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शनिवार, 2 अप्रैल 2011

एक  कविता प्रस्तुत है
इसे शायद आप ने रश्मि प्रभा जी के blog पर भी पढ़ा होगा
ये विषय भी उन का ही दिया हुआ है
आभारी हूँ रश्मि जी की ,  जिनके कारण इस कविता का अस्तित्व है
उन के विषय पर मेरे भावों का जो प्रभाव है वो आप के समक्ष है


 उसके नाम
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लिख पाती ’उस के नाम’ अगर
मैं अपने सारे सुख लिखती
उस के मन की अंगनाई में
वासंती रुत छाई रहती
उस के जीवन की बगिया में
फूलों के रंग बिखर जाते
वो जिस की बातों में खो कर
सदियों से प्यासी रूहें भी
सपने बुनतीं ख़ुशहाली के
वो जिस के शब्दों की माया
वो जिस की मर्यादित काया
मानवता के पथ पर चलकर
करती उद्धार चरित्रों का
करती उपचार विचारों का

’उस’ जीवन की अफ़रा तफ़री
’उस’ मन के अंतर्द्वन्द्व सभी
’उस’ दिल में बसे दुख दर्दों को
मैं हर न सकी तो जीवन क्या ?

पर वो जो भाग्य विधाता है
बस वो ही क़िस्मत लिखता है
कुछ वश में अगर मेरे होता
मैं उस के सारे दुख हरती
लिख पाती उस के नाम अगर

                                                           तो अपने सारे सुख लिखती

रविवार, 20 मार्च 2011

........ होली नफ़रत से इंकार

होली के शुभ अवसर पर एक गीत प्रस्तुत है 
आप सभी को होली बहुत बहुत मुबारक हो 

होली नफ़रत से इंकार
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है होली रंगों का त्योहार
ये रंग बाँटे हैं सब में प्यार

न इन में द्वेष घोलना

ये सुंदर भावों का संचार
है इक दूजे की ये मनुहार

न इन में द्वेष घोलना

है होली नफ़रत से इंकार
दिलों के बीच न हो व्यापार

न इन में द्वेष घोलना

है पिचकारी वो प्रेम की धार
गिरा दे नफ़रत की दीवार

न इन में द्वेष घोलना

हैं इन रंगों के अर्थ हज़ार
नहीं हैं केवल ये बौछार

न इन में द्वेष घोलना

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शनिवार, 12 मार्च 2011

............ऐसा असर कहाँ

सब से पहले तो जापान में होने वाली तबाही के सिलसिले से उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ
जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और दुआ करती हूं कि ख़ुदा सभी को अपने हिफ़्ज़ ओ अमान में रखे (आमीन)

और अब
एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

........ऐसा असर कहाँ
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माँ बाप की दुआ सा किसी में असर कहाँ
दौलत हो गर ये पास तो ला’ल ओ गुहर कहाँ
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क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ
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निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब 
वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
*****
ग़रक़ाब हो जो बह्र में ,मोती वो पाएगा
ख़ुद आए सतह ए आब पे ऐसा गुहर कहाँ
*****
जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे 
कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
*****
पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
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छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ

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ला’ल= gem ; गुहर = मोती ; यूरिश = हमला ; मुस्तजाब = क़ुबूल ; ग़रक़ाब =  डूबना
नुजूम = सितारे ; फ़लक = आसमान ; क़मर = चाँद ; शजर = पेड़ 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

............धनक निसार किया

एक हल्की फुल्की सी ग़ज़ल ले कर हाज़िर हुई हूं ,न तो ये ग़ज़ल इब्तेदाई दौर की ग़ज़लों जैसी नफ़ीस है और न मौजूदा ग़ज़लों जैसी हक़ीक़त पर मबनी ,फिर भी ग़ज़ल है लिहाज़ा आप लोगों तक पहुंचाने की जुर्रत कर रही हूं, इस की कामयाबी या नाकामयाबी का इन्हेसार  आप पर है -----------शुक्रिया

..............धनक निसार किया
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ज़िंदगी की धनक निसार किया
हर दफ़ा उस ने ऐतबार किया

मेरे बस एक ख़्वाब की ख़ातिर 
उस ने हर ख़्वाब तार तार किया

उस के जज़्बों का सच परखना था
मैं ने उस पर ही इन्हेसार किया

जानता था है इन्तेज़ार अबस
फिर भी हर लम्हा इन्तेज़ार किया

उस की मासूम सी निगाहों ने 
दिल में पैदा इक इंतेशार किया

मुझ से वाबस्ता ख़्वाब हैं उस के
चश्म ए रौशन ने इश्तेहार किया 
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इन्हेसार = निर्भर ; अबस = बेकार ; इंतेशार = हलचल , तितर-बितर
वाबस्ता= जुड़े हुए ; चश्म =आंख

बुधवार, 26 जनवरी 2011

चीत्कार

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
और बधाई

एक कविता प्रस्तुत है जिसे लिखना मेरे लिये तकलीफ़ का कारण तो था 
लेकिन न लिखना बेचैनी का कारण बन जाता
और 
वही तकलीफ़ और विचार मैं आप से शेयर करना 
चाहती हूं

"चीत्कार"
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अंतर्मन का चीत्कार है 
कैसा भारत माँ से प्यार है
झंडा जो सम्मान का द्योतक 
झेल रहा सत्ता की मार है
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आंखों में अंगारे भर के
इक दूजे पर *तोहमत धर के (*आरोप)
माँ को हम करते शर्मिंदा
गृह कलह विज्ञापित कर के
******
क्यों ध्वज पर ये राजनीति है ?
क्यों शत्रु की सफल नीति है ?
माँ का तन ,मन आहत हो तो
कैसा मोह और कैसी प्रीति है?
******
रैली का आयोजन कर के 
या प्रवेश पर रोक लगा के
आख़िर क्या साबित करते हैं
देश प्रेम का मूल्य लगा के ?
******
घोटालों में डूब रहा है 
घर वालों से जूझ रहा है
देश के सम्मुख प्रश्न भयावह
मां का भरोसा टूट रहा है
******
प्रश्न अनुत्तरित कई यहां हैं
मन के सुकूं और चैन कहां हैं
जनता भूखे पेट खड़ी पर
’उन के ’ तो आबाद जहां हैं
******
इन सब का हल कैसे निकले
तप कर लोहा भी तो पिघले
सत्ता की गलियों से निकलो
याद करो वचनों को पिछले
******
अपना वादा प्यार देश से
और तिरंगे माँ के वेश से
लहराएं गणतंत्र दिवस पर
कर के तिरंगा दूर,,द्वेष से
******
काश्मीर से कन्याकुमारी
गोवा से ले कर गोहाटी
सदा यूंही लहराए तिरंगा
देश का मान बढ़ाए तिरंगा

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

बात अनकही

आज कोई तमहीद नहीं ,बस एक ग़ज़ल मुलाहेज़ा फ़रमाएं 

"बात अनकही"
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जब कभी डराती है शब की तीरगी मुझ को 
मां ही इक मिनारा है दे जो रौशनी मुझ को

बोलती थीं नज़रें पर लफ़्ज़ बे सदा से थे 
वक़्त पर ज़बां ने भी चोट आज दी मुझ को

दर्द दे जो ज़ख़्मों से चूर चूर ख़ुद्दारी
याद आ ही जाती है उस की कज रवी मुझ को 

चाहता था कुछ बोलूं पर ज़बां पे पहरा था
और कचोके देती थी बात अनकही मुझ को

कोई शख़्स हिंदू था और कोई मुसलमां था
हां, मगर न मिल पाया कोई आदमी मुझ को 

हम हवा के हमलों को अपने दम पे रोकेंगे
दे रहे भरोसा हैं अम्न ओ आश्ती मुझ को 

क्यों वफ़ा ज़माने की ठोकरों में रहती है?
ये जवाब देती है उस की सादगी मुझ को 

जिन को नर्म गोदी की शफ़क़तों ने पाला था
लग रहे हैं लहजे वो आज अजनबी मुझ को 

आ ’शेफ़ा’ उमीदों के कुछ दिये जला लूं मैं 
अहद ए नौ ने बख़्शी है अपनी ताज़गी मुझ को 

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मिनारा = light house ;तीरगी = अंधेरा ; शफ़क़तों = स्नेह ,प्यार ;
अहद ए नौ = नया ज़माना ; आश्ती= शान्ति

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

माँ

आप सभी को नव वर्ष  की
बहुत बहुत 
शुभकामनाएं

एक नज़्म पेश ए ख़िदमत है ,जिस का ताल्लुक़ नए साल से नहीं 
है ,बल्कि उन हालात से है जो वृद्धाश्रम के इर्द -गिर्द घूमते हैं ,
बस आप तक अपने जज़्बात ओ ख़यालात पहुंचाना चाहती हूं , 
यूं तो कोई नई और ख़ास बात नहीं है ,लेकिन अगर आप
अपना क़ीमती वक़्त यहां सर्फ़ कर सकें तो ये  मेरे लिये
बाइस ए शरफ़ होगा
शुक्रिया


माँ
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वो दो बूढ़ी आंखें तेरा हर दम रस्ता तकती हैं
दिल में जो इक दर्द छिपा है कह न किसी से सकती हैं
जबसे तुम ने ला कर उन को वृद्धाश्रम में डाला है
टूटे ख़्वाबों के रेज़ों को गुमसुम  सी वो चुनती हैं
क्यों बेटा क्या भूल गए तुम बचपन में जब रोते थे
नर्म से उन के हाथ तुम्हारे अश्कों को चुन लेते थे
अपने आंसू पी कर उस ने तुम को दूध पिलाया है
तेरे होठों की मुस्कानें ही उस का सरमाया है
छोटी सी तकलीफ़ पे तेरी वो बेकल हो जाती थी
तुझ को क्या मालूम न जाने क्या क्या वो सह जाती थी
जिस ऊँचाई पर हो बेटा ये उस की ही मेहनत है
शोहरत जो तुम ने है पाई उस की दुआ की बरकत है
जिस की उंगली थाम के तुम ने बचपन में चलना सीखा
उस की लाठी कौन बनेगा ये है कभी तुम ने सोचा ?
उस की ख़ामोशी को बेटा कमज़ोरी तुम मत जानो
बच्चों की ख़ुशियों की ख़ातिर ही वो चुप है ,सच मानो

कल को जब तुम बूढ़े होगे और तुम्हारा बेटा तुम को
वृद्धाश्रम में छोड़  के वो भी मुड़ कर न देखेगा तुम को 
हाँ
तब ये दिन याद आएंगे ,उन की शफ़क़त याद आएगी
आँसू से लबरेज़ निगाहें और मायूसी याद आएगी
लेकिन
तब क्या कर पाओगे मुआफ़ी भी न मांग सकोगे
अब भी वक़्त है बेटा संभलो, वरना फिर तुम पछ्ताओगे
उम्र के आख़िर दौर में उन के दुख ले कर सुख ही सुख दे दो
उन के आँसू पोंछ के बेटा अपने लिए तुम जन्नत ले लो  

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सरमाया= दौलत ; शफ़क़त = स्नेह ,प्यार ; लबरेज़ =भरा हुआ