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गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

सैलाब मेरी आँखों में..........

 सैलाब मेरी आँखों में........
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आ गया कैसा ये सैलाब मेरी आँखों में
सारे मंज़र हुए ग़रक़ाब मेरी आँखों में

क्यों नहीं अब मेरी उम्मीद की शम’एं रौशन
क्यों मचलते नहीं अब ख़्वाब मेरी आँखों में

मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

कोई आया ना  बचाने मुझे मैं बेबस था
थी फ़क़त अश्कों की अहज़ाब मेरी आँखों में

मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में

सैलाब=बाढ़;  मंज़र=दृश्य;  ग़रक़ाब =डूबना; अहबाब=दोस्त ; फ़क़त=केवल; अहज़ाब=सेना
मुज़्तरिब=बेचैन ; असबाब=कारण

मंगलवार, 16 मार्च 2010

........ऐतबार मत करना

ग़ज़ल
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चला भी जाऊं तो तुम इंतेज़ार मत करना
और अपनी आंख कभी अश्कबार मत करना

उलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश में
कि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना

मैं जानता हूं कि तख़रीब है तेरी आदत
हरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करना

मेरी हलाल की रोज़ी सुकूं का बाइस है
इनायतों से मुझे ज़ेर बार मत करना

जो वालेदैन ने अब तक तुम्हें सिखाया है
अमल करो, न करो, शर्मसार मत करना

सड़क भी देंगे वो पानी भी और उजाला भी
सुनहरे वादे हैं बस,ऐतबार मत करना

मुझे तो मेरे बुज़ुर्गों ने ये सिखाया है
उदू की फ़ौज पे भी छुप के वार मत करना

तुम्हारे काम ’शेफ़ा’ गर किसी को राहत दें
बजाना  शुक्र ए ख़ुदा इफ़्तेख़ार मत करना

तख़रीब= बर्बाद करना ; रेग ज़ार =रेगिस्तान ; बाइस =कारण ;   ज़ेर बार =एहसान से दबा हुआ                                                             इफ़्तेख़ार =घमंड

रविवार, 7 मार्च 2010


              एक आत्मा की फ़रियाद 
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ये कविता उस स्थिति को ध्यान में रख कर लिखी गई जब एक अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट ये तय कर देती है कि आने वाले जीवन को 
कन्या होने के नाते जीने का अधिकार ही नहीं है ,
ईश्वर ने एक शरीर में आत्मा डाली और उसे बताया कि तुम कन्या बन कर संसार में जाओगी ,ये सुन कर वो आत्मा सिहर उठती है 
और ईश्वर से जो फ़रियाद करती है वो कविता के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है,


कविता :   

हे भगवन ये क्या कहते हो?
क्या धरती पर जाना होगा?
नहीं नहीं मुझ को मत भेजो 
जाते ही तो आना होगा

हे ईश्वर मैं तो हूं कन्या
जिस भी कुल में मैं जाऊंगी
पता नहीं वो कैसा होगा 
जीवित क्या मैं रह पाऊंगी?

ऐसा ना हो पापा मम्मी 
दे न सकें मुझ को सम्मान
भैया का तो होवे आदर 
मिले मुझे ना जीवन दान

मालिक मुझे तो डर लगता है
जीवन शायद प्यार को तरसे
शिक्षा से वंचित रह जाऊं
कह न सकूं कुछ भी मैं डर से 

माना सब कुछ मिल भी गया तो 
भाई बहन का आदर मान
मां पापा का प्यार दुलार
और ज्ञान का भी वरदान

तो भी क्या मैं बच पाऊंगी?
पति के घर में तेल भी होगा 
माचिस की तीली भी होगी
हाथ मेरा पर ख़ाली होगा

तुम तो विघ्नविनाशक हो 
ज़ुल्मों के संहारक हो 
अपनी धरती के लोगों को 
मानवता का पाठ पढ़ाओ

फिर मैं धरती पर जाऊंगी
ज़हरा ,मरियम और सीता के 
पावन पदचिन्हों पर चल कर
इक दिन सब को दिखलाऊंगी

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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अन्तर्मंथन




आप सभी सुधिजनों को रंगों के इस पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं 


अंतर्मंथन
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क्या सच होलिका दहन हुआ ?
क्या क्रोधाग्नि का शमन हुआ ?
या सच्चाई का दमन हुआ ?
और कर्तव्यों का हनन हुआ?

पर्वत ,धरती ,जल और गगन
कितना सुंदर है मेरा चमन,
कौन आया है इस् में  रावण ?
बगिया को मेरी रखे रहन

क्यों होती इक दूजे से जलन ?
क्यों भाई -भाई में अनबन ?
क्यों भूल गए हम भरत मिलन ?
क्या अब भी है धरती पावन ?

है कौन जो इन प्रश्नों को सुने ?
है कौन जो इन के उत्तर दे ?
अब अपने ही अन्दर झांकें
और अपनी सच्चाई आंकें 

क्या हम ने सच्ची कोशिश की ?
नफ़रत हरने की ख़्वाहिश की ?
क्या हम ने प्यार की बारिश की ?
हां ,राजनीति ने साज़िश की 

अब बातें मत तोड़ो मोड़ो ,
जो हुआ उसे पीछे छोड़ो ,
नफ़रत का हर धागा तोड़ो ,
बस ,रंगों से नाता जोड़ो 

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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

"कहाँ खो गईं नन्ही किलकारियां "
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(ये ग़ज़ल २६/११ से मुतास्सिर हो कर कही गयी थी ,लेकिन आज फिर पुणे ब्लास्ट ने हमारे ज़ख्मों को ताज़ा कर दिया ) 
ग़ज़ल

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सरासीमगी सी  समंदर में है,

कि दहशत का आलम हर इक घर में है


 लबों पर तबस्सुम था बिखरा हुआ


प सिस्की अब उन के मुक़द्दर में है


निशाँ ज़र्द चेहरों पे अश्कों के थे 

कि सुर्ख़ी तो क़ातिल के ख़ंजर में है 


कहाँ खो गईं नन्ही किलकारियां 

बस एहसास ,आग़ोश ए मादर में है 


सियासत के क़ज्ज़ाक फिर लूट लेंगे 

तजुर्बा यही क़ल्ब ए मुज़्तर में है 


जो दहशत गरों को छिपा कर रखोगे 

फिर उगलेगा जो ज़हर अजगर में है 


शराफ़त को ,मेरी न कमज़ोरी समझो 

ये अब सब्र के आखरी दर में है 


जिहादी नहीं एक बुज़दिल है तू 

तेरा नाम आ'दा के लश्कर में है 


'शेफ़ा' तेरा दिल आज ज़ख़्मी बहुत है

दवा इस की बस यादे दावर में है  

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सरासीमगी = परेशानी ,   , आग़ोश = गोद ,  qazzaq =लुटेरे  ,

दर =दरवाज़ा /चौखट ,, बुज़दिल =  कायर , आ'दा = दुश्मन , लश्कर =सेना , दावर = ईश्वर   

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जहाँ आजकल हमारे देश में 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया 'द्वारा चलाई गयी मुहिम '' अमन की आशा '' के चर्चे हैं ,वहीँ आदरणीय ''सतीश सक्सेना जी '' ने भी  उम्मीदों की एक मशाल रौशन  की है ,ये रचना इसी मशाल में शामिल एक नन्ही सी लौ है .अगर किसी एक शख्स के दिल में भी टाइम्स की,सतीश जी की या मेरी ये कोशिश उम्मीदों की लौ को तेज़ कर सकी तो ये अमन की दिशा में एक और रचनात्मक क़दम होगा .
'मादरे वतन '
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इस मादरे वतन के ज़ख्मों को मत कुरेदो ,
जो दे सको तो इस को मरहम ज़रूर दे दो . 
बच्चे जो इस के बिछड़े, अब तक न मिल सके हैं ,
बेचैन है ये मादर तस्कीन इस को दे दो. 
बेवजह लड़ रहे हैं इक दूसरे से भाई ,
ये दुश्मनी मिटाकर , फ़ह्म ओ शऊर दे दो .
जब बात आश्ती की, अम्नो अमां की आये ,
बस मुस्कुराहटें ही इक दूसरे को दे दो .
अब बुग्ज़ और कीना, दिल से निकाल फेंको, 
ये चाल है सियासी, तुम इनको मात दे दो .
कुछ तुम भी भूल जाओ ,कुछ हम भी भूल जाएँ ,
बस इक यक़ीन ले लो और इक यक़ीन दे दो .

मादर=माँ  , फ़ह्म ओ शऊर =बुद्धि और विवेक  , आश्ती = शान्ति  , बुग्ज़ = ईर्ष्या 
कीना = नफ़रत 

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

                                          आप सभी को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें  

२६ जनवरी के अवसर पर एक कविता प्रस्तुत है ,यदि राष्ट्रीय ध्वज बोल पाता तो वो अपनी अभिलाषा कैसे प्रकट करता , कहीं  कोई  बात आपके मन को छू जाये ,तो आशीर्वाद की कामना करती हूँ ,
                                                                                                             धन्यवाद .
राष्ट्रीय ध्वज की अभिलाषा 
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ध्वज हूँ मैं भारत का मेरी छोटी सी है अभिलाषा ,
पूर्ण करेंगे भारतवासी ऐसी मुझ को है आशा ,
किन्तु इस से पहले कि मैं बात करूँ अभिलाषा की, 
कुछ ऐसे पन्ने मैं खोलूँ जो अतीत के हैं साक्ष


देश का जब अस्तित्व मिटाने शत्रु थे भारत आये 
धोखे से थे गाँव, नगर और राज्य हमारे हथियाए, 
जब पूरे भारत को बैरी दास  बना कर के ख़ुश था, 
    तब सच्चे भारतवासी को उसी दासता का दुःख था.


ऐसे में अगणित वीरों ने मुझ को जीवनदान दिया, 
और देश को आज़ादी का मूल्यवान वरदान दिया ,
जब मैं पहली बार पवन के झोंकों से लहराया था ,
मेरी आँखों में उस दिन ये पहला सपना आया था.


मैं ने देखा देश में चारों ओर थी फैली हरियाली ,
भारतवासी ख़ुश थे  बिखरी सभी ओर थी ख़ुशहाली,
पर जब मेरी आंख खुली मैं चकित हुआ घबराया था ,
देखा चारों ओर थी हिंसा अंधकार सा छाया था .


सहसा मेरे मन में कुछ अभिलाषा के अंकुर फूटे ,
इच्छा है कि जुड़ जाएँ जो सपने थे मेरे टूटे ,
सब भारतवासी हैं भाई ,सभी इसी  को  सच मानें,
भारत माता के लहराते आँचल को पावन जानें . 


नेता सोचें देश के हित में ,निज हित से ऊपर आयें
महाशक्ति के किसी प्रभाव में देश न हम अपना खोएं 
आदर हो ,सम्मान बड़ों का ,बलिदानों का अर्चन हो 
द्वेष भाव ,कुकर्म ,शत्रुता का दृढ़ता से तर्जन हो


खेतों में गेहूं ही बोयें ,रोपें नहीं वहां हथियार 
बच्चों को दें ज्ञान की ज्योति ,मजदूरी का ले लें भार
अपराधी को मिले सज़ा और  दुखियों को इंसाफ़ मिले 
नारी जाति का आदर हो ,कहीं न कोई नार जले 


ऐसा भारत देश बनाओ जिस पर सब अभिमान करें 
प्रेम ,एकता  और समानता के ही अब तो दीप जलें 
मानवता की औषधि से तुम रोगी का उद्धार करो 
विपदा में हो गर दुश्मन भी ,तुम उसको स्वीकार करो 


मैं भारत की गरिमा हूँ,तुम सब की ज़िम्मेदारी हूँ 
अभिलाषा परिपूर्ण हुई तो मैं सब का आभारी हूँ 


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