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मंगलवार, 18 नवंबर 2014

एक अरसे के बाद ग़ज़ल की शक्ल में कुछ टूटे फूटे अल्फ़ाज़ और ख़यालात के साथ हाज़िर हूँ

............. लौट भी आओ सफ़र से
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ख़बर भेजो कभी तो नामाबर से
यही हैं राब्ते अब मुख़्तसर से 
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बहुत दुश्वार है सहरा नविरदी
बस अब तुम लौट भी आओ सफ़र से 
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निशने पर हूँ मैं हर सम्त से ही
इधर से तीर और ख़ंजर उधर से
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पराया कर दिया लहजे ने तेरे
मैं फिर गुज़रा नहीं उस रहगुज़र से
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हमारे हौसले पतवार बन कर
बचा लाए सफ़ीने को भँवर से
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तुम्हारी बेक़रारी कह रही है
कभी बिछड़े नहीं थे अपने घर से
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नामाबर= संदेश वाहक;  मुख़्तसर= छोटा ; दुश्वार= कठिन;
 सहरा नविरदी = यायावरी ; सम्त= ओर ; रहगुज़र= रास्ता ;
 सफ़ीना= नैया ; बेक़रारी = बेचैनी 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

 आज एक नज़्म ले कर हाज़िर हुई हूँ
उम्मीद है आप को पसंद आएगी

हय्या अला ख़ैरिल अमल ( नेक काम के लिये खड़े हो जाओ )
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ये ख़ौफ़ ओ दहशत के हैं मुनादी
कि ख़ुद को कहते हैं जो जेहादी
वो जिस को चाहें हलाक कर दें
वो जिस को चाहें अमान दे दें
है उन का दावा वही हैं हक़ पर
यक़ीन उन को है लफ़्ज़ ए हक़ पर
जो उन का हामी नहीं ,,वो काफ़िर
जो उन का साथी नहीं,, वो जाबिर
वो मस्जिदों में भी ख़ूँ बहा दें
वो नन्हे बच्चों को भी न बख़्शें
न जाने कितने हैं घर उजाड़े
न जाने कितने नगर उजाड़े
न जाने कैसा मुहीब सा वो
जहाँ को नक़्शा दिखा रहे हैं
वो बर्बरीयत के खेल ही को
है दीन ओ ईमाँ बता रहे 
मगर ये पूछे तो कोई उन से
यही है ईमाँ तो फिर वो क्या है?
यही है मज़हब तो फिर वो क्या है ?
कि जिस में दुश्मन से भी मुहब्बत
कि जिस में हमसाए से रेफ़ाक़त
कि जिस में है औरतों की इज़्ज़त
कि जिस में है हर नफ़स से शफ़क़त
हर एक नुक़्ता सिखा रहा है
जेहाद क्या है बता रहा है

जेहाद, फ़ितनों को रोकना है
जेहाद, हमलों को रोकना है
ये दम ब दम बढ़ती ख़्वाहिशों पर
लगाम कसना, जेहाद ही है
बुझाना प्यासे की प्यास या फिर
किसी के आँसू को पोछना हो
जेहाद के ही हैं काम सारे
जेहाद के ही हैं नाम सारे

अगरचे मैदान में है जाना
अगरचे शमशीर हो उठाना
तो तीरगी के ख़िलाफ़ उट्ठो
जहालतों के ख़िलाफ़ उट्ठो
मिटाओ बातिल के वलवलों को
कुचल दो बातिल के हौसलों को
यही है मज़हब, यही धरम है
जो तुम बताते हो वो भरम है
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मुनादी = एलान करने वाला; हलाक = मारना; मुहीब = डरावना; बर्बरीयत= बर्बरता
रेफ़ाक़त = दोस्ती; नफ़स = व्यक्ति; शफ़क़त = स्नेह ;  अगरचे = यदि; 
तीरगी = अँधेरा; बातिल = असत्य .

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल
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सदा अवाम की उट्ठी तो फिर दबा न सके
वो आज परचम ए इन्सानियत झुका न सके
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अब इम्तेहान की सा’अत में क्यों ये बेचैनी
जो सारी उम्र ही नेकी कोई कमा न सके 
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ख़ुतूत फाड़ के कोशिश तो हम ने की लेकिन
हम एक पल को भी तुम को कभी भुला न सके
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ज़रूरतें हमें आवाज़ दे रही थीं मगर
हम इस ज़मीन से कुछ दूर भी तो जा न सके
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ये कोशिशों में कमी थी कि कोई मजबूरी
जो हम ने अह्द किये थे उन्हें निभा न सके
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मिली है तरबियत ऐसी हमें बुज़ुर्गों से
क़दम कभी भी सदाक़त के डगमगा न सके
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अवाम= जनता; परचम= झंडा; सा’अत= समय
सदाक़त= सच्चाई

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

 एक फ़िलबदीह (आशु) ग़ज़ल 
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दिल की बस्ती उजड़ गई है अभी
ज़ख़्मी ज़ख़ी सी ज़िंदगी है अभी
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उस की ज़िंदादिली से लगता है
कोई मुश्किल नहीं पड़ी है अभी
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मेरी हालत प मुस्कुराता है
उम्र तेरी कहाँ कटी है अभी ?
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शाम के साए हो गए गहरे
दर प इक शम’अ सी जली है अभी
*
उस के चेहरे प दास्ताँ पढ़ लूँ
इतनी आँखों में रौशनी है अभी
*
ऐ ’शेफ़ा’ किस ने जंग छेड़ी है?
तेरी तो सब से दोस्ती है अभी

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

इस बार कुछ क़िता’त पेश ए ख़िदमत हैं

क़िता’त
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झूट पर झूट है, अय्यारी है, मक्कारी है
और हक़ीक़त ये बताती है सितम जारी है
कितने मासूम हैं गोदी में अजल की सोए
हाकिम ए शह्र का कहना है अदाकारी है

***
ख़ुदा की है अताकरदा वो क़ूवत बेज़बानों में
कि जो हलचल मचा सकती है ज़ालिम हुक्मरानों में
उठो अब मुत्तहिद हो कर इन्हें समझो वगरना फिर
कहीं गुम हो के रह जाओगे तुम इन दास्तानों में
***
क़दरें बदल गई हैं ,ज़माना बदल गया
इंसानियत का आज तराना बदल गया
तिफ़्लान ए दौर के भी रुख़ों पर है बेबसी
मासूमियत का ठौर-ठिकाना बदल गया
***
क्या रोक पातीं उस को सुनहरी ये तीलियाँ
पर्वत प हौसलों के जो आबाद हो गया
करता रहा मैं क़ैद ओ क़फ़स पर ही तब्सेरे
वो तीलियों को तोड़ के आज़ाद हो गया
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अय्यारी= मक्कारी का पर्याय ; अजल= मौत ; अताकरदा= दी हुई; 
मुत्तहिद= एक हो कर (unite) ; क़दरें= मूल्य (values) ; 
तिफ़्लान ए दौर = आज के बच्चे ; क़फ़स= पिंजरा , जेल ;
तब्सेरे= टिप्पणी

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आज फिर एक हिंदी ग़ज़ल के साथ आप के समक्ष हूँ

ग़ज़ल
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छोटी सी ही आस बहुत है
थोड़ा सा उल्लास बहुत है
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तेरे साथ जो पल-छिन बीते
उन का बस आभास बहुत है
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उस ने नाता तोड़ लिया पर
अब भी, मन के पास बहुत है
*
मैं ख़ुद डाँवाडोल हूँ लेकिन
साथी पर विश्वास बहुत है
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वाणी में कोमलता है पर
आँखों में उपहास बहुत है
*
वर्षों पहले जो बीता था
सीखें , तो इतिहास बहुत है
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सुविधाओं की गोद में बैठे
कहते हैं , ’संत्रास बहुत है’
*
दुख में भी मुस्काते रहना
हम को ये अभ्यास बहुत है
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लंबा अरसा गुज़र जाता है और शायद आप लोग
 भूलने लगते होंगे तो मैं फिर कुछ न कुछ
 ले कर हाज़िर हो जाती हूँ और 
आज तो
ब्लॉग की सालगिरह भी है
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ग़ज़ल
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 सपनों में तू आया कर
स्वर्ग की सैर कराया कर

नफ़रत की चिंगारी पर 
प्रेम सुधा बरसाया कर

चाँद को पाना नामुमकिन
चातक को समझाया कर

नाउम्मीदी कुफ़्र भी है
आस के दीप जलाया कर

दिल तो ज़िद्दी बच्चा है
प्यार की बीन बजाया कर

वक़्त का पहिया घूमेगा
इतना मत इतराया कर

कमज़र्फ़ी के मारों को
आईना दिखलाया कर
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