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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लंबा अरसा गुज़र जाता है और शायद आप लोग
 भूलने लगते होंगे तो मैं फिर कुछ न कुछ
 ले कर हाज़िर हो जाती हूँ और 
आज तो
ब्लॉग की सालगिरह भी है
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ग़ज़ल
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 सपनों में तू आया कर
स्वर्ग की सैर कराया कर

नफ़रत की चिंगारी पर 
प्रेम सुधा बरसाया कर

चाँद को पाना नामुमकिन
चातक को समझाया कर

नाउम्मीदी कुफ़्र भी है
आस के दीप जलाया कर

दिल तो ज़िद्दी बच्चा है
प्यार की बीन बजाया कर

वक़्त का पहिया घूमेगा
इतना मत इतराया कर

कमज़र्फ़ी के मारों को
आईना दिखलाया कर
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

एक नज़्म हाज़िर ए ख़िदमत है 

ख़्वाहिश
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वो रोकता मुझे इक बार 
मैं पलट आता
मैं उस के जौर ओ सितम
ख़ुशदिली से सह लेता
मुझे वो मूरिद ए इल्ज़ाम
भी जो ठहराता
ख़ुशी से सारे वो इल्ज़ाम
ख़ुद पे ले लेता
मैं उस की छोटी सी ख़्वाहिश
पे जाँ लुटा देता
मुहब्बतों का जनाज़ा
 मैं दफ़्न कर देता

मगर न जाने कि क्या 
जुर्म हो गया मुझ से
न उस ने मुझ को बुलाया
न इक दफ़’आ रोका
मैं अपनी लाश को
कांधों पे अपने ढोता रहा
और एक वक़्त ये आया
सुपुर्द ए ख़ाक हुआ

बस एक चीज़ ही
ज़िंदा रही मेरे अंदर
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे पुकारेगा
वो इक उमीद कि 
शायद मुझे बुला लेगा
वो इक यक़ीन भी देगा
कि कुछ हुआ ही न था
वो मेरा दोस्त कभी मुझ से 
यूँ ख़फ़ा ही न था 
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जौर ओ सितम = अत्याचार, ज़ुल्म ,,,,,मूरिद ए इल्ज़ाम= आरोपी,,,,
जनाज़ा= शव,,,,सुपुर्द ए ख़ाक=धरती को सौंपना ,दफ़्न कर देना,,,,


मंगलवार, 6 अगस्त 2013

आज उर्दू ग़ज़ल पर वापस आते हैं,,यूँ तो ग़ज़ल, ग़ज़ल है चाहे वह किसी भी भाषा में हो 
क्योंकि उस का आधार तो भावनाएं हैं , जज़्बात हैं 
और इन्हें ज़ुबान के बदल जाने से 
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

ग़ज़ल
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शफ़क़त* निसार* की है ,निगाहों ने उम्र भर
महफ़ूज़* रक्खा माँ की दुआओं ने उम्र भर
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थीं मेरे पास अपनों की सारी मुहब्बतें 
फिर भी दिया है साथ परायों ने उम्र भर
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शायद मिले सुकून अजल* की पनाह में
लेने दिया न चैन ख़ताओं * ने उम्र भर
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मज़हब के नाम पर जहाँ तलवार खिंच गई
नादिम* किया है ऐसी सभाओं ने उम्र भर
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चाहा मगर न दिल से वो एह्सास मिट सका
ज़ख़्मी किया शिकस्त* के लम्हों ने उम्र भर
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ठोकर जो खाई फिर न क़दम रख सके ’शेफ़ा’
यूँ तो सदाएं दीं  तेरी राहों ने उम्र भर
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शफ़क़त= वात्सल्य,स्नेह ,,,,,, निसार= न्योछावर,,,,,
महफ़ूज़= सुरक्षित,,,,,,अजल= मौत,,,,,,
ख़ताओं= ग़ल्तियों,,,,,,नादिम= शर्मिंदा, लज्जित,,,,,,
शिकस्त= हार, पराजय

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ग़ज़ल


एक और हिंदी ग़ज़ल आप के समक्ष प्रस्तुत है

ग़ज़ल
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कैसे बिसराऊं भला बीता हुआ पल कोई
कल्पनाओं में जो बजती रहे पायल कोई
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कोई संवाद नहीं और कोई संबंध नहीं
भाव जीवन में नहीं रह गया कोमल कोई
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कितनी चिंताओं का वो बोझ लिये फिरता है
अब न बचपन है, न बच्चा रहा चंचल कोई
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कैसी संवेदना, कैसी करुणा और दया
हम ने जब छोड़ दिया रस्ते पे घायल कोई
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कामना है कि बनूँ ऐसी बयारें इक दिन
कर सकूँ तपता हुआ मन कभी शीतल कोई
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अब न करना कभी साहस उसे तुम छलने का
हिरनियाँ भी हैं सबल, समझे न निर्बल कोई
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ऐ ’ शेफ़ा’ छोड़ गई माँ तेरी जब से तुझ को
वैसा स्पर्श मिला तुझ को न आँचल कोई
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गुरुवार, 30 मई 2013

एक हिंदी ग़ज़ल प्रस्तुत करने का साहस कर रही हूँ
जो कमियाँ हों उन से अवगत कराने की कृपा अवश्य करें
धन्यवाद !
ग़ज़ल

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हम कर्तव्यों को पूर्ण करें, माँगें केवल अधिकार नहीं
मानव से मानव प्रेम करे,संबंधों का व्यापार नहीं

जिस धरती माँ में सहने की शक्ति का पारावार न हो
उस का मत इतना दमन करो ,वह कह दे तुम स्वीकार नहीं

जैसे सागर में सरिता हो,जैसे पुष्पों से भ्रमर मिले
निस्सीम प्रेम आधार बने, उपकार रहे अपकार नहीं

नि:स्वार्थ प्रेम के भाव लिये ये कौन है मन के द्वार खड़ा
आगंतुक तुम ही बतला दो, क्यों पहले आए द्वार नहीं

कंगन,चूड़ी,पायल,बिछिया,मेंहदी,रोली,झूमर,टीका
सब भावों के संवाहक हैं ,केवल सज्जा-श्रंगार नहीं

सर्वस्व निछावर करने को,तय्यार है सैनिक सीमा पर
है देश प्रेम ही बल उसका, बंदूक़ नहीं , तलवार नहीं

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मंगलवार, 7 मई 2013

एक महीने के वक़फ़े के बाद एक ग़ज़ल के साथ फिर हाज़िर हूँ
शायद पसंद आए

ग़ज़ल
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धड़कनें हों जिस में, वो ऐसी कहानी दे गया
चंद   किरदारों की कुछ यादें पुरानी दे गया
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टूटे    फूटे   लफ़्ज़   मेरे   शेर   में   ढलने   लगे
मेरा मोह्सिन मुझ को ये अपनी निशानी दे गया
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रोज़ ओ शब की रौनक़ें, वो क़हक़हे, वो महफ़िलें
साथ  अपने  ले  गया  और  बेज़बानी   दे   गया
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क्यों ख़ताएं उस की गिनवाते हो तुम शाम ओ सहर
बीज  ख़ुद  बोए  थे  तुम  ने , बस  वो  पानी  दे गया
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ज़िंदगी   ख़ुद्दारियों   के   साए   में   ही   कट   गई
बस  विरासत   में वो  अपनी  जाँफ़ेशानी   दे गया
***** 
माँ का आँचल ,बाप की शफ़क़त के साए का सुकूँ
दूर   सरहद  पर  जवाँ  हर   शादमानी   दे  गया 
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इक मता’ ए फ़िक्र ओ फ़न ,हाथों में तेरे सौंप कर
ऐ  ’शेफ़ा’  वो   तेरे   ज़िम्मे   पासबानी  दे  गया
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किरदार= चरित्र; मोहसिन= जिस ने उपकार किया हो
ख़ताएं= दोष; जाँफ़ेशानी= कड़ी मेहनत; शफ़क़त= स्नेह
शादमानी= ख़ुशी; मता’ ए फ़िक्र ओ फ़न= चिन्तन और कला की दौलत;
पासबानी= रक्षा

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

लीजिये ’चराग़’ रदीफ़ के साथ एक ग़ज़ल कहने और आप तक पहुंचाने की हिम्मत कर रही हूं
और
अब नतीजे का इंतेज़ार है
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ग़ज़ल
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आँधियाँ ज़ुल्म जो ढाएं तो बिफरता है चराग़
वरना उफ़रीत को ज़ुलमत के निगलता है चराग़
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ख़ैर मक़दम में अँधेरों के वो जल जाता है
आग में तप के सर ए शाम निखरता है चराग़

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रात जब नींद की आग़ोश में गुम होती है
कितनी ख़ामोशी से तनहाई में जलता है चराग़
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हसरतें , ख़्वाहिशें, अरमान बुझे जाते हैं
पर दम ए रुख़सत ए आख़िर को संभलता है चराग़
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यूँ तो आँधी के मुक़ाबिल भी डटा रहता है
और कभी हल्के से झोंके से बिखरता है चराग़
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चाहता है कि वो क़ुरबान हो इंसानों पर
कारनामों से प इन्साँ के दहलता है चराग़

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ऐ ’शेफ़ा’ सौंप के ख़ुर्शीद को अपनी दुनिया
सुबह  की पहली किरन देख के मरता है चराग़
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१-उफ़रीत= राक्षस; २-आग़ोश= गोद; ३- दम ए रुख़सत ए आख़िर= अंतिम समय;
४- ख़ैर मक़दम= स्वागत; ५-ख़ुर्शीद= सूरज