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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

गोवा में मुहर्रम का ये रूप

गोवा में मुहर्रम का ये रूप 
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मुहर्रम के बारे में सभी को ज्ञात है कि ये ख़ुशी का त्योहार नहीं बल्कि पैग़ंबर 
साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ,उन के परिवार और मित्रों के 
द्वारा दी गई क़ुर्बानियों की यादगार स्वरूप शोक के दिन हैं .
भारत के एक छोटे से राज्य गोवा में एक स्थान है 'बागा’ जहां यौम ए आशूरा 
(१० मुहर्रम) को उन शहीदों की स्मृति में एक रक्त-दान शिविर काभी आयोजन 
किया गया .यहां ये शिविर पिछले ५ वर्षों से आयोजित किया जा रहा है जिस में 
प्रति वर्ष रक्तदाताओं की संख्या क्रमश: बढ़ती ही जा रही है .

९ मुहर्रम की रात से मजलिसें (प्रवचन) करने ,रात्रि जागरण और फिर सारे 
दिन की इबादतों के पश्चात शाम को ९२ लोगों ने रक्त-दान कर के इस पावन 
कार्य में भाग लिया जिन में विभिन्न धर्मों ,विभिन्न प्रांतों के लोग ,महिलाएं ,
पुरुष ,यहां तक कि विदेशी लोग भी शामिल हुए  .

गोवा मेडिकल कॉलेज के डॉ.संजय के सौजन्य से ये शिविर संपन्न  हो सका ,
इस शिविर की विशेष बात ये थी कि प्रत्येक व्यक्ति ने इस में नि:स्वार्थ
भावना से अपना भरपूर योगदान दिया और इसे एकता ,भाईचारे,इंसानियत 
और शांति संदेश के रूप में स्थापित किया .

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

..........जीने की अदा जाने

एक ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है

...........जीने की अदा जाने
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न है दुनिया की कुछ परवा ,न कुछ अच्छा बुरा जाने
कोई समझे क़लंदर उस को और कोई गदा जाने

मदद से असलहों की जो दुकां अपनी चलाता है
मुहब्बत ,दोस्ती,एह्सास, जज़्बा ,फ़िक्र क्या जाने?

जिया जो दूसरों के वास्ते है बस वही इंसां
कि अपने वास्ते जीने को वो अपनी क़ज़ा जाने

फ़राएज़ की जगह ऊंची न होगी जब तलक हक़ से
तो दुनिया भी तेरी बातों को गूंगे की सदा जाने

सऊबत ज़िंदगी का हर सबक़ ऐसे सिखाती है
कि नादारी में भी इंसान जीने की अदा जाने

नज़र में उन की गर मज़हब है इक शतरंज का मोहरा
तो फिर अंजाम कैसा,क्या ,कहां होगा ख़ुदा जाने

वफ़ादारी ही जिस की ज़ात का हिस्सा रही बरसों
मगर ये क्या हुआ कि आज वो इस को सज़ा जाने

न जाने किस ज़माने में ’शेफ़ा’ वो शख़्स जीता है
जो ख़ुद्दारी,रवादारी,मिलनसारी, वफ़ा, जाने

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क़लंदर = जो दीन ओ दुनिया से अलग हो  ; गदा=फ़क़ीर ;असलहा =हथियार; क़ज़ा =मौत
सऊबत =परेशानियां,कठिनाइयां ; नादारी= ग़रीबी 

रविवार, 5 दिसंबर 2010

शुक्रिया

"शुक्रिया ,अविनाश जी "
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गोवा की प्राकृतिक सुंदरता के बारे में कौन नहीं जानता,
ऊपर वाले ने दिल खोल कर प्राकृतिक सौंदर्य की दौलत बख़्शी है. कई वर्षों से गोवा की इस हरी भरी वसुंधरा पर 
एक आयोजन किया जा रहा है iffi  (international film festival of India) का ,इस आयोजन को सफल बनाने वाले
कर्मठ दल के सदस्यों में एक नाम है ’अविनाश वाचस्पति जी’ का
ब्लॉग जगत इस नाम से भली भांति परिचित है ,उन से मेरी मुलाक़ात गोवा में ही हुई ,अविनाश जी के बारे में क्या कहूं बस ये समझ लीजिये कि एक सरल ,विचारवान ,सुशिक्षित ,सुसंकृत, सज्जनता के प्रतीक साहित्य को और अपने काम को समर्पित व्यक्तित्व का नाम है "अविनाश वाचस्पति" ,  उन के ही सौजन्य से इस बार हम iffi के समापन समारोह का भी आनंद उठा सके  जिस अनुभव से हम इतने वर्षों में भी वंचित थे .
इतनी मसरूफ़ियत के बावजूद भी अविनाश जी हमारे ग़रीबख़ाने पर तशरीफ़ लाए I. हम ने ब्लॉगिंग पर 
ब्लॉगिंग के नियमों और आचार संहिता आदि पर चर्चा की ,उन्होंने मुझे ब्लॉगिंग से संबंधित महत्वपूर्ण बातें भी सिखाईं 
आज ४ दिसंबर को दिल्ली  जाते समय  उन्होंने फ़ोन पर बात कर के विदा ली
इन सारी बातों और सार्थक मुलाक़ातों लिये अविनाश जी का बहुत बहुत शुक्रिया अदा करना चाहती हूंकि जिन के कारण मुझे कुछ सीखने को मिला
बहुत बहुत शुक्रिया अविनाश जी

बुधवार, 17 नवंबर 2010

ईद के पुर मसर्रत मौक़े पर एक क़ता 
पेश ए ख़िदमत है
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बा मानी  ईद
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मनाएं ईद मगर दिल में ये ख़याल रहे
किसी नफ़स के न दिल में कोई मलाल रहे
न भूख से कोई बच्चा कहीं तड़पता हो 
न सूनी नज़रों में भी कोई अब सवाल रहे 
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आप सभी को ईद बहुत बहुत मुबारक हो

बुधवार, 3 नवंबर 2010

तमन्ना- ए- चराग़- ए- दीवाली

आप सभी को दीपावली की बहुत बहुत 
बधाई
और
शुभ कामनाएं 

इस बार बाज़ार में  जब दीवाली के दियों पर नज़र पड़ी तो अचानक मेरे ज़ह्न में ये ख़याल 
आया कि  भारत की मिट्टी से बने इस दिये की ख़्वाहिशात क्या क्या हो सकती हैं?
बस कुछ हुरूफ़ जो ज़ह्न में अल्फ़ाज़ का रूप  लेने लगे वो एक नज़्म  की शक्ल में 
आप की ख़िदमत में पेश कर रही हूं ,उम्मीद है आप भी मुझ से इत्तेफ़ाक़ करेंगे

तमन्ना-ए-चराग़-ए-दीवाली
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मैं चाहता हूं जलूं देश की हिफ़ाज़त में
मैं चाहता हूं जलूं इल्म की रेयाज़त में
मैं चाहता हूं जलूं अह्द की सदाक़त में
मैं चाहता हूं जलूं क़ौम की रेफ़ाक़त में

ये चाहता नहीं बैठूं मैं शाहराहों पर
ये चाहता नहीं पहुंचूं मैं ख़ानक़ाहों पर
मैं रौशनी जो बिखेरूं तो ऐसी राहों पर
जहां से जाते सिपाही हों हक़ की राहों पर

मेरी ज़िया से हर इक सिम्त में उजाला हो 
कि झूठ कोई नहीं सच का बोलबाला हो 
मेरा वजूद ग़रीबों के घर का हाला हो
मेरी वो रौशनी पाए कि जो जियाला हो

मैं उन को रौशनी दूं जो पढ़ें चराग़ों में
उन्हें दिखाऊं ज़िया जो पले गुनाहों में
मैं इक मिसाल बनूं ग़ैर के दयारों में
बसी हो प्रेम की बस्ती मेरे शरारों में

है अब यक़ीन कि पूरे करूंगा ये अरमां
बदलती फ़िक्र ने मंज़िल के दे दिये हैं निशां
मैं उन को याद दिलाऊंगा देश के एहसां
जो कर चुके  हैं फ़रामोश अपनी धरती मां

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रियाज़त=मेहनत ; सदाक़त= सच्चाई; रेफ़ाक़त= दोस्ती; सिम्त = दिशा ;अह्द =वादा
शाहराह =वो रास्ता जहां  से बाद्शाह गुज़रें ,ख़ानक़ाह = जहां फ़क़ीर   ,दर्वेश 
रहते हों ;ज़िया =  रौशनी ; हाला = रौशनी का घेरा  ;जियाला  =बहादुर
दयार =शह्र ,इलाक़ा ; शरारा =चिंगारी  ;दरमां =इलाज

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

तुम्हारे नाम................................

आज यूं तो कोई विशेष बात नहीं ,मित्रता दिवस भी नहीं ,परंतु मन के भावों के प्रकटीकरण के लिये किसी विशेष दिवस की प्रतीक्षा क्यों करूं ? आज मैं अपने मन के ये उदगार समर्पित करती हूं अपनी बेहतरीन दोस्त "वन्दना अवस्थी दुबे " को ,सर्वशक्तिमान से दुआ है कि उन का जीवन सदा प्रकाशमय रहे ,कभी कोई दुख की बदली भी न छाए ( आमीन ) 

तुम्हारे नाम ...............
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ऐ मेरी दोस्त ,
मेरी साथी सुन,
तू मेरे वास्ते  क्या है
ये बताऊं कैसे?
 ऐसे अल्फ़ाज़ बने ही नहीं शायद अब तक
जिन से मैं पेश करूं तेरे लिये अपने ख़याल
जब भी तकलीफ़ मुझे कोई हुई
तूने दी मुझ को वो हिम्मत
कि मैं सह पाऊं उसे
तू ने हर छोटी सी ख़्वाहिश 
भी मेरी पूरी की
मेरी छोटी सी सफलता पे भी 
तू यूं ख़ुश थी
जैसे इक मां का हो सपना पूरा
चाहे तू ख़ुद भी हो डूबी 
किसी कठिनाई में
तू ने की दूर मेरी चिंताएं
हो मेरी आंख में आंसू 
तो बिलक उट्ठे तू
और जो मुस्कान लबों पर देखे
खिलखिलाने लगे तू साथ मेरे

मेरे ज़ख़्मों के लिये मरहम तू
मेरी ख़ुशियों का लिये परचम तू
मेरी मुश्किल में सहारा बन कर 
तू मेरे साथ रहा करती है
मेरी कमियों को बता कर तू ने 
बारहा रोका मुझे ग़लती से

दोस्ती पर है मुझे नाज़ तेरी
तू है मोहसिन मेरी ,हमराज़ मेरी

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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

..............वो इक ज़िया ही नहीं

आज इस ब्लॉग की सालगिरह के मौक़े पर एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है
इस एक साल के सफ़र में आप सब ने जो सहयोग  और  मान दिया
है,उस के लिये मैं बहुत बहुत शुक्रगुज़ार हूं ,ये सफ़र आप सब के सहयोग ,
मशवरों और स्नेह के बिना संभव ही नहीं था ,आप सब के द्वारा दिया 
गया मान और पहचान मेरे जीवन की अमूल्य निधि है ,जिस के लिए सब से पहले 
वंदना अवस्थी दुबे की शुक्रगुजार हूँ जो मुझे ब्लॉग जगत में लाईं और फिर आप सब 
का बहुत बहुत शुक्रिया कि आप ने मुझे इस मंच पर स्थान दिया ,
लीजिये ग़ज़ल हाज़िर है 
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............वो इक ज़िया ही नहीं
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दरीचे ज़हनों के खुलने की इब्तिदा ही नहीं
जो उट्ठे हक़ की हिमायत में वो सदा ही नहीं

ज़मीर शर्म से ख़ाली हैं ,दिल मुहब्बत से 
हम इरतेक़ा जिसे कहते हैं, इरतेक़ा ही नहीं

तख़य्युलात की परवाज़ कौन रोक सका
परिंद जब ये उड़ा फिर कहीं रुका ही नहीं

ग़म ए जहां पे नज़र की तो ये हुआ मालूम
जफ़ा जो हम ने सही ,वो कोई जफ़ा ही नहीं

बग़ैर इल्म के ज़ुलमत कदा है ज़ह्न मेरा
जो कर दे फ़िक्र को रौशन ,वो इक ज़िया ही नहीं

तेरी वफ़ाओं का शीराज़ा मुंतशिर हो कर
बता रहा है हक़ीक़त में ये वफ़ा ही नहीं

जब आया आख़री लम्हात में मसीहा वो
न शिकवा कोई ’शेफ़ा’ और कोई गिला ही नहीं

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इब्तेदा = शुरूआत ; दरीचे =खिड़कियां ;हक़ =सच्चाई ; हिमायत = तरफ़दारी ; इरतेक़ा = तरक़्क़ी ; 
तख़य्युलात=  विचार (ख़याल का बहुवचन) ; जफ़ा = ज़ुल्म ; ज़ुलमत कदा = अंधेरी जगह ; 
फ़िक्र = सोच ; ज़िया = रौशनी ; शीराज़ा = arrangements ; मुंतशिर = बिखरना