन के पास बहुत है
*
मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
साथी पर विश्वास बहुत है
*
वाणी में कोमलता है पर
आँखों में उपहास बहुत है
*
वर्षों पहले जो बीता था
सीखें , तो इतिहास बहुत है
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सुविधाओं की गोद में बैठे
कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’
*
दुख में भी मुस्काते रहना
हम को ये अभ्यास बहुत है
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लंबा अरसा गुज़र जाता है और शायद आप लोग
 भूलने लगते होंगे तो मैं फिर कुछ न कुछ
 ले कर हाज़िर हो जाती हूँ और 
आज तो
ब्लॉग की सालगिरह भी है
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ग़ज़ल
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 सपनों में तू आया कर
स्वर्ग की सैर कराया कर

नफ़रत की चिंगारी पर 
प्रेम सुधा बरसाया कर

चाँद को पाना नामुमकिन
चातक को समझाया कर

नाउम्मीदी कुफ़्र भी है
आस के दीप जलाया कर

दिल तो ज़िद्दी बच्चा है
प्यार की बीन बजाया कर

वक़्त का पहिया घूमेगा
इतना मत इतराया कर

कमज़र्फ़ी के मारों को
आईना दिखलाया कर
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

एक नज़्म हाज़िर ए ख़िदमत है 

ख़्वाहिश
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वो रोकता मुझे इक बार 
मैं पलट आता
मैं उस के जौर ओ सितम
ख़ुशदिली से सह लेता
मुझे वो मूरिद ए इल्ज़ाम
भी जो ठहराता
ख़ुशी से सारे वो इल्ज़ाम
ख़ुद पे ले लेता
मैं उस की छोटी सी ख़्वाहिश
पे जाँ लुटा देता
मुहब्बतों का जनाज़ा
 मैं दफ़्न कर देता

मगर न जाने कि क्या 
जुर्म हो गया मुझ से
न उस ने मुझ को बुलाया
न इक दफ़’आ रोका
मैं अपनी लाश को
कांधों पे अपने ढोता रहा
और एक वक़्त ये आया
सुपुर्द ए ख़ाक हुआ

बस एक चीज़ ही
ज़िंदा रही मेरे अंदर
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे पुकारेगा
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे बुला लेगा
वो इक यक़ीन भी देगा
कि कुछ हुआ ही न था
वो मेरा दोस्त कभी मुझ से 
यूँ ख़फ़ा ही न था 
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जौर ओ सितम = अत्याचार, ज़ुल्म ,,,,,मूरिद ए इल्ज़ाम= आरोपी,,,,
जनाज़ा= शव,,,,सुपुर्द ए ख़ाक=धरती को सौंपना ,दफ़्न कर देना,,,,


मंगलवार, 6 अगस्त 2013

आज उर्दू ग़ज़ल पर वापस आते हैं,,यूँ तो ग़ज़ल, ग़ज़ल है चाहे वह किसी भी भाषा में हो 
क्योंकि उस का आधार तो भावनाएं हैं , जज़्बात हैं 
और इन्हें ज़ुबान के बदल जाने से 
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

ग़ज़ल
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शफ़क़त* निसार* की है ,निगाहों ने उम्र भर
महफ़ूज़* रक्खा माँ की दुआओं ने उम्र भर
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थीं मेरे पास अपनों की सारी मुहब्बतें 
फिर भी दिया है साथ परायों ने उम्र भर
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शायद मिले सुकून अजल* की पनाह में
लेने दिया न चैन ख़ताओं * ने उम्र भर
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मज़हब के नाम पर जहाँ तलवार खिंच गई
नादिम* किया है ऐसी सभाओं ने उम्र भर
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चाहा मगर न दिल से वो एह्सास मिट सका
ज़ख़्मी किया शिकस्त* के लम्हों ने उम्र भर
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ठोकर जो खाई फिर न क़दम रख सके ’शेफ़ा’
यूँ तो सदाएं दीं  तेरी राहों ने उम्र भर
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शफ़क़त= वात्सल्य,स्नेह ,,,,,, निसार= न्योछावर,,,,,
महफ़ूज़= सुरक्षित,,,,,,अजल= मौत,,,,,,
ख़ताओं= ग़ल्तियों,,,,,,नादिम= शर्मिंदा, लज्जित,,,,,,
शिकस्त= हार, पराजय

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ग़ज़ल


एक और हिंदी ग़ज़ल आप के समक्ष प्रस्तुत है

ग़ज़ल
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कैसे बिसराऊं भला बीता हुआ पल कोई
कल्पनाओं में जो बजती रहे पायल कोई
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कोई संवाद नहीं और कोई संबंध नहीं
भाव जीवन में नहीं रह गया कोमल कोई
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कितनी चिंताओं का वो बोझ लिये फिरता है
अब न बचपन है, न बच्चा रहा चंचल कोई
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कैसी संवेदना, कैसी करुणा और दया
हम ने जब छोड़ दिया रस्ते पे घायल कोई
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कामना है कि बनूँ ऐसी बयारें इक दिन
कर सकूँ तपता हुआ मन कभी शीतल कोई
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अब न करना कभी साहस उसे तुम छलने का
हिरनियाँ भी हैं सबल, समझे न निर्बल कोई
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ऐ ’ शेफ़ा’ छोड़ गई माँ तेरी जब से तुझ को
वैसा स्पर्श मिला तुझ को न आँचल कोई
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