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शनिवार, 12 मार्च 2011

............ऐसा असर कहाँ

सब से पहले तो जापान में होने वाली तबाही के सिलसिले से उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ
जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और दुआ करती हूं कि ख़ुदा सभी को अपने हिफ़्ज़ ओ अमान में रखे (आमीन)

और अब
एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

........ऐसा असर कहाँ
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माँ बाप की दुआ सा किसी में असर कहाँ
दौलत हो गर ये पास तो ला’ल ओ गुहर कहाँ
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क़िस्मत की यूरिशों पे भी वो मुस्कुराए है
हर इक में ऐसा सब्र कहाँ और जिगर कहाँ
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निकलें दुआएं दिल से तो होंगी वो मुस्तजाब 
वरना तो इस ज़बान में ऐसा असर कहाँ
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ग़रक़ाब हो जो बह्र में ,मोती वो पाएगा
ख़ुद आए सतह ए आब पे ऐसा गुहर कहाँ
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जब आस्माँ पे चाँद भी रोटी दिखाई दे 
कैसे नुजूम ,कैसा फ़लक और क़मर कहाँ
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पत्ते भी टूट टूट के बिखरे इधर -उधर
पहले सा सायादार हमारा शजर कहाँ
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छू ले बलंदियों को ये ख़्वाहिश तो है ’शेफ़ा’
लेकिन उड़ान के लिये वो बाल ओ पर कहाँ

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ला’ल= gem ; गुहर = मोती ; यूरिश = हमला ; मुस्तजाब = क़ुबूल ; ग़रक़ाब =  डूबना
नुजूम = सितारे ; फ़लक = आसमान ; क़मर = चाँद ; शजर = पेड़ 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

............धनक निसार किया

एक हल्की फुल्की सी ग़ज़ल ले कर हाज़िर हुई हूं ,न तो ये ग़ज़ल इब्तेदाई दौर की ग़ज़लों जैसी नफ़ीस है और न मौजूदा ग़ज़लों जैसी हक़ीक़त पर मबनी ,फिर भी ग़ज़ल है लिहाज़ा आप लोगों तक पहुंचाने की जुर्रत कर रही हूं, इस की कामयाबी या नाकामयाबी का इन्हेसार  आप पर है -----------शुक्रिया

..............धनक निसार किया
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ज़िंदगी की धनक निसार किया
हर दफ़ा उस ने ऐतबार किया

मेरे बस एक ख़्वाब की ख़ातिर 
उस ने हर ख़्वाब तार तार किया

उस के जज़्बों का सच परखना था
मैं ने उस पर ही इन्हेसार किया

जानता था है इन्तेज़ार अबस
फिर भी हर लम्हा इन्तेज़ार किया

उस की मासूम सी निगाहों ने 
दिल में पैदा इक इंतेशार किया

मुझ से वाबस्ता ख़्वाब हैं उस के
चश्म ए रौशन ने इश्तेहार किया 
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इन्हेसार = निर्भर ; अबस = बेकार ; इंतेशार = हलचल , तितर-बितर
वाबस्ता= जुड़े हुए ; चश्म =आंख

बुधवार, 26 जनवरी 2011

चीत्कार

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
और बधाई

एक कविता प्रस्तुत है जिसे लिखना मेरे लिये तकलीफ़ का कारण तो था 
लेकिन न लिखना बेचैनी का कारण बन जाता
और 
वही तकलीफ़ और विचार मैं आप से शेयर करना 
चाहती हूं

"चीत्कार"
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अंतर्मन का चीत्कार है 
कैसा भारत माँ से प्यार है
झंडा जो सम्मान का द्योतक 
झेल रहा सत्ता की मार है
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आंखों में अंगारे भर के
इक दूजे पर *तोहमत धर के (*आरोप)
माँ को हम करते शर्मिंदा
गृह कलह विज्ञापित कर के
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क्यों ध्वज पर ये राजनीति है ?
क्यों शत्रु की सफल नीति है ?
माँ का तन ,मन आहत हो तो
कैसा मोह और कैसी प्रीति है?
******
रैली का आयोजन कर के 
या प्रवेश पर रोक लगा के
आख़िर क्या साबित करते हैं
देश प्रेम का मूल्य लगा के ?
******
घोटालों में डूब रहा है 
घर वालों से जूझ रहा है
देश के सम्मुख प्रश्न भयावह
मां का भरोसा टूट रहा है
******
प्रश्न अनुत्तरित कई यहां हैं
मन के सुकूं और चैन कहां हैं
जनता भूखे पेट खड़ी पर
’उन के ’ तो आबाद जहां हैं
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इन सब का हल कैसे निकले
तप कर लोहा भी तो पिघले
सत्ता की गलियों से निकलो
याद करो वचनों को पिछले
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अपना वादा प्यार देश से
और तिरंगे माँ के वेश से
लहराएं गणतंत्र दिवस पर
कर के तिरंगा दूर,,द्वेष से
******
काश्मीर से कन्याकुमारी
गोवा से ले कर गोहाटी
सदा यूंही लहराए तिरंगा
देश का मान बढ़ाए तिरंगा

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

बात अनकही

आज कोई तमहीद नहीं ,बस एक ग़ज़ल मुलाहेज़ा फ़रमाएं 

"बात अनकही"
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जब कभी डराती है शब की तीरगी मुझ को 
मां ही इक मिनारा है दे जो रौशनी मुझ को

बोलती थीं नज़रें पर लफ़्ज़ बे सदा से थे 
वक़्त पर ज़बां ने भी चोट आज दी मुझ को

दर्द दे जो ज़ख़्मों से चूर चूर ख़ुद्दारी
याद आ ही जाती है उस की कज रवी मुझ को 

चाहता था कुछ बोलूं पर ज़बां पे पहरा था
और कचोके देती थी बात अनकही मुझ को

कोई शख़्स हिंदू था और कोई मुसलमां था
हां, मगर न मिल पाया कोई आदमी मुझ को 

हम हवा के हमलों को अपने दम पे रोकेंगे
दे रहे भरोसा हैं अम्न ओ आश्ती मुझ को 

क्यों वफ़ा ज़माने की ठोकरों में रहती है?
ये जवाब देती है उस की सादगी मुझ को 

जिन को नर्म गोदी की शफ़क़तों ने पाला था
लग रहे हैं लहजे वो आज अजनबी मुझ को 

आ ’शेफ़ा’ उमीदों के कुछ दिये जला लूं मैं 
अहद ए नौ ने बख़्शी है अपनी ताज़गी मुझ को 

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मिनारा = light house ;तीरगी = अंधेरा ; शफ़क़तों = स्नेह ,प्यार ;
अहद ए नौ = नया ज़माना ; आश्ती= शान्ति

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

माँ

आप सभी को नव वर्ष  की
बहुत बहुत 
शुभकामनाएं

एक नज़्म पेश ए ख़िदमत है ,जिस का ताल्लुक़ नए साल से नहीं 
है ,बल्कि उन हालात से है जो वृद्धाश्रम के इर्द -गिर्द घूमते हैं ,
बस आप तक अपने जज़्बात ओ ख़यालात पहुंचाना चाहती हूं , 
यूं तो कोई नई और ख़ास बात नहीं है ,लेकिन अगर आप
अपना क़ीमती वक़्त यहां सर्फ़ कर सकें तो ये  मेरे लिये
बाइस ए शरफ़ होगा
शुक्रिया


माँ
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वो दो बूढ़ी आंखें तेरा हर दम रस्ता तकती हैं
दिल में जो इक दर्द छिपा है कह न किसी से सकती हैं
जबसे तुम ने ला कर उन को वृद्धाश्रम में डाला है
टूटे ख़्वाबों के रेज़ों को गुमसुम  सी वो चुनती हैं
क्यों बेटा क्या भूल गए तुम बचपन में जब रोते थे
नर्म से उन के हाथ तुम्हारे अश्कों को चुन लेते थे
अपने आंसू पी कर उस ने तुम को दूध पिलाया है
तेरे होठों की मुस्कानें ही उस का सरमाया है
छोटी सी तकलीफ़ पे तेरी वो बेकल हो जाती थी
तुझ को क्या मालूम न जाने क्या क्या वो सह जाती थी
जिस ऊँचाई पर हो बेटा ये उस की ही मेहनत है
शोहरत जो तुम ने है पाई उस की दुआ की बरकत है
जिस की उंगली थाम के तुम ने बचपन में चलना सीखा
उस की लाठी कौन बनेगा ये है कभी तुम ने सोचा ?
उस की ख़ामोशी को बेटा कमज़ोरी तुम मत जानो
बच्चों की ख़ुशियों की ख़ातिर ही वो चुप है ,सच मानो

कल को जब तुम बूढ़े होगे और तुम्हारा बेटा तुम को
वृद्धाश्रम में छोड़  के वो भी मुड़ कर न देखेगा तुम को 
हाँ
तब ये दिन याद आएंगे ,उन की शफ़क़त याद आएगी
आँसू से लबरेज़ निगाहें और मायूसी याद आएगी
लेकिन
तब क्या कर पाओगे मुआफ़ी भी न मांग सकोगे
अब भी वक़्त है बेटा संभलो, वरना फिर तुम पछ्ताओगे
उम्र के आख़िर दौर में उन के दुख ले कर सुख ही सुख दे दो
उन के आँसू पोंछ के बेटा अपने लिए तुम जन्नत ले लो  

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सरमाया= दौलत ; शफ़क़त = स्नेह ,प्यार ; लबरेज़ =भरा हुआ 



सोमवार, 20 दिसंबर 2010

गोवा में मुहर्रम का ये रूप

गोवा में मुहर्रम का ये रूप 
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मुहर्रम के बारे में सभी को ज्ञात है कि ये ख़ुशी का त्योहार नहीं बल्कि पैग़ंबर 
साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ,उन के परिवार और मित्रों के 
द्वारा दी गई क़ुर्बानियों की यादगार स्वरूप शोक के दिन हैं .
भारत के एक छोटे से राज्य गोवा में एक स्थान है 'बागा’ जहां यौम ए आशूरा 
(१० मुहर्रम) को उन शहीदों की स्मृति में एक रक्त-दान शिविर काभी आयोजन 
किया गया .यहां ये शिविर पिछले ५ वर्षों से आयोजित किया जा रहा है जिस में 
प्रति वर्ष रक्तदाताओं की संख्या क्रमश: बढ़ती ही जा रही है .

९ मुहर्रम की रात से मजलिसें (प्रवचन) करने ,रात्रि जागरण और फिर सारे 
दिन की इबादतों के पश्चात शाम को ९२ लोगों ने रक्त-दान कर के इस पावन 
कार्य में भाग लिया जिन में विभिन्न धर्मों ,विभिन्न प्रांतों के लोग ,महिलाएं ,
पुरुष ,यहां तक कि विदेशी लोग भी शामिल हुए  .

गोवा मेडिकल कॉलेज के डॉ.संजय के सौजन्य से ये शिविर संपन्न  हो सका ,
इस शिविर की विशेष बात ये थी कि प्रत्येक व्यक्ति ने इस में नि:स्वार्थ
भावना से अपना भरपूर योगदान दिया और इसे एकता ,भाईचारे,इंसानियत 
और शांति संदेश के रूप में स्थापित किया .

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

..........जीने की अदा जाने

एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है

...........जीने की अदा जाने
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न है दुनिया की कुछ परवा ,न कुछ अच्छा बुरा जाने
कोई समझे क़लंदर उस को और कोई गदा जाने

मदद से असलहों की जो दुकां अपनी चलाता है
मुहब्बत ,दोस्ती,एह्सास, जज़्बा ,फ़िक्र क्या जाने?

जिया जो दूसरों के वास्ते है बस वही इंसां
कि अपने वास्ते जीने को वो अपनी क़ज़ा जाने

फ़राएज़ की जगह ऊंची न होगी जब तलक हक़ से
तो दुनिया भी तेरी बातों को गूंगे की सदा जाने

सऊबत ज़िंदगी का हर सबक़ ऐसे सिखाती है
कि नादारी में भी इंसान जीने की अदा जाने

नज़र में उन की गर मज़हब है इक शतरंज का मोहरा
तो फिर अंजाम कैसा,क्या ,कहां होगा ख़ुदा जाने

वफ़ादारी ही जिस की ज़ात का हिस्सा रही बरसों
मगर ये क्या हुआ कि आज वो इस को सज़ा जाने

न जाने किस ज़माने में ’शेफ़ा’ वो शख़्स जीता है
जो ख़ुद्दारी,रवादारी,मिलनसारी, वफ़ा, जाने

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क़लंदर = जो दीन ओ दुनिया से अलग हो  ; गदा=फ़क़ीर ;असलहा =हथियार; क़ज़ा =मौत
सऊबत =परेशानियां,कठिनाइयां ; नादारी= ग़रीबी