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मंगलवार, 6 मार्च 2012

कविता


आप सभी को होलीबहुत बहु मुबारक हो 

.........कहीं ये अर्थ न खो दें 
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मनोभावों को करते व्यक्त 
सारे रंग होली के 
बहुत सुंदर ,बहुत गहरे हैं 
सारे रंग होली के 

ये पीले, लाल, नारंगी
हरे, नीले , गुलाबी सब 
छिपाए अपने अंदर 
रंग, हैं भंडार अर्थों का
सभी रंगों के अर्थों में 
मिलेगी भिन्नता, लेकिन
कोई इक चीज़ है जो
इन सभी रंगों में साझी है
वो है संवेदना
जो प्यार की भाषा समझती है,
वो है सद्भावना 
जो मित्रता की बात करती है ,
ये हैं संदेश देते 
एकता के और समन्वय के
नहीं कोई बड़ा-छोटा,
न कोई रंक न राजा

यही हम सुनते आए थे 
यही अनुभव हमारा था
मगर मुझ में न जाने क्यों
ये पिछले चंद सालों से
पनपने सा लगा इक भय
कहीं ये प्यारे सुंदर रंग 
अपने अर्थ न खो दें 

कहीं टेसू के फूलों की जगह
तेज़ाब न ले ले ?
कहीं सद्भावना, दुर्भावना से 
हार न जाए ?
कहीं आरक्षणों का विष
रहीम और राम के मन से 
समन्वय को हटा कर
एकता को नोच न फेंके ?

न जाने कितने लोगों का 
यही इक भय जो 
सोते जागते हर दम 
हमारा पीछा करता है
कहीं ये प्यारे प्यारे रंग
अपने अर्थ न खो दें ?

चलो अपनी जगह हम सब
यही बस एक प्रण कर लें
यही दृढ़ता से निर्णय लें
न होने देंगे कम 
सौंदर्य हम होली के रंगों का

हमें इनकार है 
दुनिया की सारी ऐसी चीज़ों से
विचारों की जो सुंदरता को 
कर दें नष्ट दुनिया से 
न खोने देंगे हम,कोई भी
क़ुदरत का हसीं तोहफ़ा
न धुंधला होने देंगे अर्थ
इन होली के रंगों का 
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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

.............इस दयार में

एक आम सी ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है ,,

ग़ज़ल
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पथरा गई निगाह इसी इंतेज़ार में 
आएगा कोई शख़्स कभी इस दयार में 
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चाहा था तुम ने फूल खिलें रेगज़ार में 
पर बात ये नहीं थी मेरे एख़्तियार में 
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ऐ रहनुमा ए क़ौम यक़ीं कैसे हो हमें 
धोके मिले हैं हम को सदा एतबार में 
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लोरी , कहानी, प्यार की थपकी कहाँ गई
नन्हे सवाल हैं निगह ए अश्कबार में 
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कैसी उड़ान ,कैसी बलंदी , कहाँ का जोश
सब ख़त्म हो गया तेरे बस एक वार में
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हम ने ज़मीर का कभी सौदा नहीं किया
बस ख़्वाहिशात हार गईं कारज़ार में
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तन्हाइयों को दोस्त बनाना न ऐ ’शेफ़ा’
खो जाएगी हयात ये गर्द ओ ग़ुबार में 
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रेगज़ार = रेगिस्तान ; निगह ए अश्कबार = आँसुओं से भरी आँख ; कारज़ार = युद्ध 
गर्द ओ ग़ुबार = धूल और मिट्टी





गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

ग़ज़ल

एक ग़ज़ल जिसे आप शिकायत समझें या समाज में बढ़ते  जा रहे ख़ुदग़र्ज़ी के जज़्बे से एक लम्हे  भर को दुखी हुए मन की पीर , लेकिन  मेरे लिये ये एहसास लम्हाती था मैं आज भी बहुत पुर उम्मीद  हूँ क्योंकि आज भी समाज में उन लोगों का फ़ीसद ज़्यादा  है जो बे ग़रज़ और बेलौस जज़्बे के साथ  काम करते हैं 

फिर भी  उस एक लम्हे को आप तक पहुँचाने की जुर्रत  रही हूँ

ग़ज़ल
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दूसरों के ग़म में रोता कौन है
बोझ यूँ ग़ैरों के ढोता कौन है 
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मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है 
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है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है 
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एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है 
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उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
बोझ यूँ  इसयाँ के ढोता कौन है
*****
हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
तीसरा ये शख़्स होता कौन है 
*****
ऐ ’शेफ़ा’ हमदर्दी ए दुश्मन में  अब
कश्तियाँ अपनी डुबोता कौन है 
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मुफ़लिसी = ग़रीबी,,;,,मदफ़न = क़ब्र ,,;,,इसयाँ = गुनाह ,पाप

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

.........दोस्ती घबराएगी "

कभी कभी लिखना चाहते हुए भी कुछ लिखना मुहाल लगता है
ऐसे ही हालात में कही गई ग़ज़ल आप की ख़िदमत में हाज़िर है 

ग़ज़ल
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जान कर बच्चा हमें बहलाएगी 
झुनझुना वादों का फिर दे जाएगी
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उल्झनें जिस ज़ात से मनसूब हैं
मस’अलों को कैसे वो सुलझाएगी
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साँझ ने घूंघट उठाया रात का
चाँद की क़ुर्बत में शब शरमाएगी
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गेसू ए ज़ुल्मत बिखेरे रात ने 
फिर उरूस ए शब कोई बिक जाएगी
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दोस्तों के इस नए अंबोह में 
वो पुरानी दोस्ती घबराएगी 
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रात काटेगी हवेली जाग कर 
और कुटिया चैन से सो जाएगी
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मनसूब = जुड़ी हुई ,, संबंधित ; गेसू = बाल ; ज़ुलमत = अँधेरा
उरूस ए शब = रात की दुल्हन ; अंबोह = भीड़ ; क़ुर्बत = निकटता

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

चंद दिन पहले की बात है कि एक दिन पंकज सुबीर जी ने फ़ेसबुक पर एक शेर पोस्ट किया और सभी लोगों को आमंत्रित किया ग़ज़ल पूरी करने के लिये ,बस फिर क्या था जितने लोग ऑनलाइन थे उन की एक एक ग़ज़ल तैयार हो गई ,मैंने  भी कोशिश की
अब आप भी लुत्फ़ लीजिये लेकिन ये ध्यान रखियेगा कि ये  फ़िलबदीह (आशु) ग़ज़ल है .....
ग़लतियाँ हो सकती हैं ,, उस के लिये पहले से ही मुआफ़ी चाहती हूं 

ग़ज़ल
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हम भी कितना प्यारा सौदा करते हैं 
चेहरों पे मुस्कान सजाया करते हैं
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जाने कितने दीप जला कर आँखों में
हम उन के सपनों की रक्षा करते हैं 
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अपनी वफ़ाएं साबित करने की ख़ातिर 
हर बाज़ी हम उन से हारा करते हैं 
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उन के जज़्बों को हम कैसे सच मानें 
वो तो रिश्तों का भी सौदा करते हैं 
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जो बच्चे महरूम हों माँ के साए से 
हर आँचल में ममता ढूंढा करते हैं 
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माँ -बाबा बच्चों की ख़ुशियो की ख़ातिर
अपने अरमानों को थपका करते हैं 
****
सूरज की गर्मी में , ख़ुनकी आए  जब     
गाँव के बूढ़े बरगद साया करते हैं
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बात ’शेफ़ा’ जो करते हैं परवाज़ों की 
पँख परिंदों के वो कतरा करते हैं 
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महरूम = वंचित   ,,,,,,,ख़ुनकी = ठंडक

शनिवार, 26 नवंबर 2011

jazb e watan


आज २६ नवम्बर है और मैं 
एक नज़्म की शक्ल में खिराज ए अक़ीदत पेश करना चाहती हूँ उन शहीदों को जो अपने मुल्क की ख़ातिर खुद तो क़ुर्बान हो गए लेकिन अपने देशवासियों को  महफ़ूज़ कर गए 

जज़्ब  ए वतन
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लोग बहबूदी ए मिल्लत का लबादा ओढ़े 
और चेहरों पे सजाए हुए मासूम से रंग 
कितने मजलूमों की इज़्ज़त को कुचल देते हैं
कितने मासूमों के अरमान मसल देते हैं
ख़ूबसूरत गुल ओ गुलज़ार की रौनक़ ले कर
बख़्शते  हैं उन्हें पुर ख़ौफ़  सा इक सन्नाटा 
ऐसे अशख़ास जो ईमान का सौदा कर के
 अपने हस्सास ज़मीरों को कुचल देते हैं
शर पसंदों की जमा'अत के ये शातिर मुहरे
बेकस ओ बे बस ओ मज़लूम से इंसानों को
अपनी चालों के शिकंजों में फंसा लेते हैं
और फिर अपनी नई क़ौम  बनाने के लिए
बर्बरीयत का हर इक खेल सिखा देते हैं
नाम पर मज़हब ओ मिल्लत के ये ख़ूँरेज़ी क्यों ? 
नाम इस्लाम का लेते हो तो बदकारी क्यों ?
ये वो मज़हब है जो इन्सान को इन्सान बनाए
ये वो मज़हब जो अ्ख़ूवत का ही एहसास कराए
नाम ले कर इसी मज़हब का चले आते हो 
औरतों , बच्चों पे भी रहम नहीं खाते हो 
बेगुनाहों के लहू से जो नहा लेते हो 
क्या समझते हो कि फ़िरदौस में घर लेते हो ?
इन यतीमों की सुए अर्श अगर आह गयी 
बस समझ लेना की फिर दीन भी ,, दुनिया भी गयी 

तेरे आक़ा ने कहा तुझ से जिहादी है तू 
ये बताया है की जन्नत का भी दा'ई है तू 
और शहादत की ही मंज़िल का सिपाही है तू 
इन में से कुछ भी नहीं सिर्फ़ फ़सादी है तू 

 आज दे मुझ को ज़रा चंद सवालों के जवाब 
माँओं की आँख में आंसू हों तो जन्नत कैसी ?
बेगुनाहों का तू क़ातिल है ,,शहादत कैसी ?
 धोके से मारते हो,, कैसे जिहादी हो तुम  ?
ख़ौफ़  ए अल्लाह नहीं कैसे नमाज़ी हो तुम ?

चंद बातें तू समझ ले यही अच्छा होगा 
मेरे इस मुल्क की जानिब जो पलट कर देखा 
वो चमक होगी कि आँखें तेरी ख़ीरा  कर दे 
चूँकि  हैं ज़ख़्म हरे टीस सी इक उठती है 
जब भी मज़लूम कराहों की सदा आती है 
शातिर अज़हान  पे तू जल्द लगा ले पहरा 
 अपने नापाक इरादों को हटा दे वरना 
रोक देंगे तेरे बढ़ते हुए क़दमों को वहीँ 
ये जवानान ए वतन , शान ए वतन , जान  ए वतन 
और महफ़ूज़ भी रखेंगे वही आन ए वतन 
बस दुआएं हैं कि पूरा हो ये अरमान ए वतन
जल्द इन्साफ़ दिलाएं उसे अज़हान  ए वतन 
मुन्तज़िर आज भी है ख़ून ए शहीदान ए वतन  
  
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बहबूदी = भलाई ; अश्ख़ास = शख़्स (व्यक्ति) का बहुवचन ; बर्बरीयत = बर्बरता ; बदकारी = बुरे काम
अ्ख़ूवत = भाईचारा ; फ़िरदौस = जन्नत ; दा'ई = दावा करने वाला ; ख़ीरा = चकाचौंध
 अज़हान = ज़हन का बहुवचन ;

रविवार, 6 नवंबर 2011

.............आँख मिचोली धूप

एक तरही ग़ज़ल पेश कर रही हूँ  तरह ये है -
"सावन भादों में करती है हम से आँख मिचोली धूप "
यूँ तो घटाओं के झूमने का मौसम चला गया लेकिन गोवा में तो कभी भी घटाएं आसमान पर छा जाती हैं और बारिश होने लगती है लिहाज़ा ये ग़ज़ल शायद बेमौसम नहीं होगी 

ग़ज़ल
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अपनी बस्ती, अपना आँगन ,वो पीपल से लिपटी धूप
दूर वतन की याद जब आए ,है राहत की थपकी धूप


रोज़ी रोटी की ख़ातिर जब मारा मारा फिरता हूँ
अपने जैसी ही लगती है मुझ को पीली उजड़ी धूप


गर्मी जाड़े के मौसम में दिन भर साथ निभाती है 
" सावन भादों में करती है हम से आँख मिचोली धूप "


गाँव की गलियाँ , बाग़ के झूले , सब कुछ कितना प्यारा था 
मैं बचपन जी लेता हूं जब करती है अटखेली धूप 


रौशन कर दो दुनिया सारी अपने इल्म ओ दानिश से 
वक़्त ए सहर पैग़ाम ये ले कर आती है चमकीली धूप 


बचपन में जब माँ की लोरी मीठी नींद सुलाती थी
सर सहला कर मुझे जगाने हौले से आती थी धूप 


शब का जागा वक़्त ए सहर जब ख़्वाबों की आग़ोश में जाए 
टूट न जाएं ख़्वाब सुहाने ,धीरे से छुप जाती धूप 


कैसे वफ़ा हों अह्द ओ पैमाँ सीख ’शेफ़ा’ तू सूरज से 
रौशन कर के सुब्ह  को धरती ,अपना अह्द निभाती धूप 


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दानिश = अक़्ल , समझ बूझ ,, शब = रात ,, आग़ोश = गोद 
अह्द ओ पैमाँ = वादे , वचन