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गुरुवार, 21 जून 2012

आज फिर एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हूँ इस उम्मीद के साथ कि आप सब हज़रात ओ ख़वातीन 
      मेरी बार बार की ग़ैर हाज़िरी को नज़र अंदाज़ कर के अपने ख़यालात से ज़रूर नवाज़ेंगे / नवाज़ेंगी , शुक्रिया


ग़ज़ल
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अपनी चालों से ख़ुद मात खाने लगे
तब यक़ीं के क़दम डगमगाने लगे
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लम्स ममता का बख़्शे वो आसूदगी
तिफ़्ल ख़्वाबों में भी मुस्कुराने लगे
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अब्र ए बाराँ से सोंधी जो ख़ुश्बू उठी
ख़ुद ब ख़ुद मेरे लब गुनगुनाने लगे
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साथ दीवार के रंजिशें ढह गईं
दोनों जानिब क़दम आने -जाने लगे
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एक मुद्दत रही हल्की-हल्की तपिश
आग ठंडी हुई ,पर ज़माने लगे 
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एक क़तरा ’शेफ़ा’ एहतेजाजन उठा
और नदी के क़दम लड़खड़ाने लगे
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आसूदगी= आराम,राहत ; तिफ़्ल= बच्चा ;एहतेजाजन=विरोध में

बुधवार, 23 मई 2012

२ माह के वक़फ़े के बाद एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है  
आप सब के क़ीमती मश्वरों का इंतेज़ार रहेगा 
शुक्रिया

......हमनवा नहीं होता 
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वो जो मुझ से ख़फ़ा नहीं होता
दर्द हद से सिवा नहीं होता
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हमज़बाँ तो बहुत मिले लेकिन
क्यों कोई हमनवा नहीं होता
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आग बस्ती की वो बुझाता तो
उस का घर भी जला नहीं होता
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कोई कोशिश कभी तो की होती
तुम से कुछ भी छिपा नहीं होता
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जाग जाते अगर ज़रा पहले
सानेहा ये हुआ नहीं होता
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फ़िक्र रोटी की जो नहीं होती
कोई अपना जुदा नहीं होता
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तुम मसीहाई को जो आ जाते
ख़ौफ़ मुझ को ’शेफ़ा’ नहीं होता
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सिवा= ज़्यादा ; सानेहा= दुर्घटना

गुरुवार, 22 मार्च 2012

ग़ज़ल

एक तरही ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है जिस का तरही मिसरा था 
"इब्ने मरियम हुआ करे कोई "
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ख़्वाब बन कर मिला करे कोई
दर्द की यूँ  दवा करे कोई 

ज़िदगी की तरफ़ जो ले आए
"इब्ने मरियम हुआ करे कोई "

अपनी जाँ पर सहे सितम सारे
ऐसे भी तो वफ़ा करे कोई

ज़ुलमतें दूर कर दे ज़हनों से 
शम ’अ बन कर जला करे कोई

क़स्र ए सुल्ताँ में कौन सुनता है 
कुछ कहे तो कहा करे कोई

ज़िंदगी में मिले सुकूँ लेकिन 
ख़्वाहिशों से वग़ा करे कोई

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ज़ुल्मतें = अँधेरे ; क़स्र = महल ; वग़ा = युद्ध  

मंगलवार, 6 मार्च 2012

कविता


आप सभी को होलीबहुत बहुत मुबारक हो 

.........कहीं ये अर्थ न खो दें 
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मनोभावों को करते व्यक्त 
सारे रंग होली के 
बहुत सुंदर ,बहुत गहरे हैं 
सारे रंग होली के 

ये पीले, लाल, नारंगी
हरे, नीले , गुलाबी सब 
छिपाए अपने अंदर 
रंग, हैं भंडार अर्थों का
सभी रंगों के अर्थों में 
मिलेगी भिन्नता, लेकिन
कोई इक चीज़ है जो
इन सभी रंगों में साझी है
वो है संवेदना
जो प्यार की भाषा समझती है,
वो है सद्भावना 
जो मित्रता की बात करती है ,
ये हैं संदेश देते 
एकता के और समन्वय के
नहीं कोई बड़ा-छोटा,
न कोई रंक न राजा

यही हम सुनते आए थे 
यही अनुभव हमारा था
मगर मुझ में न जाने क्यों
ये पिछले चंद सालों से
पनपने सा लगा इक भय
कहीं ये प्यारे सुंदर रंग 
अपने अर्थ न खो दें 

कहीं टेसू के फूलों की जगह
तेज़ाब न ले ले ?
कहीं सद्भावना, दुर्भावना से 
हार न जाए ?
कहीं आरक्षणों का विष
रहीम और राम के मन से 
समन्वय को हटा कर
एकता को नोच न फेंके ?

न जाने कितने लोगों का 
यही इक भय जो 
सोते जागते हर दम 
हमारा पीछा करता है
कहीं ये प्यारे प्यारे रंग
अपने अर्थ न खो दें ?

चलो अपनी जगह हम सब
यही बस एक प्रण कर लें
यही दृढ़ता से निर्णय लें
न होने देंगे कम 
सौंदर्य हम होली के रंगों का

हमें इनकार है 
दुनिया की सारी ऐसी चीज़ों से
विचारों की जो सुंदरता को 
कर दें नष्ट दुनिया से 
न खोने देंगे हम,कोई भी
क़ुदरत का हसीं तोहफ़ा
न धुंधला होने देंगे अर्थ
इन होली के रंगों का 
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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

.............इस दयार में

एक आम सी ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है ,,

ग़ज़ल
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पथरा गई निगाह इसी इंतेज़ार में 
आएगा कोई शख़्स कभी इस दयार में 
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चाहा था तुम ने फूल खिलें रेगज़ार में 
पर बात ये नहीं थी मेरे एख़्तियार में 
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ऐ रहनुमा ए क़ौम यक़ीं कैसे हो हमें 
धोके मिले हैं हम को सदा एतबार में 
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लोरी , कहानी, प्यार की थपकी कहाँ गई
नन्हे सवाल हैं निगह ए अश्कबार में 
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कैसी उड़ान ,कैसी बलंदी , कहाँ का जोश
सब ख़त्म हो गया तेरे बस एक वार में
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हम ने ज़मीर का कभी सौदा नहीं किया
बस ख़्वाहिशात हार गईं कारज़ार में
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तन्हाइयों को दोस्त बनाना न ऐ ’शेफ़ा’
खो जाएगी हयात ये गर्द ओ ग़ुबार में 
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रेगज़ार = रेगिस्तान ; निगह ए अश्कबार = आँसुओं से भरी आँख ; कारज़ार = युद्ध 
गर्द ओ ग़ुबार = धूल और मिट्टी





गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

ग़ज़ल

एक ग़ज़ल जिसे आप शिकायत समझें या समाज में बढ़ते  जा रहे ख़ुदग़र्ज़ी के जज़्बे से एक लम्हे  भर को दुखी हुए मन की पीर , लेकिन  मेरे लिये ये एहसास लम्हाती था मैं आज भी बहुत पुर उम्मीद  हूँ क्योंकि आज भी समाज में उन लोगों का फ़ीसद ज़्यादा  है जो बे ग़रज़ और बेलौस जज़्बे के साथ  काम करते हैं 

फिर भी  उस एक लम्हे को आप तक पहुँचाने की जुर्रत  रही हूँ

ग़ज़ल
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दूसरों के ग़म में रोता कौन है
बोझ यूँ ग़ैरों के ढोता कौन है 
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मुफ़लिसी ने उस की हिम्मत तोड़ दी
वर्ना यूँ ख़ुशियों को खोता कौन है 
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है सुकून ओ अम्न गाँवों का नसीब
ख़ौफ़ से शहरों में सोता कौन है 
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एक हो कर हम चलो ढूँढें उसे
फ़स्ल ये नफ़रत की बोता कौन है 
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उस ने हर ख़्वाहिश को मदफ़न ही दिया
बोझ यूँ  इसयाँ के ढोता कौन है
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हम पड़ोसी मस’अले कर लेंगे हल
तीसरा ये शख़्स होता कौन है 
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ऐ ’शेफ़ा’ हमदर्दी ए दुश्मन में  अब
कश्तियाँ अपनी डुबोता कौन है 
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मुफ़लिसी = ग़रीबी,,;,,मदफ़न = क़ब्र ,,;,,इसयाँ = गुनाह ,पाप

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

.........दोस्ती घबराएगी "

कभी कभी लिखना चाहते हुए भी कुछ लिखना मुहाल लगता है
ऐसे ही हालात में कही गई ग़ज़ल आप की ख़िदमत में हाज़िर है 

ग़ज़ल
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जान कर बच्चा हमें बहलाएगी 
झुनझुना वादों का फिर दे जाएगी
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उल्झनें जिस ज़ात से मनसूब हैं
मस’अलों को कैसे वो सुलझाएगी
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साँझ ने घूंघट उठाया रात का
चाँद की क़ुर्बत में शब शरमाएगी
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गेसू ए ज़ुल्मत बिखेरे रात ने 
फिर उरूस ए शब कोई बिक जाएगी
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दोस्तों के इस नए अंबोह में 
वो पुरानी दोस्ती घबराएगी 
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रात काटेगी हवेली जाग कर 
और कुटिया चैन से सो जाएगी
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मनसूब = जुड़ी हुई ,, संबंधित ; गेसू = बाल ; ज़ुलमत = अँधेरा
उरूस ए शब = रात की दुल्हन ; अंबोह = भीड़ ; क़ुर्बत = निकटता