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बुधवार, 27 जुलाई 2011

.....अक्सर मज़ाक़ में

जनाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" साहब की एक ख़ूबसूरत  ग़ज़ल और उस के रदीफ़ से मुतास्सिर हो कर की गई एक कोशिश पेश ए ख़िदमत है ,...’मज़ाक़ मेंरदीफ़ की वो ग़ज़ल उन के ब्लॉग पर पोस्ट हुई और जनवाणी, मेरठ के कॉलम गुनगुनाहटमें छपी ,, जिस का लिंक भी पेश ए ख़िदमत है

"................अक्सर मज़ाक़ में"
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रिश्ते भी वो बनाए है अक्सर मज़ाक़ में
उन को मगर निभाएगा क्योंकर मज़ाक़ में

इक झूट सब के बीच वो इस तर्ह कह गया
फिर जाने कितने टूट गए घर मज़ाक़ में

हर लफ़्ज़ तीर बन के जिगर में उतर गया
हालांकि कह रहा था वो हंस कर मज़ाक़ में

जोकर की तर्ह मेरा भी किरदार हो गया
जग को हंसा रहा था मैं रो कर मज़ाक़ में

अपनी ज़ुबाँ पे इतना तो क़ाबू रखो शेफ़ा
तोड़े न दिल चलाए न ख़ंजर मज़ाक़ में


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

.............हम भी ,तुम भी

ग़ज़ल के चंद अश’आर हाज़िर ए ख़िदमत हैं ,
मुलाहेज़ा फ़रमाएं

............हम भी ,तुम भी 
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ऐसी गुज़री है कि हैरान हैं हम भी ,तुम भी
आज फिर बे सर ओ सामान हैं हम भी ,तुम भी
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क्यों है इक जंग ज़माने में अना की ख़ातिर
जबकि दो दिन के ही मेहमान हैं हम भी , तुम भी
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छीन लेता है यहां भाई की रोटी भाई
सानहे कहते हैं हैवान हैं हम भी , तुम भी
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लब थे ख़ामोश प नज़रों के तसादुम ने कहा
चंद जज़्बों के निगहबान हैं हम भी , तुम भी
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ज़िंदगी जीने की फ़िकरें नहीं जीने देतीं 
बेसुकूनी का बयाबान हैं हम भी , तुम भी
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इम्तेहां लेता है वो और वही हल देता है
तालिबे साया  ए  रहमान है  हम भी , तुम भी
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अना = ego ;तसादुम = टकराव ; बयाबान = जंगल
निगहबान =रक्षक ; 

शुक्रवार, 10 जून 2011

.................सहर हो गई

गर्मी की छुट्टियां मसरूफ़ियात में एज़ाफ़ा कर देती हैं और  कभी कभी नेट से रिश्ता रख पाना 
नामुम्किन हो जाता है लिहाज़ा कुछ अरसे के बाद एक तरही ग़ज़ल के साथ हाज़िर हुई हूं 
मुलाहेज़ा फ़रमाएं 

"ज़रा आँख झपकी सहर हो गई "
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दुआ जो मेरी बेअसर हो गई 
फिर इक आरज़ू दर बदर हो गई

वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर 
निगह में तेरी बे समर हो गई 

तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे 
हयात अपनी यूंही बसर हो गई

कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर 
थी ममता जो मिस्ले शजर हो गई 

न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल 
"ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"

वो लम्बी मसाफ़त की मंज़िल मेरी
तेरा साथ था ,मुख़्तसर हो गई

मैं जब भी उठा ले के परचम कोई
तो काँटों भरी रहगुज़र हो गई

’शेफ़ा’ तेरा लहजा ही कमज़ोर था 
तेरी बात गर्द ए सफ़र हो गई 
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बेसमर = असफल ; शजर = पेड़ ; मसाफ़त = दूरी , फ़ासला ;
मुख़्तसर = छोटी ; परचम = झंडा ; रहगुज़र = रास्ता 
गर्द ए सफ़र = राह की धूल

शनिवार, 14 मई 2011

ग़ज़ल

"उस का पावन मन देखा है"
इस तरही मिसरे पर लिखी गई ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत है 

............पावन मन देखा है
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अंबर छाया घन देखा है 
तब मयूर नर्तन देखा है 

धरती का मन आँगन भीगे 
रिमझिम वो सावन देखा है 

सूनी आँखें ,लब पर आहें
क़िस्मत से अनबन देखा है 

झील सी गहरी उन आँखों में 
"उस का पावन मन देखा है"

नाज़ुक जज़्बों का संवाहक 
हाथों में कंगन देखा है 

जो रिश्तों को बाँध के रक्खे
प्यार का वो बँधन देखा है 

जीवन का हर रंग हो जिस में 
ऐसा एक सपन देखा है 

मैला मन भी पावन कर दे 
मुस्काता बचपन देखा है 

स्वार्थ ’शेफ़ा’ की आदत उस ने 
दु:ख में बस अर्चन देखा है 

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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ग़ज़ल

हालात के ज़ेर ए असर इधर कुछ जल्दी जल्दी रचनाएं  आ गईं इस ब्लॉग पर 
लेकिन पिछली ग़ज़ल से इस ग़ज़ल के दरमियान 
तीन कविताओं ने अपना मक़ाम 
हासिल कर लिया 
आज 
फिर एक ग़ज़ल के साथ हाज़िर हूं 
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ग़ज़ल
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अह्द ओ पैमान जो देती है सियासत हम को 
ऐसे वादों की है मालूम हक़ीक़त हम को 

दौलत ओ ज़र से चकाचौंध हुई है दुनिया
आज सीरत की नहीं होती ज़ियारत हम को 

साथ थी बाद ए सबा जब तो ये सोचा भी न था
इक ख़लिश देगी ये सूरज की तमाज़त हम को 

हम नई नस्ल को दे पाएं तो हो फ़र्ज़ अदा
जो कि अजदाद ने सौंपी थी विरासत हम को 

उन की मशकूक निगाहों ने भरम तोड़ दिया
इक यक़ीं भी नहीं दे पाई रिफ़ाक़त हम को 

कितने तब्दील हों माहौल मगर करनी है 
क़द्र ओ तहज़ीब ओ तमद्दुन की हिफ़ाज़त हम को 

मुज़तरिब दिल है ’शेफ़ा’ रूह तड़प उठती है
कितने ज़ख़्मों की कसक देगी मुहब्बत हम को 
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सीरत =चरित्र ; ज़ियारत = दर्शन ; बाद ए सबा = सुबह की ठंडी हवा ; तमाज़त = गर्मी
ख़लिश = बेचैनी; अजदाद = पूर्वज ; रिफ़ाक़त =दोस्ती ; तब्दील = परिवर्तित 
क़द्र = मूल्य(values ) ; तहजीब ओ तमद्दुन = संस्कृति और सभ्यता ; मुज़्तरिब = बेचैन
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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

राहे उम्मीद



"राहे उम्मीद "

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आज इक काया उठी है ले के गाँधी का मिशन 
आज के कंसों के समक्ष आ गया फिर इक किशन
इतने वर्षों से था भ्रष्टाचारियों से तंग समाज
चल रहा था यूं अनैतिक कार्यों का गुंडा राज 
जब उठी आवाज़ कोई शोषितों की मान से 
या तो रिश्वत ने दबाया या गई वो जान से 
पापी गर जेलों तक आए साफ़ सुथरे छुट गए 
पीड़ितों की थी वही हालत बेचारे लुट गए
कोई तरसा इल्म को ,कोई रहा नन्गे बदन 
कोई पानी की कमी से त्रस्त कोई बेकफ़न
आज इन हालात के मद्दे नज़र जर्जर शरीर
उठ गया गाँधी के आदर्शों को ले कर वो फ़क़ीर 
आन्दोलन वो जो चिंगारी से शोला बन गया
हाथ इक दूजे का थामे एक रेला बन गया
ये मिशन प्रतिरोध है बस सिर्फ़ भ्रष्टाचार का
ये मिशन प्रतिरोध है दुखियों के हाहाकार का
ये विरोधी झूठ ,भ्रष्टाचार के , दुष्कर्म के,
ये जिहादी उठ चुके हैं वास्ते सत्कर्म के
ये नहीं शत्रु किसी भी पार्टी या नाम के 
ये विरोधी हैं हमेशा हर अनैतिक काम के 
हैं ये भ्रष्टाचार के वाहक जो अफ़सर देश के
हो कोई भी दल कि बिक जाते हैं रहबर देश के
किस समय की कर रहे हो तुम प्रतीक्षा ये कहो
भंग करना शांति का, लक्ष्य हो तो फिर कहो 
जाग जाओ जल्द वर्ना फिर हैं ये राहें कठिन
क्षीणकाय जान का बल सत्य है ,दौलत न धन
हैं सभी इक साथ कोई अब यहां जाति न धर्म
दुख सभी के एक हैं,आहत सभी के आज मर्म
हाथ में बस हाथ दे कर है ये जनता उस के साथ
मान लो तुम माँग इन की चाहो गर भारत का हाथ 

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इसे पोस्ट करते करते ये समाचार मिला कि सत्य की फिर जीत हुई 
जय हिन्द 

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

एक  कविता प्रस्तुत है
इसे शायद आप ने रश्मि प्रभा जी के blog पर भी पढ़ा होगा
ये विषय भी उन का ही दिया हुआ है
आभारी हूँ रश्मि जी की ,  जिनके कारण इस कविता का अस्तित्व है
उन के विषय पर मेरे भावों का जो प्रभाव है वो आप के समक्ष है


 उसके नाम
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लिख पाती ’उस के नाम’ अगर
मैं अपने सारे सुख लिखती
उस के मन की अंगनाई में
वासंती रुत छाई रहती
उस के जीवन की बगिया में
फूलों के रंग बिखर जाते
वो जिस की बातों में खो कर
सदियों से प्यासी रूहें भी
सपने बुनतीं ख़ुशहाली के
वो जिस के शब्दों की माया
वो जिस की मर्यादित काया
मानवता के पथ पर चलकर
करती उद्धार चरित्रों का
करती उपचार विचारों का

’उस’ जीवन की अफ़रा तफ़री
’उस’ मन के अंतर्द्वन्द्व सभी
’उस’ दिल में बसे दुख दर्दों को
मैं हर न सकी तो जीवन क्या ?

पर वो जो भाग्य विधाता है
बस वो ही क़िस्मत लिखता है
कुछ वश में अगर मेरे होता
मैं उस के सारे दुख हरती
लिख पाती उस के नाम अगर

                                                           तो अपने सारे सुख लिखती